कला: केवल शौक नहीं, मानवता का सबसे मूल्यवान निवेश!
अक्सर कहा जाता है—"साहित्यसंगीतकलाविहीनः साक्षात्पशुः पुच्छविषाणहीनः"। अर्थात जिस मनुष्य के जीवन में कला, संगीत या साहित्य नहीं है, वह बिना पूंछ के पशु के समान है। आधुनिक युग में हमने प्रगति की परिभाषा केवल 'नौकरी' और 'व्यवसाय' तक सीमित कर दी है, जबकि कला वह माध्यम है जो हमारी आत्मा को जीवंत रखती है।
कला की अनुपम महत्ता
आर्थिक सामर्थ्य का नया आयाम: जैसा कि राजा रवि वर्मा की पेंटिंग "यशोदा और कृष्ण" की ₹167.20 करोड़ की नीलामी से स्पष्ट है, कला केवल 'खाली समय का शौक' नहीं है। यह एक उत्कृष्ट निवेश और करियर का ऐसा शिखर है, जहाँ पहुँचने पर दुनिया आपके कौशल का लोहा मानती है।
मानसिक शांति और सृजनशीलता: जहाँ व्यवसाय और नौकरी तनाव (Stress) पैदा करते हैं, वहीं कला एक 'थेरेपी' की तरह काम करती है। यह हमें सोचने की नई दिशा देती है और हमारी एकाग्रता बढ़ाती है।
संस्कृति का संरक्षण: राजा रवि वर्मा जैसे महान चित्रकारों ने भारतीय देवी-देवताओं और संस्कृति को जो रूप दिया, उसने इतिहास को अमर कर दिया। एक चित्रकार अपनी तुलिका से वह कह जाता है जो हज़ारों शब्द नहीं कह पाते।
पहचान और विरासत: नौकरी एक व्यक्ति की ज़रूरतें पूरी कर सकती है, लेकिन कला एक व्यक्ति को अमर बना देती है। आज हम रवि वर्मा को उनकी प्रशासनिक योग्यता के लिए नहीं, बल्कि उनकी कलात्मक उत्कृष्टता के लिए याद कर रहे हैं।
समय की मांग: संतुलन और प्रोत्साहन
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम कला को केवल "अतिरिक्त गतिविधि" (Extra-curricular) न मानकर इसे जीवन का मुख्य हिस्सा बनाएँ। यदि कोई बच्चा चित्रकारी, संगीत या लेखन में रुचि रखता है, तो उसे 'डिग्री' की रेस में झोंकने के बजाय उसके कौशल को निखारने का अवसर देना चाहिए।
व्यवसाय पेट भरता है, लेकिन कला जीवन भरती है। पैसा खर्च हो सकता है, कंपनियाँ बंद हो सकती हैं, लेकिन जो सृजन एक कलाकार के हाथों से निकलता है, वह सदियों तक समाज को प्रेरित करता रहता है। आइए, कला का सम्मान करें और इसे अपनी जीवनशैली का अनिवार्य अंग बनाएँ।

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