राज्यपाल: संवैधानिक मर्यादा या केंद्र का हस्तक्षेप?
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 के परिणाम स्पष्ट थे। सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली तमिलागा वेत्री कड़गम (TVK) 108 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। 59 वर्षों से राज्य की सत्ता पर काबिज दो प्रमुख द्रविड़ दलों (DMK और AIADMK) को जनता ने नकार दिया। इसके बावजूद, राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर ने सबसे बड़े दल के नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने के बजाय, उनसे 118 विधायकों के हस्ताक्षरित समर्थन पत्र की मांग की।
राज्यपाल का अधिकार क्षेत्र और उल्लंघन
संवैधानिक मर्यादा और विभिन्न आयोगों (सरकारिया, वेंकटचलैया और पुंछी आयोग) की सिफारिशों के अनुसार, चुनाव के बाद राज्यपाल का कार्य केवल उस व्यक्ति की पहचान करना है जो सदन का विश्वास हासिल करने की सबसे अधिक संभावना रखता हो। इसमें वरीयता क्रम स्पष्ट है:
चुनाव पूर्व गठबंधन (Pre-poll alliance)।
सबसे बड़ा एकल दल (Single largest party) जो सरकार बनाने का दावा पेश करे।
अतीत में गोवा (2017), मणिपुर (2017) और कर्नाटक (2018) जैसे राज्यों में भाजपा को 'सबसे बड़ा दल' न होने के बावजूद सरकार बनाने का अवसर दिया गया था। लेकिन तमिलनाडु में, जहाँ भाजपा का कोई प्रत्यक्ष हित नहीं था, राज्यपाल ने अचानक "पूर्ण बहुमत के अग्रिम प्रमाण" की शर्त रख दी।
अल्पमत सरकार और संवैधानिक परंपरा
भारतीय संसदीय इतिहास में अल्पमत सरकारें कोई नई बात नहीं हैं। अटल बिहारी वाजपेयी (1996), पी.वी. नरसिम्हा राव, एच.डी. देवेगौड़ा और मनमोहन सिंह (2004) की सरकारें इसके उदाहरण रही हैं। संविधान के अनुसार:
बहुमत का परीक्षण केवल सदन के पटल (Floor of the House) पर होना चाहिए, न कि राजभवन के कमरों में।
राज्यपाल द्वारा शपथ ग्रहण से पूर्व हस्ताक्षरित पत्रों की मांग करना एक "नया आविष्कार" है, जिसका कोई संवैधानिक आधार नहीं है।
लोकतंत्र के लिए खतरा
राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री को शपथ लेने के मात्र 72 घंटों के भीतर विश्वास मत हासिल करने का निर्देश देना अनुचित है। यह न केवल परंपराओं के विरुद्ध है, बल्कि विधायकों की "खरीद-फरोख्त" (Horse-trading) को भी बढ़ावा देता है।
राज्यपाल राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त होते हैं, निर्वाचित नहीं। उन्हें यह याद रखना चाहिए कि वे जनता के जनादेश और संविधान के प्रति जवाबदेह हैं, न कि केंद्र सरकार की राजनीतिक इच्छाओं के प्रति। राज्यपाल का कार्य लोकतंत्र की रक्षा करना है, न कि चुनी हुई सरकारों के मार्ग में अवरोध उत्पन्न करना।

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