श्रम उत्पादकता में सुधार की चुनौती !



​1. वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति

भारत की श्रम उत्पादकता G-20 देशों में सबसे कम है।

​तुलना: जहाँ भारत की प्रति घंटे उत्पादकता मात्र 8 डॉलर है, वहीं लक्जमबर्ग (143), नॉर्वे (93) और सिंगापुर (74) इससे कहीं आगे हैं।
​कार्य अवधि: भारतीय श्रमिक सप्ताह में 46-48 घंटे काम करते हैं (जो चीन और जापान से अधिक है), लेकिन कम उत्पादकता के कारण वैश्विक बाजार में भारत बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देशों से भी पिछड़ रहा है।

​2. नए श्रम सुधार: एक ऐतिहासिक कदम

​ सरकार ने 29 जटिल पुराने कानूनों को समाहित कर 4 नए श्रम कोड बनाए हैं:

​वेतन संहिता (2019)
​औद्योगिक संबंध संहिता (2020)
​सामाजिक सुरक्षा संहिता (2020)
​व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थितियाँ संहिता (2020)

​ये सुधार अनुपालन को सरल बनाने, परिभाषाओं के मानकीकरण और तकनीक के बेहतर उपयोग पर केंद्रित हैं।

​3. सुधारों के मुख्य लाभ

​व्यापार में सुगमता: 1436 प्रावधानों और दर्जनों फॉर्मों के बोझ को कम कर 'एक पंजीकरण, एक लाइसेंस और एक रिटर्न' की व्यवस्था की गई है।
​श्रमिक कल्याण: गिग इकोनॉमी के श्रमिकों और असंगठित क्षेत्र को पहली बार सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाया गया है।
​लैंगिक समानता: महिलाओं के लिए रात्रि पाली में काम करने के अवसर और बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित की गई है।
​औद्योगिक लचीलापन: MSMEs के लिए श्रमिकों की नियुक्ति और छंटनी के नियमों में लचीलापन दिया गया है, जिससे वे अधिक रोजगार पैदा कर सकें।

​4. आर्थिक प्रभाव और चुनौतियां

​खपत में वृद्धि: बेहतर नौकरी सुरक्षा और औपचारिक रोजगार से बाजार में विवेकाधीन खर्च (Discretionary Spending) में लगभग ₹75,000 करोड़ की वृद्धि हो सकती है।
​राज्यों की भूमिका: उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल और ओडिशा जैसे राज्यों को इन सुधारों को प्रभावी ढंग से लागू करने की आवश्यकता है।
​विरोध: ट्रेड यूनियनों द्वारा इन सुधारों की आलोचना की जा रही है, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे सामूहिक सौदेबाजी की शक्ति कम होगी।

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