लालू युग का तीसरा चरण शुरू ! त्रिवेणी संघ के तीसरे हिस्से को मिली बिहार की सत्ता ! --- वीरेंद्र यादव, वरिष्ठ पत्रकार, पटना ---

  

(तस्वीर में एक घटना में सम्राट चौधरी के साथ प्रसिद्ध यादव) 

बिहार के लालू प्रसाद यादव। सवर्ण जातियों के लिए भय और दहशत का पर्याय। नीतीश कुमार लालू की हस्ती मिटाने की कोशिश करते-करते खुद मिट गये। मिट्टी में मिलने की उनकी इच्छा भी, कोईरी सम्राट चौधरी ने पूरी कर दी। लालू यादव सवर्णों की साजिश के बावजूद दरख्त की तरह लहलहा रहे हैं। आज भाजपा ने सम्राट चौधरी को बिहार की सत्ता सौंपी है तो उसकी जड़ में भी लालू यादव की ताकत है, लालू यादव का आधार है। लालू यादव के सामाजिक पावर हाउस के प्रकाश से ही पहले कुर्मी नीतीश भकभका रहे थे और अब कोईरी सम्राट भकभकायेंगे। सवर्णों की किस्मत में अभी अंधेरे का साया ही लिखा है। 

14 अप्रैल यानी संविधान निर्माता डाॅ भीमराव अंबेदकर की जयंती के मौके पर लालू युग के तीसरे चरण शुरुआत हुई है। बिहार में त्रिवेणी संघ तीन जातियों का संगठन था। इसमें यादव, कुर्मी और कोईरी एक साथ मिलकर सवर्णों और सामंतों के खिलाफ लड़ रहे थे। त्रिवेणी संघ का सबसे मजबूत धड़ा यादव बिहार में 15 वर्षों तक राज किया। दूसरा धड़ा कुर्मी 20 वर्षों तक राज किया और अब तीसरे हिस्से कोईरी राज अंबेदकर जयंती से शुरू हो रही है। यह तीसरा धड़ा सवर्णों की साजिश का शिकार होने तक राज करता रहेगा। 

नीतीश कुमार अगले एक सप्ताह में खबरों और चर्चाओं से गायब हो जाएंगे। क्योंकि उनकी पूरी पहचान सत्ता और लालू विरोध पर टिकी हुई थी। अब न वे सत्ता में रहेंगे और न लालू विरोध का कोई मायने रह गया है। लेकिन लालू यादव सत्ता में नहीं रहने के बाद भी पिछले 20 वर्षों से बिहार की राजनीति के धुरी बने हुए हैं। इसकी वजह है उनका आधार। उनका आधार उनकी ताकत भी और कमजोरी भी। उनका आधार उनको मिटने नहीं दे रहा है और उनकी ताकत उनको सत्ता में वापस नहीं आने दे रही है। 

बिहार का राजनीतिक यथार्थ है कि सवर्णों को कोईरी और कुर्मी से कोई भय नहीं है। सवर्णों को डर सिर्फ यादवों से लगता है। राजनीतिक स्तर पर भी और सामाजिक स्तर पर भी। इसलिए पूरा सवर्ण लालू यादव के खिलाफ एकजुट हो जाता है। सवर्ण पिछले 20 वर्षों से यादवों का कब्र खोदने में लगे हुए हैं और इस कोशिश में सवर्णों की कम से कम दो पीढ़ी उसी कब्र में रानजीतिक रूप से दफन हो गयी है। 

दरअसल बिहार में सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना लालू युग का विस्तार है। बिहार की राजनीति में लालू युग की शुरुआत मंडल आयोग के समय से होती है और इसका असर आज भी कायम है। सम्राट भी लालू यादव के लालटेन के नीचे राजनीतिक रूप से जवान हुए व्यक्ति हैं। समय के अनुसार उनकी राजनीतिक निष्ठा बदलती गयी और सत्ता की सीढ़ियां चढ़ते गये। यह बिहार का राजनीतिक सौभाग्य है कि भाजपा को भी सत्ता सौंपने के लिए लालू यादव की विचारधारा से निकले व्यक्ति को ही आगे करना पड़ा। यही भाजपा की सबसे बड़ी विफलता है कि पिछले 47 वर्षों में वह एक व्यक्ति नहीं खड़ा कर सकी, जो भाजपा की नीतियों का खेवनहार साबित हो सके। आगे कई दशकों तक इसकी कोई संभावना भी नहीं है। 

इसको हम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और त्रिवेणी संघ के आईन में भी देख सकते हैं। दोनों संगठन की स्थापना के सौ वर्ष होने को है। आरएसएस ने शतक भी पूरी कर ली है। लेकिन उसने पूरी ताकत और नफरत की राजनीति करके भी एक राजनीतिक कार्यकर्ता पैदा नहीं कर सका, जो बिहार जैसे राज्य का नेतृत्व कर सके। जबकि त्रिवेणी संघ अपने बिखरने के बाद भी इतना बड़ा दायरा छोड़ गया है कि उसकी वैचारिक विरासत की जमीन पर राजनीति करने वाला तीसरा व्यक्ति बिहार की सत्ता संभाल रहा है। बिहार में त्रिवेणी संघ फिर अस्तित्व में नहीं आएगा, यह तय है। लेकिन आरएसएस को सवर्णों और बनिया के आवरण से बाहर आना होगा, तभी वह सर्वस्वीकार नेता पैदा कर पाएगा। 

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