भारतीय लोकतंत्र के संरक्षक: चुनाव आयोग की भूमिका और वर्तमान चुनौतियाँ !
विरासत
भारत का निर्वाचन आयोग, संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत स्थापित एक सर्वोच्च स्वायत्त निकाय है, जिस पर देश में स्वतंत्र, निष्पक्ष, और पारदर्शी चुनाव कराने का दायित्व है। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) का पद न केवल एक प्रशासनिक जिम्मेदारी है, बल्कि यह पद भारतीय लोकतंत्र की अंतरात्मा का संरक्षक भी माना जाता है। इस पद की प्रतिष्ठा को टी.एन. शेषन जैसे पूर्व आयुक्तों ने अपनी निडरता और निष्पक्षता से एक नई ऊँचाई दी थी, जब उन्होंने मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट (MCC) को सख्ती से लागू कर यह सिद्ध किया था कि संविधान ECI को प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री से भी अधिक शक्ति प्रदान करता है।
वर्तमान परिदृश्य: निष्पक्षता पर उठते सवाल
हाल के महीनों में, निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता और कार्यशैली पर गंभीर प्रश्न उठे हैं, जो भारतीय लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए गहरी चिंता का विषय है।
मुख्य विपक्षी नेता की चिंताएँ
प्रमुख विपक्षी नेता और सांसद श्री राहुल गांधी द्वारा चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर उठाए गए सवाल उनकी संवैधानिक और नैतिक ज़िम्मेदारी का हिस्सा हैं। एक लोकतांत्रिक प्रणाली में, विपक्ष का यह कर्तव्य है कि वह संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठाए। ECI से अपेक्षा थी कि वह इन सवालों का जवाब सक्रियता (Proactively), शालीनता और ज़िम्मेदारी से देता। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कथित तौर पर दिखाई गई रक्षात्मक (Defensive) या आक्रामक (Aggressive) मुद्रा ने केवल संदेह को गहराने का काम किया है, जबकि संवैधानिक संस्थाओं को हमेशा अपनी पारदर्शिता और संयम से प्रतिक्रिया देनी चाहिए।
सेवानिवृत्त नौकरशाहों का पत्र: एक अनावश्यक हस्तक्षेप
सबसे अधिक परेशान करने वाली घटना 272 सेवानिवृत्त नौकरशाहों द्वारा कथित तौर पर राहुल गांधी को लिखा गया वह पत्र है, जिसका आशय ECI का बचाव करना प्रतीत होता है।
अनावश्यक और अनुचित हस्तक्षेप: एक संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता सिद्ध करने के लिए बाहरी 'प्रमाण पत्र' या 'ढाल' की आवश्यकता नहीं होती। यह पत्र निहायत ही गैर-जरूरी (Uncalled for & Unwarranted) था।
नौकरशाही पर कलंक: इस प्रकार के सामूहिक, राजनीतिक रूप से प्रेरित दिखने वाले हस्तक्षेप ने पूरी भारतीय नौकरशाही पर सत्ताधारी पार्टी के प्रति चाटुकारिता और पक्षपात (Psycophant & Partial) का कलंक लगा दिया है। इसे "चापलूसी की पराकाष्ठा" (Height of Psycophancy) कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी।
विश्वसनीयता का संकट: यदि ECI को अपनी निष्पक्षता सिद्ध करने के लिए ऐसे "विवादित" पूर्व अधिकारियों के समूह की आवश्यकता है, तो यह स्वयं में आयोग की वर्तमान विश्वसनीयता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।
ECI की शक्ति और आवश्यक कदम
चुनाव आयोग को संविधान अपनी धारा 324 के तहत असीमित शक्ति प्रदान करता है। इस शक्ति का प्रभावी उपयोग उस पद पर बैठे व्यक्ति की इच्छा शक्ति (Determination), निष्पक्षता (Impartiality), और सत्यनिष्ठा (Integrity) पर निर्भर करता है।
चुनाव आयोग को अपनी प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता पुनः स्थापित करने के लिए निम्नलिखित प्रभावी कदम उठाने चाहिए:
सक्रिय संचार और पारदर्शिता: चुनाव प्रक्रिया से संबंधित हर संदेह का जवाब तत्काल, स्पष्ट और तथ्यात्मक तरीके से दिया जाना चाहिए। आरोपों का खंडन करने के बजाय, तथ्यों को सार्वजनिक करके पारदर्शिता दिखानी होगी।
मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट (MCC) का सशक्त कार्यान्वयन: MCC का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए, जैसा कि केरल में पूर्व मुख्य चुनाव अधिकारी के रूप में लेवल प्लेइंग फील्ड बनाए रखने के लिए किया गया था (जहाँ सभी दलों के बड़े नेताओं और यहाँ तक कि मुख्यमंत्री के खिलाफ भी उल्लंघन पर कार्रवाई की गई)। MCC का उल्लंघन करने वाले किसी भी पक्ष के खिलाफ, चाहे वह सत्ताधारी हो या विपक्ष, समान और निडरतापूर्ण कार्रवाई आवश्यक है।
बाहरी हस्तक्षेप से दूरी: आयोग को स्पष्ट रूप से यह संदेश देना होगा कि उसे किसी भी राजनीतिक दल या सेवानिवृत्त अधिकारियों के समूह की ओर से किसी भी प्रकार की 'ढाल' या 'प्रमाण पत्र' की आवश्यकता नहीं है, और वह केवल संविधान के प्रति जवाबदेह है।

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