परीक्षा प्रणाली की शुचिता और संस्थागत विफलता: एक विश्लेषण!

  


 देश की प्रमुख प्रवेश परीक्षाओं के आयोजन में व्याप्त गंभीर अनियमितताओं और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल है। यह न केवल प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है, बल्कि लाखों युवाओं के भविष्य के साथ हो रहे खिलवाड़ को भी उजागर करता है। 

​पुनरावृत्ति और व्यवस्थागत दोष:   यह स्पष्ट है कि 'नीट-यूजी 2026' में पर्चा लीक (पेपर लीक) की घटना कोई इकलौती घटना नहीं है। इससे पहले 2021 और 2024 में भी गलत प्रश्नपत्र और संदिग्ध कृपांक (ग्रेस मार्क्स) जैसे विवाद सामने आ चुके हैं, जो दर्शाते हैं कि NTA अपनी पिछली गलतियों से सीखने में विफल रहा है।

​तकनीकी बनाम धरातली सुरक्षा: NTA का दावा है कि वह प्रश्नपत्रों की सुरक्षा के लिए 'जीपीएस-ट्रैकिंग' वाले वाहनों और 'एआई-सहायता' प्राप्त सीसीटीवी (CCTV) का उपयोग करता है। हालांकि, इन उन्नत तकनीकों के बावजूद पेपर का चुनिंदा छात्रों तक पहुँचना यह संकेत देता है कि समस्या तकनीकी नहीं, बल्कि नैतिक और संगठनात्मक है।

​मिलीभगत और माफिया का प्रभाव:  यह बिना आंतरिक मिलीभगत के इतनी कड़ी सुरक्षा को भेदना असंभव है। परीक्षा माफिया और संबंधित संस्थाओं के बीच गहरा गठजोड़ हो सकता है, जिसकी जड़ तक जाँच एजेंसियां अब तक नहीं पहुँच पाई हैं।

​सामाजिक और आर्थिक प्रभाव:  यह सबसे संवेदनशील पक्ष उन विद्यार्थियों का संघर्ष है जो अपनी ज़मीन गिरवी रखकर या भारी कर्ज लेकर कोचिंग और परीक्षा की तैयारी करते हैं। परीक्षा का रद्द होना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं है, बल्कि यह उन 23 लाख विद्यार्थियों के आर्थिक और मानसिक श्रम पर पानी फेरने जैसा है।


​अंततः, केवल सीबीआई (CBI) जांच सौंप देना समाधान नहीं है। व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए 'शून्य सहिष्णुता' (Zero Tolerance) की नीति अपनानी होगी। यदि समय रहते कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो देश की शिक्षा प्रणाली और योग्यता आधारित चयन प्रक्रिया से आम जनता का विश्वास पूरी तरह उठ जाएगा। 

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