रुपये का अंतर्राष्ट्रीयकरण: समय की मांग और बढ़ते कदम !

   


​हाल के वर्षों में वैश्विक अर्थव्यवस्था में डॉलर के प्रभुत्व को लेकर बढ़ती बेचैनी ने 'रुपये के अंतर्राष्ट्रीयकरण' की चर्चा को एक हकीकत में बदल दिया है। डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की गिरती कीमत और बदलती भू-राजनीतिक स्थितियों के बीच भारत अब अपनी मुद्रा को वैश्विक मंच पर स्थापित करने के लिए ठोस प्रयास कर रहा है।

​डॉलर का घटता प्रभुत्व और वैश्विक परिदृश्य

​पिछले कुछ वर्षों में अमेरिकी नीतियों और प्रतिबंधों (जैसे रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद रूस को SWIFT से बाहर करना) ने दुनिया भर के देशों को अपनी विदेशी मुद्रा भंडार में विविधता लाने के लिए मजबूर किया है। आंकड़ों के अनुसार:

​वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की हिस्सेदारी 2017 के 64% से गिरकर 2025 तक लगभग 56.7% रह गई है।

​डॉलर के विकल्प के रूप में सोने की मांग बढ़ी है, जिसकी भंडार में हिस्सेदारी 10% से बढ़कर 23% हो गई है।

​भारत के रणनीतिक कदम

​भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने रुपये के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव किए हैं:

​वोस्ट्रो खाते (Vostro Accounts): फरवरी 2025 तक, RBI ने 30 देशों के 123 विदेशी बैंकों को 156 विशेष रुपया वोस्ट्रो खाते खोलने की अनुमति दी है।

​द्विपक्षीय व्यापार: रूस के साथ कच्चे तेल और रक्षा सौदों का भुगतान रुपये में किया जा रहा है। इसके अलावा यूएई, इंडोनेशिया और मालदीव जैसे देशों के साथ स्थानीय मुद्रा में व्यापार समझौते किए गए हैं।

​व्यापार हिस्सेदारी: जनवरी 2026 के आंकड़ों के अनुसार, भारत के कुल निर्यात का लगभग 6.18% रुपये में इनवॉइस (Invoiced) किया गया है। हालांकि, आयात में यह हिस्सेदारी अभी भी लगभग 4.69% है, जिसे बढ़ाने की आवश्यकता है।

​वैकल्पिक भुगतान प्रणालियाँ

​SWIFT जैसी पश्चिम-प्रधान प्रणालियों पर निर्भरता कम करने के लिए भारत और अन्य ब्रिक्स (BRICS) देश वैकल्पिक रास्तों पर विचार कर रहे हैं:

​BRICS Pay: ब्रिक्स देशों के बीच एक स्वतंत्र वित्तीय संदेश प्रणाली।

​CBDC (सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी): 'प्रोजेक्ट एम-ब्रिज' (Project mBridge) जैसे सीमा पार थोक CBDC प्रोजेक्ट्स, जो चीन, यूएई और सऊदी अरब जैसे देशों के बीच व्यापार को सरल बना सकते हैं।

​भविष्य की राह

​रुपये का अंतर्राष्ट्रीयकरण अब केवल एक कल्पना नहीं बल्कि एक आवश्यकता है। सीमा पार भुगतान में रुपये का बढ़ता उपयोग न केवल इसकी मांग पैदा करेगा, बल्कि डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरावट को रोकने में भी सहायक होगा। हालांकि, अभी लंबा सफर तय करना बाकी है, लेकिन वैश्विक स्तर पर डॉलर के प्रति बढ़ता असंतोष भारत के लिए एक सुनहरा अवसर प्रदान करता है।

भारत को अपनी भुगतान प्रणालियों को और अधिक सुदृढ़ करने तथा द्विपक्षीय व्यापार के दायरे को बढ़ाने की दिशा में निरंतर प्रयास जारी रखने चाहिए ताकि वैश्विक अर्थव्यवस्था में रुपये की साख और मजबूती बढ़ सके। 

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