लोकतंत्र की 'हाइजैकिंग': विरासत, अपराध और पूंजी का त्रिकोण!

 





भारतीय राजनीति आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है जहाँ 'लोकतंत्र' (Democracy) धीरे-धीरे 'वंशतंत्र' (Dynasty) और 'धनतंत्र' (Plutocracy) में तब्दील होता जा रहा है। वह कार्यकर्ता, जिसने झंडे उठाए, लाठियां खाईं और गलियों की खाक छानी, आज हाशिये पर खड़ा होकर अपनी ही पार्टी के भीतर 'वंशवाद की बेल' को वटवृक्ष बनते देख रहा है।

1. वंशवाद: योग्यता की बलि और संघर्ष का अंत

जब संघर्ष से तपकर कोई कार्यकर्ता नेता बनता है, तो उसके विजन में जनता की समस्याओं की तपिश होती है। इसके विपरीत, राजनीतिक घरानों में पैदा हुए 'पैराशूट लीडर्स' बिना किसी सदन का अनुभव लिए सीधे मंत्री पद की शपथ लेते हैं।

डेटा का आईना: विभिन्न शोधों (जैसे 'India at the Polls') के अनुसार, भारतीय संसद में लगभग 30% से अधिक सांसद किसी न किसी राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखते हैं। युवा सांसदों (40 वर्ष से कम) के मामले में यह आंकड़ा 70% से भी ऊपर चला जाता है। यह दर्शाता है कि एक सामान्य मेधावी युवा के लिए राजनीति के द्वार लगभग बंद हैं।

2. अपराधीकरण: बाहुबल के आगे नतमस्तक नीतिशास्त्र

विरासत की राजनीति को बचाने के लिए अक्सर 'बाहुबल' का सहारा लिया जाता है। जो नेता जनता के बीच लोकप्रिय नहीं होते, वे डराने-धमकाने और बूथ कैप्चरिंग (अब डिजिटल युग में डेटा और प्रभाव के हेरफेर) के लिए अपराधियों को संरक्षण देते हैं।

कड़वा सच: ADR (Association for Democratic Reforms) की रिपोर्ट के अनुसार, 2019 के लोकसभा चुनाव में निर्वाचित 43% सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज थे, जिनमें से 29% पर गंभीर अपराध (हत्या, दुष्कर्म) के आरोप थे। जब रक्षक ही भक्षक की छवि वाले होंगे, तो 'जनकल्याण' केवल विज्ञापनों तक सीमित रह जाएगा।

3. पूंजीपतियों का कब्जा: 'क्रोनी कैपिटलिज्म' का उदय

आज सत्ता पर काबिज होना ही एकमात्र लक्ष्य बन गया है, और इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अकूत धन की आवश्यकता होती है। यहीं से शुरू होता है राजनेताओं और पूंजीपतियों का अपवित्र गठबंधन।

आर्थिक विषमता: चुनावी बॉन्ड (Electoral Bonds) और भारी डोनेशन के माध्यम से कॉर्पोरेट जगत पार्टियों को वित्तपोषित करता है। बदले में, नीतियां आम जनता के हित में नहीं बल्कि 'पूंजीपति मित्रों' के मुनाफे को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं। जहाँ गरीब की थाली से दाल गायब है, वहीं सत्ता के गलियारों में अरबपतियों की संपत्ति में रिकॉर्ड इजाफा हो रहा है।

4. भ्रष्टाचार: व्यवस्था की दीमक

जब बिना योग्यता के सीधे मंत्री पद 'गिफ्ट' में मिलता है, तो उत्तरदायित्व (Accountability) शून्य हो जाती है। ऐसे नेता सत्ता को सेवा का माध्यम नहीं, बल्कि निवेश की वसूली का जरिया मानते हैं। घोटालों की लंबी फेहरिस्त इस बात का प्रमाण है कि सरकारी खजाना जनहित के बजाय व्यक्तिगत तिजोरियां भरने में इस्तेमाल हो रहा है।

5. किनारे लगे 'विद्वान' और 'कर्मठ' कार्यकर्ता

सबसे दुखद स्थिति उन अनुभवी और विद्वान नेताओं की है, जो वैचारिक रूप से समृद्ध हैं लेकिन जिनके पास न तो कोई 'सरनेम' है और न ही अरबों का बैंक बैलेंस। वे सदन के भीतर या बाहर चुपचाप बैठने को मजबूर हैं क्योंकि वे 'जी-हजूरी' के दौर में फिट नहीं बैठते।

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