अलविदा 'ही-मैन': धर्मेंद्र—जुनून, संघर्ष और सादगी का वो नाम जो अमर हो गया ।
आज सिनेमा के फलक से एक ऐसा सितारा टूट गया, जिसने अपनी रौशनी से लाखों दिलों को जगमग किया था। धर्मेंद्र सिंह देओल, वह नाम जो सादगी, संघर्ष, और बेजोड़ हैंडसमनेस का पर्याय था, अब हमारे बीच नहीं है। पंजाब के एक हेडमास्टर के बेटे के लिए यह सफ़र आसान नहीं था। बचपन से ही फिल्मों का ऐसा जुनून था कि सुरैया की फिल्म 'दिल लगी' देखने के लिए वह अपने गाँव से दिल्ली तक मीलों पैदल चलकर 40 दिनों तक यह सिलसिला जारी रखते थे, और इसी जुनून ने उन्हें तय करवा दिया कि उनका करियर केवल फिल्मों में ही होगा। अपने मध्यमवर्गीय परिवार की सिनेमा के प्रति उदासीनता के बावजूद, उन्होंने अपनी राह चुनी और मुंबई की ओर कूच किया। शुरुआती दिनों में उनका संघर्ष इतना कठिन था कि रातें उन्हें बेंचों पर बितानी पड़ीं और पेट भरने के लिए उन्हें केवल चने खाकर गुजारा करना पड़ा। उनकी दृढ़ता तब सफल हुई जब उन्हें पहली फिल्म 'दिल भी तेरा हम भी तेरे' (1960) मिली, जिसके लिए उन्हें पहला मेहनताना मात्र ₹51 का चेक मिला था, लेकिन यह चेक भविष्य की विशाल सफलता की नींव था।
धर्मेंद्र जी की शख्सियत केवल एक्शन और कॉमेडी तक सीमित नहीं थी; उनमें एक रूमानी शायर भी छुपा था। अभिनेत्री मीना कुमारी के साथ काम करने के दौरान वह उनके करीब आए, और इसी संगत ने उन्हें शायरी से मोहब्बत करवा दी, जिसने उनकी संवेदनशीलता को और गहरा किया। निजी जीवन में, हेमा मालिनी से शादी करने का उनका निर्णय भी खासा चर्चा में रहा। कानूनी बाध्यताओं के कारण, उन्होंने अपनी पहली पत्नी प्रकाश कौर को तलाक दिए बिना, कथित तौर पर इस्लाम धर्म अपनाया और अपना नाम बदला, ताकि वह अपनी मोहब्बत को पूरा कर सकें। यह जुनून पर्दे पर भी दिखा, खासकर 'शोले' के रोमांटिक दृश्यों की शूटिंग के दौरान, जहाँ वह हेमा मालिनी के साथ ज्यादा समय बिताने के लिए जानबूझकर रीटेक लिया करते थे। हालाँकि, उन्हें शराब की बुरी लत भी लगी, जिसका उन्होंने खुले तौर पर ज़िक्र किया; लेकिन अपने बेटे सनी देओल के टोकने पर उन्होंने यह आदत भी छोड़ दी, जो उनके मजबूत इरादों को दर्शाता है।
अपने छह दशक से अधिक के करियर में, उन्होंने 'शोले' में वीरू, 'सीता और गीता' में रवि, और 'चुपके चुपके' में डॉ. परिमल त्रिपाठी जैसे अविस्मरणीय किरदार दिए, जिसने उन्हें 'ही-मैन' की उपाधि दी। हालांकि, उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कारों में कई बार नामांकित होने के बावजूद एक भी ट्रॉफी नहीं मिली, लेकिन इस पर उनकी सोच महान थी; वह कहते थे कि उनके चाहने वालों का प्यार ही उनके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है। उनकी बेमिसाल सुंदरता का ज़िक्र हर ज़ुबान पर था; टाइम्स मैगज़ीन ने उन्हें दुनिया के 10 सबसे हैंडसम पुरुषों में गिना, और दिलीप कुमार जैसे दिग्गज ने भी कहा था कि वह अगला जन्म धर्मेंद्र जैसा हैंडसम बनना चाहेंगे। इतनी शोहरत के बावजूद, उन्हें प्रकृति और किसानी से गहरा लगाव था। वह अक्सर मुंबई के पास अपने फार्म हाउस में समय बिताते थे, जहाँ वह सब्ज़ियाँ उगाते थे और किसानी करते थे, जो उनकी ज़मीन से जुड़ी हुई आत्मा को दर्शाता है। धर्मेंद्र जी का जाना भारतीय सिनेमा के एक स्वर्णिम युग का अंत है। वह हमेशा अपनी सादगी, संघर्ष और जुनून के लिए लाखों दिलों में अमर रहेंगे।
भावभीनी श्रद्धांजलि!

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