वादों की अर्थी और तंत्र की लाठियाँ: बिहार में 'रोजगार' की खूनी हकीकत!
बिहार की राजनीति में 'बहाली' अब एक उम्मीद नहीं, बल्कि एक डरावनी चक्रव्यूह बनी है। TRE 4.0 के वोट बैंक पर हाल ही में हुआ बार्ब लाठीचार्ज इस बात का प्रमाण है कि सरकार के लिए युवाओं के लिए केवल 'वोट बैंक' हैं, 'भविष्य' नहीं। जब सत्य का हनक संवाद भारी प्रचार प्रसार पर आया, तो समझ लेना चाहिए कि तंत्र गुंग और बहरा हो चुका है।
बिहार की धरती, जो कभी ज्ञान और क्रांति का केंद्र बनती है, आज युवा छात्रों के उत्पीड़न का कुचक्र बन गया है। TRE 4.0 (शिक्षक अभ्यर्थियों) की प्रक्रिया में समर्थन और अपने अधिकार की मांग कर रहे शिक्षकों पर जिस तरह की बर्बरता की लाठी लाठियां बनी हैं, वह सरकार के 'रोजगार' के आधार की कलई खोल दी है। यह केवल लाठीचार्ज नहीं है, बल्कि बिहार के भविष्य और युवाओं के आत्मसम्मान पर एक प्रहार है।
शिक्षा वर्ग का तिरस्कार: जो युवा कल समाज को शिक्षा देने का दायित्व संभालने वाले थे, आज वे शिक्षा वर्ग पर शासन की संवेदनहीनता का शिकार हो रहे हैं। एक सभ्य समाज के लिए इससे अधिक लज्जाजनक स्थिति और क्या हो सकती है?
सरकार को यह दावा करना होगा कि कलम की शक्ति को लाठी के दम पर अधिक समय तक नहीं हटाया जा सकता। वादों और कहावतों के बीच यह तेज़ आगामी समय में सत्ता के लिए आत्महत्या सिद्ध होगी। यदि सरकार वास्तव में किशोरों के प्रति गंभीर है, तो उसे इस क्रूरता के लिए क्षमा मांगनी चाहिए और बहाली की प्रक्रिया को बंधन एवं दोषमुक्त बनाना चाहिए।
"जिस शासन में युवा न्याय के लिए सड़कों पर पीट जाते थे, उस शासन के पतन की स्थिति स्वयं व्यवस्था ही लिख रही है।"


Comments
Post a Comment