भारतीय राजनीति का नया युग: चुनावी जीत से आगे बढ़ता भाजपा का 'संरचनात्मक वर्चस्व'!
हाल के वर्षों में भारतीय राजनीति के स्वरूप में एक बड़ा बदलाव आया है। क्या भाजपा की बढ़त केवल प्रधानमंत्री मोदी के करिश्मे पर टिकी है, या यह एक गहरी और स्थायी संरचनात्मक जड़ें जमा चुकी है? हालिया विधानसभा चुनावों (असम, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और दिल्ली) के परिणामों ने इस बहस को एक नया मोड़ दे दिया है।
1. करिश्मे से कहीं बड़ा है 'सिस्टम'
अक्सर यह माना जाता रहा है कि भाजपा की सफलता का मुख्य आधार मोदी की लोकप्रियता है। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनावों में कुछ सीटों की कमी के बावजूद, 2024-26 के राज्य चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन 2014-16 की तुलना में काफी बेहतर रहा है। यह दर्शाता है कि भाजपा अब केवल एक नेता पर निर्भर नहीं है, बल्कि उसने पार्टी संगठन, संघ नेटवर्क, औद्योगिक घरानों और राज्य संस्थाओं का एक ऐसा शक्तिशाली तंत्र बना लिया है जिसे भेदना कठिन है।
2. असम और बंगाल: ध्रुवीकरण की नई राजनीति
असम और पश्चिम बंगाल के उदाहरणों से है कि कैसे शासन की कार्यप्रणाली को ही वैचारिक रंग दे दिया गया है:
असम: यहाँ 'बांग्लादेशी मुस्लिम अप्रवासी' की श्रेणी को प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रियाओं (जैसे NRC और परिसीमन) का हिस्सा बना दिया गया है। यह केवल चुनावी भाषण नहीं, बल्कि शासन की संरचना का हिस्सा बन चुका है।
पश्चिम बंगाल: यहाँ भाजपा ने उन समुदायों (जैसे मतुआ और राजवंशी) की शिकायतों को एक व्यापक हिंदुत्व विमर्श में पिरोया है, जो पहले हाशिए पर थे।
3. 'इलेक्टोरल-प्रोफेशनल' पार्टी का उदय
एक महत्वपूर्ण बदलाव पार्टियों के चरित्र में आया है। अब पार्टियां केवल विचारधारा पर चलने वाले कैडरों का समूह नहीं रह गई हैं, बल्कि वे 'इलेक्टोरल-प्रोफेशनल' मशीन बन गई हैं।
इसमें चुनाव प्रबंधकों, सर्वेक्षकों और डेटा विशेषज्ञों की भूमिका बढ़ गई है।
कल्याणकारी योजनाओं का सीधा लाभ (Direct Cash Transfer) पहुँचाना अब राजनीति का नया 'टेक्नो-पेट्रिमोनियल' मॉडल बन गया है।
4. क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस की चुनौतियाँ
दक्षिण और पूर्व के राज्यों में ममता बनर्जी, एम.के. स्टालिन और पिनाराई विजयन जैसे नेताओं ने अपनी पार्टियों को एक 'मैनेजरियल' और अनुशासित मशीन में बदलने की कोशिश की है। हालांकि इन्होंने कुछ सफलता पाई है, लेकिन इसका एक नुकसान भी है:
राजनीति का 'वि-राजनीतिकरण' (Depoliticization) हो रहा है। जब राजनीति केवल प्रबंधन और लाभ पहुँचाने तक सीमित हो जाती है, तो वैचारिक जड़ें कमजोर पड़ती हैं।
यही कारण है कि कांग्रेस जैसे दल, जो आज भी पुरानी सांगठनिक शैली में फंसे हैं, भाजपा के इस 'संरचनात्मक सिस्टम' का मुकाबला करने में विफल हो रहे हैं।
आज की राजनीति में केवल चुनाव जीतना काफी नहीं है। भाजपा ने राज्य की संस्थाओं और सामाजिक विमर्श पर जो पकड़ बनाई है, वह उसे एक 'नेचुरल पार्टी ऑफ गवर्नेंस' के रूप में स्थापित कर रही है। विपक्ष के लिए चुनौती केवल मोदी का मुकाबला करना नहीं, बल्कि उस विशाल मशीनरी का विकल्प खोजना है जो अब शासन के हर हिस्से में घुस चुकी है।

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