29 साल के उम्र में 10 वें साल में देश की हिफाज़त में।


 आज पूरे 3 साल कश्मीर में अपनी सेवा देते हुए, बाकी समय पूर्वोत्तर राज्यों में।इतने उम्र में लोग खेलते कूदते हैं, लेकिन चुनौती आगे की रास्ता दिखाता है। जिसके जीवन में चुनौती ही नही उसके जीवन तालाब की पानी की तरह रुक जाता है और उसमें काई लग जाती है, इसी तरह जीवन है, निरंतर चलते रहने का नाम है।ये हैं मेरे द्वितीय सुपुत्र सोमनाथ!

घर से दूर रहना कितना  कठिन है, हम समझते हैं।मैं कहीं भी रहता मेरी आत्मा चाहे तिरुपति में बड़े पुत्र के पास, कश्मीर और घर पर रहता है।ये हाल सिर्फ मेरा ही नही सभी के जिनके अपने प्रवास में रहते हैं, रहता है।लेखनी की ताकत मुझे ताकत देती रहती है वरना इस दुनिया में ठोकरें ज़्यादा मिलती है। अगर हम भी दबंग प्रवृत्ति के होते तब ऐसा नहीं होता, लेकिन शालीनता को कमजोरी समझ लेते हैं। मेरा कोई शत्रु नही है, इसके लिए कुछ मेरे मित्र ही काफ़ी है। लड़ाई सामने से हो, आस्तीन के सांप बनकर नहीं।

जिसे चलने के लिए कभी सिखाया, आज वही मेरे रास्ते रोकने के लिए खड़ा है।हवा के झोंके न रुका है, न रुकेगा।

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