क्या उपभोक्तावाद ने हमारे रिश्तों की नींव हिला दी है?
आज के दौर में हम एक ऐसी चमक-धमक वाली दुनिया में जी रहे हैं जहाँ 'दिखावा' ही 'अस्तित्व' बन गया है। हम बाज़ारवाद और उपभोक्तावादी संस्कृति के उस मोड़ पर खड़े हैं, जहाँ भावनाओं से ज़्यादा वस्तुओं की कीमत लगाई जाती है।
रिश्तों का बदलता स्वरूप
वह समय दूर नहीं लगता जब संबंध, भावनाएं, प्रतिबद्धता और त्याग जैसे शब्द शब्दकोशों तक ही सीमित रह जाएंगे। आज की युवा पीढ़ी पर भौतिक सुख-सुविधाओं का आकर्षण इतना हावी हो चुका है कि मानवीय मूल्यों के लिए जगह कम पड़ती जा रही है।
इस अंधी दौड़ का सबसे दुखद पहलू हमारे परिवार के बुजुर्ग हैं। वे बुजुर्ग, जिन्होंने अपना पूरा जीवन अगली पीढ़ी को संवारने में लगा दिया, आज अकेलेपन और उपेक्षा का शिकार हैं।
विडंबना: संपत्ति सबको चाहिए, साथ कोई नहीं
आज के समाज की एक कड़वी सच्चाई यह है:
अधिकार की चाह: माता-पिता की मेहनत से खड़ी की गई संपत्ति और विरासत पर हर बच्चा अपना हक जताता है।
कर्तव्य से दूरी: लेकिन जब बात उन्हीं माता-पिता की जिम्मेदारी उठाने या उन्हें अपने साथ रखने की आती है, तो इसे 'अपनी आज़ादी में व्यवधान' करार दे दिया जाता है।
क्या कानून ही आखिरी रास्ता है?
सबसे बड़ा और गंभीर सवाल यह खड़ा होता है कि क्या परिवार और विवाह जैसी हमारी पवित्र सामाजिक संस्थाएं अब इतनी कमज़ोर हो गई हैं कि उन्हें चलाने के लिए भी कानून के डंडे की ज़रूरत पड़ेगी?
"क्या हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ नैतिकता और प्रेम का स्थान अब केवल कानूनी हस्तक्षेप ही ले पाएगा?"
रिश्ते कागजों या कानूनों से नहीं, बल्कि दिल की गहराई और आपसी सम्मान से चलते हैं। यदि हम केवल अपनी 'आज़ादी' को ही सर्वोपरि रखेंगे, तो याद रखिए कि आने वाली पीढ़ी भी हमें उसी नजरिए से देखेगी। समय आ गया है कि हम भौतिकता की इस दौड़ से थोड़ा ठहरकर अपने अपनों की आँखों में देखें और उन रिश्तों को फिर से जीवित करें जो हमारी असल पूंजी हैं।

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