वैश्विक अस्थिरता और भारतीय अर्थव्यवस्था!
वर्तमान में वैश्विक मंच पर जारी युद्ध और तनाव ने केवल सीमाओं को ही नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की नींव को भी हिला दिया है। भारत में इसका सीधा असर शेयर बाजार के सूचकांकों में 12% तक की गिरावट और रुपये के अवमूल्यन के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, आर्थिक प्रभाव केवल यहीं तक सीमित नहीं हैं; असली खतरा उन आंतरिक और सूक्ष्म दरारों में छिपा है जो संकट के समय उभरकर सामने आती हैं।
निजी ऋण: एक उभरता हुआ खतरा?
दुनिया भर में 'प्राइवेट क्रेडिट' (निजी ऋण) का बाजार तेजी से बढ़ा है, लेकिन अब इसमें रेडेंप्शन (निकासी) का दबाव बढ़ रहा है। भारत में यद्यपि यह क्षेत्र बैंकिंग क्षेत्र के मुकाबले छोटा (लगभग $30-40 बिलियन) है, लेकिन इसकी 'अपारदर्शिता' और बैंकों के साथ इसका 'अंतर्संबंध' चिंता का विषय है। RBI की 'वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट' पहले ही इस ओर इशारा कर चुकी है कि निजी ऋण में आने वाला तनाव पूरे वित्तीय तंत्र को संक्रमित कर सकता है।
प्रशासनिक विफलता और घोटाले
हाल ही में बैंकिंग क्षेत्र में दो प्रमुख घटनाएं सामने आई हैं जिन्होंने नियामकों की नींद उड़ा दी है:
गवर्नेंस का संकट: बैंकिंग जगत के दिग्गज संस्थानों में आंतरिक प्रबंधन और बोर्ड के सदस्यों के बीच बढ़ता असंतोष संस्थागत मजबूती पर सवाल खड़ा करता है।
धोखाधड़ी का जाल: आईडीएफसी फर्स्ट बैंक में ₹590 करोड़ और कोटक महिंद्रा बैंक से जुड़े ₹160 करोड़ के घोटाले यह दर्शाते हैं कि 'मार्केटिंग एग्रेसन' (आक्रामक मार्केटिंग) के चक्कर में सुरक्षा मानकों की अनदेखी की जा रही है। चंडीगढ़ जैसे शहरों में केंद्रित ये घोटाले एक संगठित रैकेट की ओर इशारा करते हैं।
नियामकों की भूमिका और भविष्य की राह
भारत की वित्तीय सेहत अब केवल बाहरी झटकों पर नहीं, बल्कि इस पर निर्भर करती है कि RBI और SEBI इन आंतरिक विसंगतियों को कितनी सख्ती से संभालते हैं। 2026-27 की पहली मौद्रिक नीति समिति की बैठक इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव होगी।
संकट के इस दौर में केवल ब्याज दरों को नियंत्रित करना पर्याप्त नहीं होगा; बल्कि बैंकिंग पर्यवेक्षण में पारदर्शिता लाना और निजी ऋण जैसे जोखिम भरे क्षेत्रों पर कड़ी नजर रखना समय की मांग है। अगर अब सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो ये छिटपुट घटनाएं एक बड़े 'सिस्टमिक रिस्क' (प्रणालीगत जोखिम) में बदल सकती हैं।

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