नालंदा की पवित्र माटी पर कलंक: जहाँ ज्ञान का सूर्य उगा, वहाँ मानवता का सूर्यास्त! 😭😭
अजयपुर की वह हृदयविदारक घटना, जिसने सुशासन के दावों को राख कर दिया?
नालंदा—यह केवल एक नाम नहीं, बल्कि सहस्राब्दियों की मेधा, शील और संस्कार का पर्याय है। जिस भूमि ने विश्व को ज्ञान का आलोक दिया, जहाँ बुद्ध और महावीर के चरणों की धूल से शांति का अंकुर फूटा, आज वही पावन धरती अपनों के ही कुकृत्यों और व्यवस्था की विफलता से रक्तरंजित और लज्जित है। नूरसराय थाना के अजयपुर की उस भयावह घटना ने न केवल विधि-व्यवस्था की चूलें हिला दी हैं, बल्कि आधुनिक समाज के मुखौटे को भी तार-तार कर दिया है।
सत्ता का मौन और मानवता का चीर-हरण
कहते हैं इतिहास स्वयं को दोहराता है, किंतु अजयपुर में जो हुआ वह कलयुग के 'महाभारत' का सबसे वीभत्स संस्करण था। एक अबला का चीर-हरण होता रहा, और पूरा गाँव मूकदर्शक बना मुँह तकता रह गया। क्या हमारी संवेदनाएं इतनी मर चुकी हैं? क्या 'सुशासन' केवल कागजों की सजावट और भाषणों की बाजीगरी तक सीमित रह गया है? जब रक्षक ही सो रहे हों और समाज का पुरुषार्थ कायरता की चादर ओढ़ ले, तो समझ लेना चाहिए कि वह सभ्यता पतन की पराकाष्ठा पर है।
"जहाँ नारी का अपमान हो, वहाँ का वैभव श्मशान के समान है। नालंदा की इस घटना ने सत्ता के माथे पर वह कालिख पोती है जिसे इतिहास कभी क्षमा नहीं करेगा।"
सुशासन का 'काला अध्याय' और सुरक्षा के शून्य दावे
सरकारें बदलती हैं, नारे बदलते हैं, लेकिन नहीं बदलती तो बेटियों की नियति। अजयपुर की चीखें आज हर उस घर की दहलीज पर दस्तक दे रही हैं जहाँ बेटियां पल रही हैं। यह घटना मात्र एक अपराध नहीं, बल्कि विधि-व्यवस्था के ताबूत में आखिरी कील की तरह है।
प्रश्न उठता है: क्या हमारी पुलिस का खौफ केवल निरीह जनता के लिए है?
प्रश्न उठता है: जब बेटियां सरेआम बेआबरू की जाती हैं, तब सुशासन का दंभ भरने वाले पहरेदार कहाँ होते हैं?
प्रश्न उठता है: क्या हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ 'भीड़' ही न्याय और 'मौन' ही संस्कार बन गया है?
पूछता है देश: बेटियां कितनी सुरक्षित?
आज नालंदा की हवाओं में ज्ञान की सुगंध नहीं, बल्कि भय की सिहरन है। वह धरती जिसने कभी दुनिया को नैतिकता का पाठ पढ़ाया, आज स्वयं एक अनुत्तरित प्रश्न बनकर खड़ी है। अजयपुर की वह घटना सत्ता के लिए महज एक 'एफआईआर' (FIR) की फाइल हो सकती है, लेकिन एक सभ्य समाज के लिए यह एक गहरा घाव है।
यदि आज भी प्रशासन की कुंभकर्णी नींद नहीं खुली और दोषियों को वह दंड नहीं मिला जो मिसाल बन सके, तो मान लीजिए कि हम एक मृत समाज के नागरिक हैं। नालंदा की अस्मिता पुकार रही है—न्याय के लिए, सुरक्षा के लिए और उस सम्मान के लिए जिसे अजयपुर की गलियों में सरेआम नीलाम कर दिया गया।
लोकतंत्र के मंदिर में न्याय की मशाल तभी जलेगी, जब अजयपुर की उस बेटी को न्याय मिलेगा। वरना, इतिहास लिखेगा कि नालंदा के ज्ञान की ज्योति एक दिन सरेआम हुए अन्याय के अंधेरे में खो गई थी।

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