भारत-चीन ऊर्जा सहयोग: कूटनीति से परे एक व्यावहारिक दृष्टिकोण!
यह भारत और चीन के बीच के तनावपूर्ण कूटनीतिक और विनिर्माण संबंधों के विपरीत, ऊर्जा क्षेत्र में उनके सफल और दीर्घकालिक सहयोग का विश्लेषण है। दोनों देशों को अपने आर्थिक विकास और ऊर्जा सुरक्षा के लिए आपसी "साझा भेद्यता" (Shared Vulnerability) को आधार बनाकर हाथ मिलाना चाहिए।
राजनीतिक बनाम व्यापारिक यथार्थ: जहाँ एक ओर विनिर्माण और सीमा विवाद को लेकर दोनों देशों में तनाव है (जैसे 'प्रेस नोट 3' और बीवाईडी (BYD) के निवेश प्रस्ताव का खारिज होना), वहीं दूसरी ओर ऊर्जा क्षेत्र में एक अलग ही कहानी दिखती है।
सूडान का सफल मॉडल: यह 'ग्रेटर नाइल पेट्रोलियम ऑपरेटिंग कंपनी' (GNPOC) का उदाहरण हैं। दक्षिण सूडान में भारत की ONGC विदेश और चीन की CNPC पिछले दो दशकों से गृहयुद्ध, तख्तापलट और वित्तीय संकट के बावजूद एक साथ काम कर रही हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि व्यावसायिक हित कठिन परिस्थितियों में भी टिके रह सकते हैं।
वैश्विक भू-राजनीति और दबाव: पश्चिम एशिया में युद्ध और अमेरिकी प्रतिबंधों (ईरान और रूस पर) ने भारत और चीन दोनों के लिए चुनौतियाँ पैदा की हैं। दोनों देशों के पास पश्चिमी प्रतिबंधों और समुद्री अवरोधों (जैसे होर्मुज जलडमरूमध्य) से बचने के लिए अफ्रीका जैसे क्षेत्रों में वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत विकसित करने का साझा कारण है।
सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संदर्भ: इसमें 'गणेश' की प्रतिमाओं का उदाहरण है जो प्राचीन काल में सिल्क रोड के माध्यम से चीन तक पहुँची थीं। सवाल हैं कि यदि प्राचीन काल में व्यावसायिक और सांस्कृतिक कल्पना इतनी स्वतंत्र हो सकती थी, तो वर्तमान में दोनों देश मिलकर 'गणेश ऑयल कंपनी' जैसे नए संयुक्त उद्यम (JVs) क्यों नहीं बना सकते?
भारत और चीन के बीच ऊर्जा सहयोग के लिए 'मधुर संबंधों' या 'सभ्यतागत बयानबाजी' की आवश्यकता नहीं है। दोनों देशों की ऊर्जा ज़रूरतें और वैश्विक प्रतिबंधों से उपजा साझा डर उन्हें एक साथ काम करने के लिए मजबूर करने के लिए पर्याप्त है। समृद्धि लाने के लिए व्यावहारिकता (Pragmatism) ही एकमात्र रास्ता है।

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