मन की बेड़ियाँ !
मनोविज्ञान में इस स्थिति को अक्सर 'लर्न्ड हेल्पलेसनेस' या 'सीखी हुई विवशता' के रूप में देखा जाता है। अतीत का बोझ : जब मस्तिष्क बार-बार पुरानी असफलताओं को दोहराता है, तो वह एक सुरक्षात्मक तंत्र विकसित कर लेता है। व्यक्ति को लगता है कि चूंकि पहले परिणाम नकारात्मक थे, इसलिए भविष्य में भी नकारात्मक ही होंगे। आत्म-दोष : मनोवैज्ञानिक रूप से, जब व्यक्ति असफलता का श्रेय बाहरी परिस्थितियों के बजाय अपनी योग्यता को देने लगता है, तो उसका आत्म-सम्मान गिरने लगता है। हताशा और अवसाद: भविष्य के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण ही अवसाद की नींव है। "अब कुछ भी बदलना संभव नहीं है"—यह विचार व्यक्ति को 'फिक्स्ड माइंडसेट' में कैद कर देता है। २. सामाजिक दृष्टिकोण: समाज का पैमाना सामाजिक रूप से, यह स्थिति व्यक्ति और समाज के बीच के जटिल संबंधों को दर्शाती है: सफलता का सामाजिक दबाव: हमारा समाज अक्सर 'परिणाम' को 'प्रयास' से ऊपर रखता है। जब समाज केवल सफलता को पुरस्कृत करता है, तो असफल व्यक्ति खुद को हाशिए पर महसूस करने लगता है। तुलना की संस्कृति: सोशल मीडिया ...