रंगमंच का एक मज़बूत स्तंभ नही रहे : राजबल्लभ प्रसाद 'विकल' को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि !

   


​खगौल। बिहार के रंगमंच को अपनी प्रतिभा और समर्पण से सींचने वाले, 'अभिनय नाट्य संस्था' के संस्थापक और चर्चित रंगकर्मी-निर्देशक राजबल्लभ प्रसाद 'विकल' के निधन से कला जगत में गहरा शून्य छा गया है। शहर के रंगकर्मियों, साहित्यकारों और समाजसेवियों ने अत्यंत भावुक होकर उन्हें अपने श्रद्धासुमन अर्पित किए हैं। इस क्षति को केवल एक कलाकार का जाना नहीं, बल्कि बिहार की सांस्कृतिक विरासत के एक मजबूत स्तंभ का ढह जाना माना जा रहा है।

​नवाब आलम, बिहार कला पुरस्कार से सम्मानित एवं सूत्रधार के महासचिव, ने दिवंगत 'विकल' जी को नमन करते हुए कहा कि वह बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने कला के प्रचार-प्रसार के लिए विभिन्न राज्यों में नाटकों का मंचन किया, जिससे बिहार का नाम रोशन हुआ। आलम साहब ने वेदनापूर्ण स्वर में कहा, "राजबल्लभ जी बिहार रंगमंच के मजबूत आधार थे। मुझे वह दौर याद है जब खानबाग स्कूल में प्राचार्य रहते हुए भी, वह दोपहर के भोजन अवकाश में नाटक का रिहर्सल कराते थे, जिसमें कई उत्साही रंगकर्मी शामिल होते थे—मैं भी उनमें से एक था। रंगमंच में उनके योगदान को भुलाना असंभव है।"

​वरिष्ठ रंग निर्देशक एवं सूत्रधार के संस्थापक मो. सरूर अली अंसारी ने 'विकल' जी के पचास वर्षों के कृतित्व और व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए गहरी पीड़ा व्यक्त की। उन्होंने कहा, "ऐसा प्रतीत हो रहा है कि कला जगत ने अपना एक अनमोल रत्न खो दिया है। जो व्यक्ति जीवन भर सबको हँसाता रहा, वह आज सबको अश्रुपूरित करके, रुलाकर चला गया।"

​साहित्यकार प्रोफेसर प्रसिद्ध यादव ने उन्हें कला जगत का मूर्धन्य हस्ताक्षर बताया, जबकि अशोक कुणाल ने हाल के दिनों में कला जगत द्वारा कई अमूल्य रत्नों को खोने पर शोक व्यक्त किया।

​मंथन कला परिषद, खगौल के संस्थापक प्रमोद कुमार त्रिपाठी ने कहा, "राजबल्लभ जी के चले जाने से मेरा हृदय अत्यंत मर्माहत है। उनकी भरपाई करना नामुमकिन है। वह वास्तव में एक उच्च कोटि के कलाकार और निर्देशक थे।"

​सुधीर मधुकर ने उन्हें रंगकर्मियों का प्रेरणास्रोत और एक दुर्लभ कलाकार बताया। विनोद शंकर मिश्र ने उन्हें हंसमुख, मिलनसार और कला के प्रति पूर्णतः समर्पित निर्देशक के रूप में याद किया। पुराने रंगकर्मी भरत पोद्दार ने उनके शिक्षण कार्य और कला-समर्पण के अद्भुत समन्वय की सराहना की। अरुण सिंह पिंटू ने कहा कि वह केवल नाटककार नहीं, बल्कि एक उत्कृष्ट शिक्षक भी थे।

​इस दुःख की घड़ी में, वरिष्ठ रंगकर्मी विजय कुमार सिन्हा, मिथिलेश पांडे, अंबिका सिंहा, संजीव प्रसाद जवाहर, सज्जाद आलम, अमन कुमार, अस्तानंद सिंह, शोएब कुरैशी, ऋषिकेश नाथ, जय प्रकाश मिश्र, तनवीरूल हक, उदय कुमार, मो सादिक, पत्रकार चंदू प्रिंस, मुकेश कुमार, सऊद आलम, शमशाद अनवर, गोपाल वर्मा, अभय सौरभ, राजेश कुमार, संतोष शर्मा, संतोष पांडे, मनोज सोनी, राजेश शर्मा, रेखा सिंहा, रंजन कुमार सहित अनेक रंगप्रेमी और गणमान्य व्यक्तियों ने अपनी संवेदनाएँ व्यक्त कीं।

​राजबल्लभ प्रसाद 'विकल' ने अपने अभिनय, निर्देशन और नाट्य-शिक्षण से जो अमिट छाप छोड़ी है, वह बिहार के रंगमंच में सदैव एक प्रकाश स्तंभ की तरह मार्गदर्शित करती रहेगी। उनकी स्मृतियाँ उनके रंगमंचीय परिवार के हृदय में अश्रु और आदर के साथ जीवित रहेंगी।

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