​नियति की दरारें और आसमान की चुप्पी !

   


​ग्रामीण भारत के किसी खेत की मेड़ पर बैठा किसान जब फटी हुई जमीन को देखता है, तो उसे केवल मिट्टी की प्यास नहीं दिखती। उन दरारों में उसे कर्ज की परतें, महंगे बीजों का बोझ और बाजार की बेरुखी साफ नजर आती है। उसके लिए आसमान की चुप्पी किसी डरावने सन्नाटे से कम नहीं है।

​घाघ और भड्डरी: मौसम के भविष्यवक्ता

​जहाँ आज का शहरी व्यक्ति हाथ में मोबाइल लिए 'वेदर ऐप' (Weather App) पर बादलों की लोकेशन ट्रैक करता है और फिर भी असमंजस में रहता है, वहीं सदियों पहले कवि घाघ ने प्रकृति के संकेतों को पढ़ना सिखाया था। किसान आज भी उन दोहों में उम्मीद ढूँढता है:

​"कलसा पानी गरम है, चिड़िया नहावे धूर।

अंडा ले चींटी चले, तो बरखा हो भरपूर॥"

​घाघ कहते थे कि जब चिड़ियाँ धूल में नहाने लगें और चींटियाँ अपने अंडे लेकर सुरक्षित स्थान की ओर चलें, तो समझो कि झमाझम बारिश होने वाली है। यह केवल कविता नहीं, किसान का 'डाटा' था।

​बादल: एक वादा, एक आशंका

​किसान के लिए बादल केवल जलवाष्प का पुंज नहीं हैं। वह एक संभावना है—एक ऐसा वादा जो उसकी पूरी साल की मेहनत को या तो सोना बना सकता है या मिट्टी में मिला सकता है। भड्डरी ने इसी अनिश्चितता और सटीक अनुमान पर कहा था:

​"सावन शुक्ला सप्तमी, छपकर उगे भान।

भड्डर कहैं सुन भड्डरी, बरखा करै थान॥"

​अर्थात, सावन के महीने में प्रकृति के बदलते रंग ही तय करते हैं कि किसान के घर खुशहाली आएगी या दरिद्रता।

​शहर बनाम गाँव: नजरिए का अंतर

 शहर के लिए बारिश 'ट्रैफिक जाम' या 'पकौड़ों का मौसम' हो सकती है, लेकिन किसान के लिए यह जीवन और मरण का प्रश्न है।

​जहाँ ऐप (App) फेल हो जाते हैं, वहाँ किसान की बूढ़ी आँखें बादलों के रंग और हवा के रुख को देखकर बता देती हैं कि "पछुआ" चलेगी या "पुरवा"। वह आज भी आसमान की चुप्पी टूटने का इंतजार कर रहा है, क्योंकि उसके लिए बारिश की एक बूंद, बैंक के किसी भी 'लोन माफी' से बड़ी राहत है। 

आज की तकनीक के दौर में भी घाघ और भड्डरी की सूक्तियाँ उतनी ही प्रासंगिक हैं, क्योंकि वे हमें जमीन से जुड़कर मौसम को महसूस करना सिखाती हैं। किसान की वह फटी जमीन दरअसल समाज की संवेदनाओं में आई दरार है, जिसे केवल 'उम्मीद की बारिश' ही भर सकती है।

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