पहचान के दायरे: एक आकार सबके लिए सही नहीं !

  


​समाज अक्सर लोगों को स्पष्ट और परिभाषित 'बक्सों' में रखने में सुरक्षित महसूस करता है। हम विविधता को स्वीकार करने के बजाय उसे श्रेणियों में बांटने की कोशिश करते हैं, लेकिन मानवीय पहचान अक्सर इन सीमाओं को तोड़ देती है। चपल भादुड़ी का जीवन इसी 'फ्लुइडिटी' या तरलता का एक जीवंत उदाहरण है।

​चपल रानी: लिंग भेद से परे एक कलाकार

​चपल भादुड़ी बंगाली रंगमंच के उन अंतिम महान कलाकारों में से हैं, जिन्होंने महिला पात्रों को जीवंत किया। 1960 और 70 के दशक में जब 'LGBTQ+' जैसे शब्द प्रचलित नहीं थे, तब चपल रानी के अभिनय ने महान अभिनेता उत्तम कुमार तक को अचंभित कर दिया था। वे मंच पर स्त्री थे और व्यक्तिगत जीवन में पुरुष, लेकिन उनकी पहचान इन दोनों के बीच कहीं गहराई में बसी थी।

​सादगी और सत्य: वे स्वयं को 'ट्रांसजेंडर' जैसी आधुनिक शब्दावली में नहीं बांधते थे। उन्होंने मंच के बाहर कभी महिलाओं के कपड़े पहनने की इच्छा नहीं की, लेकिन मंच पर श्रृंगार करते ही वे अपने पुरुष होने का अस्तित्व भूल जाते थे।

​समाज का विरोधाभास: पुराने समय में, बिना किसी औपचारिक आंदोलन के भी समाज ने चपल रानी जैसे व्यक्तित्वों को एक स्थान दिया था। आज हम अधिक जागरूक होने का दावा करते हैं, फिर भी हमारी कानूनी और सामाजिक व्यवस्थाएं पहचान को संकुचित श्रेणियों में समेटने की कोशिश कर रही हैं।

​वर्गीकरण का संकट

 ध्यातव्य है कि जैसे-जैसे हम 'LGBTQIA+' वर्णमाला में नए अक्षर जोड़ते जा रहे हैं, हम शायद पहचान की उस मूल तरलता को खोते जा रहे हैं।

​कानूनी बाधाएं: सरकारें अक्सर कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर पहचान को परिभाषित करने का प्रयास करती हैं, जिससे कई बार वे लोग हाशिए पर चले जाते हैं जो किसी एक तय खांचे में फिट नहीं बैठते।

​नामकरण की समस्या: किसी पहचान को नाम देना उसे मान्यता तो देता है, लेकिन कभी-कभी यह नामकरण ही समस्या बन जाता है। जब हम किसी को 'लेबल' करते हैं, तो हम उसकी उन विशेषताओं को अनदेखा कर देते हैं जो उस लेबल से बाहर हैं।

​कानून और समाज को यह समझने की आवश्यकता है कि पहचान 'एक आकार' (one-size-fits-all) की वस्तु नहीं है। चपल भादुड़ी जैसे लोग हमें याद दिलाते हैं कि मानवीय अस्तित्व उन नियमों और श्रेणियों से कहीं अधिक व्यापक है जिन्हें समाज अपनी सुरक्षा के लिए बनाता है। असल सम्मान किसी को एक निश्चित बॉक्स में बंद करने में नहीं, बल्कि उसकी विशिष्टता और तरलता को उसी रूप में स्वीकार करने में है।

​"अस्तित्व की तरलता स्वाभाविक है; इसे कृत्रिम श्रेणियों में बांधना मानवता के एक बड़े हिस्से को अदृश्य कर देने जैसा है।"

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