अकादमिक स्वतंत्रता पर प्रहार: लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी!
आज के दौर में किसी भी जीवंत लोकतंत्र की पहचान वहां मिलने वाली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और स्वतंत्र शिक्षण संस्थानों से होती है। लेकिन हालिया रिपोर्ट्स और वैश्विक सूचकांकों की मानें, तो भारत में 'अकादमिक स्वतंत्रता' (Academic Freedom) का दायरा तेजी से सिमट रहा है। यह केवल शिक्षा जगत का मुद्दा नहीं है, बल्कि हमारे लोकतांत्रिक ढांचे की नींव से जुड़ा प्रश्न है। रिपोर्ट्स क्या कहती हैं? विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संस्थानों द्वारा जारी हालिया डेटा एक चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं: V-Dem इंस्टीट्यूट (2026): भारत को 'चुनावी निरंकुशता' (Electoral Autocracy) की श्रेणी में रखा गया है। Scholars at Risk (Free to Think 2024): भारतीय अकादमिक स्वतंत्रता को 'पूरी तरह प्रतिबंधित' की श्रेणी में रखा गया है। बढ़ता दबाव: विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रम में बदलाव, शोध पर प्रतिबंध और बौद्धिक असहमति के लिए घटती जगह इसके मुख्य कारण हैं। असहमति का अपराधीकरण 2014 से 2026 के बीच लगभग 62 शिक्षाविदों को उनके राजनीतिक विचारों या स्वतंत्र राय के लिए दंडात्मक कार्रवाई का सामना करना पड़ा है। से...