आधुनिक परवरिश: टूटते परिवेश और सिमटता बचपन!

  


बच्चा वह नहीं करता जो आप उसे 'कहते' हैं, वह वह करता है जो आपको 'करते' हुए देखता है। 


मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, और उसकी सीखने की प्रक्रिया जन्म के पहले क्षण से ही शुरू हो जाती है।  "कोई भी बच्चा सब कुछ सीख कर धरती पर जन्म नहीं लेता।" मनोविज्ञान की भाषा में कहें तो बच्चा एक 'तबुला रासा' (Tabula Rasa) यानी एक कोरी स्लेट के समान होता है, जिस पर समाज और परिवार अपने अनुभवों की कलम से भविष्य की इबारत लिखते हैं।

​मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण: प्राथमिक समाजीकरण की भूमिका

​बच्चे के मानसिक विकास में 'प्राथमिक समाजीकरण' का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र उसका परिवार होता है।

​अनुकरण की शक्ति: बच्चा वही बनता है जो वह अपने आसपास देखता है। यदि माता-पिता धैर्यवान हैं, तो बच्चा धैर्य सीखता है।

​सुरक्षा का भाव: माता-पिता का साथ बच्चे को 'अटैचमेंट थ्योरी' के अनुसार भावनात्मक सुरक्षा प्रदान करता है। जब यह साथ कम होता है, तो बच्चे में असुरक्षा और एकाकीपन (Loneliness) की भावना पनपने लगती है।

​सामाजिक विश्लेषण: बदलता परिवेश और बाहरी प्रभाव

​आज के दौर में "अफसोस की बात है कि अब बच्चों को माता-पिता का साथ ही कम मिल रहा है।" इसके पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण हैं:

​कैरियर की अंधी दौड़: बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण माता-पिता दोनों का घर से बाहर रहना मजबूरी बन गया है।

​डिजिटल गैजेट्स का हस्तक्षेप: जब माता-पिता साथ होते भी हैं, तो गुणवत्तापूर्ण समय की जगह मोबाइल फोन ले लेते हैं।

​बाहरी दुनिया का प्रभाव: जब घर में मार्गदर्शन की कमी होती है, तो बच्चा बाहरी दुनिया, इंटरनेट और साथियों  से प्रभावित होने लगता है।  "बाहर से वह जो कुछ भी सीखता है, वह उसके पास जैसे का तैसे रूप में आता है।" इसका अर्थ है कि बिना किसी नैतिक छननी के, वह नकारात्मक और सकारात्मक दोनों तरह की प्रवृत्तियों को आत्मसात कर लेता है। 

​बच्चे समाज की नींव हैं। यदि नींव को पोषण माता-पिता के संस्कारों से नहीं, बल्कि केवल बाहरी दुनिया के अनियंत्रित प्रभावों से मिलेगा, तो सामाजिक ताना-बाना कमजोर होना निश्चित है।

​समाधान की दिशा: हमें 'क्वांटिटी टाइम' से ज्यादा 'क्वालिटी टाइम' पर ध्यान देना होगा। दिन भर में भले ही कम समय मिले, लेकिन वह समय बिना किसी स्क्रीन के, केवल संवाद और भावनात्मक जुड़ाव के लिए होना चाहिए। 

सिखाना केवल उपदेश देना नहीं है, बल्कि बच्चे के सामने एक आदर्श उदाहरण पेश करना है। 

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