FCRA बिल 2026 चिंताएं!
केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में बजट सत्र के दौरान विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 पेश किया गया। इस विधेयक का उद्देश्य भारत में गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) को मिलने वाले विदेशी फंड के प्रबंधन और नियंत्रण को और अधिक कड़ा बनाना है। हालाँकि, विपक्षी दलों और नागरिक समाज के भारी विरोध के कारण फिलहाल इसे टाल दिया गया है।
विधेयक के प्रमुख प्रस्तावित बदलाव
इस नए संशोधन में कुछ ऐसे प्रावधान शामिल किए गए हैं जिन्होंने नई बहस को जन्म दिया है:
संपत्तियों पर नियंत्रण: विधेयक में एक 'नामित प्राधिकरण' (Designated Authority) की नियुक्ति का प्रस्ताव है। यदि किसी NGO का पंजीकरण रद्द या निलंबित होता है, तो यह प्राधिकरण उनकी संपत्तियों का प्रबंधन या निपटान करने का अधिकार रखेगा।
'मुख्य पदाधिकारी' की व्यापक परिभाषा: अब ट्रस्टी, हिंदू अविभाजित परिवार के कर्ता और संगठन को नियंत्रित करने वाले अन्य लोगों को भी 'मुख्य पदाधिकारी' माना जाएगा, जिससे उनकी कानूनी जिम्मेदारी बढ़ जाएगी।
जांच के लिए पूर्व अनुमति: किसी भी कानून प्रवर्तन एजेंसी को FCRA संबंधी शिकायतों की जांच शुरू करने से पहले केंद्र सरकार से अनुमति लेनी होगी।
समय सीमा और दंड: विदेशी फंड के उपयोग के लिए निश्चित समय सीमा तय की गई है, जबकि अपराधों के लिए अधिकतम कारावास को पांच साल से घटाकर एक साल करने का प्रस्ताव है।
विरोध के मुख्य कारण
विपक्ष और धार्मिक संस्थाओं (जैसे कैथोलिक बिशप कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया) ने इस बिल को "कार्यकारी अतिरेक" (Executive Outreach) करार दिया है। उनकी मुख्य चिंताएँ निम्नलिखित हैं:
संस्थाओं पर कब्जा: विरोधियों का मानना है कि सरकार को संगठनों की संपत्ति और धन पर नियंत्रण करने की असीमित शक्ति मिल जाएगी, जिसका दुरुपयोग अल्पसंख्यक संस्थानों और चर्चों को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है।
स्वायत्तता में हस्तक्षेप: यह आरोप लगाया जा रहा है कि यह बिल नागरिक समाज और अल्पसंख्यक संस्थाओं के स्वतंत्र कामकाज में बाधा डालेगा।
राजनीतिक विरोध: विशेष रूप से केरल और तमिलनाडु जैसे चुनावी राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने इस बिल का कड़ा विरोध किया है, जिसे देखते हुए सरकार ने फिलहाल इसे स्थगित कर दिया है।
वर्तमान स्थिति
वर्तमान में भारत में लगभग 14,965 FCRA-पंजीकृत NGOs सक्रिय हैं, जो सालाना लगभग ₹22,000 करोड़ का विदेशी फंड प्राप्त करते हैं। सरकार का तर्क है कि ये बदलाव राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने और फंड के दुरुपयोग को रोकने के लिए आवश्यक हैं, जबकि प्रदर्शनकारियों के अनुसार यह NGOs को डराने और उन्हें बंद करने की एक कोशिश है। फिलहाल, विधेयक चर्चा के लिए लंबित है।

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