तेल संकट: केवल कीमतों को दबाना ही काफी नहीं, अब रणनीतिक सुधारों की है बारी !

   


​आज के वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में भारत एक बड़ी चुनौती का सामना कर रहा है। 

​क्या सिर्फ पेट्रोल-डीजल की कीमतों को स्थिर रखना ही देश की अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए काफी है? आइए इसके मुख्य पहलुओं को समझते हैं।

​1. राजकोषीय गणित का दबाव

यदि कच्चे तेल की कीमतों में 50\% की वृद्धि होती है, तो भारत के लिए पेट्रोल और डीजल की आपूर्ति लागत में लगभग 25\% की बढ़ोत्तरी होती है।

​इसका अनुमानित राजकोषीय बोझ GDP का 0.6% है।

​यह राशि स्वास्थ्य क्षेत्र पर होने वाले कुल सरकारी खर्च से भी अधिक है।

​2. क्या मूल्य दमन सही नीति है?

​सरकार ने जनता को कीमतों के झटके से बचाने के लिए उत्पाद शुल्क (excise duty) में कटौती की है। हालांकि यह कदम गरीबों को राहत देने के उद्देश्य से उठाया गया है, लेकिन डेटा कुछ और ही कहानी कहता है:

​भारत के 80% से अधिक घर सीधे पेट्रोल या डीजल नहीं खरीदते हैं।

​सस्ते ईंधन का लाभ मुख्य रूप से उच्च आय वाले उन लोगों को मिलता है जिनके पास निजी वाहन हैं।

​अतः, सभी के लिए कीमतों को कम रखना एक "कुंद हथियार" की तरह है जो संसाधनों का सही वितरण नहीं कर पाता।

​3. रणनीतिक और संरचनात्मक चुनौतियाँ


​पतला भंडार: भारत का रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व चीन के मुकाबले 2\% से भी कम और अमेरिका के मुकाबले 5\% से भी कम है।

​आयात पर निर्भरता: भारत अपनी तेल जरूरतों का लगभग 90\% आयात करता है, जो इसे वैश्विक भू-राजनीतिक अस्थिरता के प्रति बहुत संवेदनशील बनाता है।

समाधान क्या हैं?


​लक्षित सहायता (Targeted Support): सभी के लिए कीमतें घटाने के बजाय केवल उन गरीब परिवारों को नकद हस्तांतरण या सब्सिडी दी जानी चाहिए जो ऊर्जा की बढ़ती कीमतों से सीधे प्रभावित होते हैं।

​मूल्य पास-थ्रू - धीरे-धीरे खुदरा कीमतों को वैश्विक कीमतों के साथ तालमेल बिठाने देना चाहिए ताकि राजकोषीय घाटा न बढ़े।

​रणनीतिक भंडार में वृद्धि: भविष्य के झटकों को सहने के लिए भारत को अपनी तेल भंडारण क्षमता को बढ़ाना होगा।

​नवीकरणीय ऊर्जा (RE Transition): जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने के लिए 'ग्रीन एनर्जी' की ओर संक्रमण की गति को तेज करना अनिवार्य है।

भारत ने पहले भी तेल संकटों का सामना किया है और इस बार भी कर लेगा। लेकिन चुनौती यह है कि हम केवल "अल्पकालिक झटके" को ही न सहें, बल्कि ऐसी "दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधार" करें जिससे अगले संकट के आने पर हमें अपनी विकास दर की बलि न देनी पड़े। 

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