भारतीय राजनीति: आदर्शों का पतन और जातिगत ध्रुवीकरण!

   


​यह समकालीन भारतीय राजनीति के बदलते स्वरूप पर एक गंभीर कटाक्ष  है। इसमें मुख्य रूप से तीन बिंदुओं को रेखांकित किया गया है:

​संवाद का गिरता स्तर: आज की राजनीति में वैचारिक विमर्श और नीतिगत चर्चाओं के बजाय आरोप-प्रत्यारोप की प्रधानता हो गई है। जनहित के वास्तविक मुद्दे गौण होते जा रहे हैं, जो लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है।

​सिद्धांत बनाम जाति: राजनीति से सैद्धांतिक आधार (Ideology) गायब हो रहे हैं। सिद्धांतों के स्थान पर 'जातीय आधार' अधिक प्रबल हो गए हैं। यही कारण है कि जाति जनगणना को एक ऐतिहासिक या 'युगप्रवर्तक' कदम माना जा रहा है, क्योंकि अब पूरी राजनीति इसी के इर्द-गिर्द सिमट गई है।

​तुष्टिकरण और जनसेवा का भ्रम: आजादी के बाद से पिछड़ों के उत्थान और आरक्षण की बातें तो हुईं, लेकिन धरातल पर उनकी स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं आया। अब राजनीति 'अति पिछड़ों' के तुष्टिकरण की ओर मुड़ गई है। विडंबना यह है कि आज इसी तुष्टिकरण की राजनीति को 'जनसेवा' का नाम देकर जायज ठहराया जा रहा है।

आधुनिक राजनीति जन-कल्याण के वास्तविक लक्ष्यों से भटककर जातिगत समीकरणों और एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने तक सीमित रह गई है। 

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