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सुशासन का मुखौटा और भ्रष्टाचार का तांडव: जब फुलवारी अंचल में ‘कलम की मार’ भी कम पड़ जाए!

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   निगरानी के हत्थे चढा फुलवारी का राजस्व कर्मचारी. ​बिहार में 'सुशासन' शब्द अब केवल सरकारी विज्ञापनों और भाषणों की शोभा बढ़ाने तक सीमित रह गया है। जमीन पर हकीकत यह है कि जनता भ्रष्टाचारियों के मकड़जाल में कराह रही है और व्यवस्था अपनी आँखों पर पट्टी बांधे बैठी है। ताजा मामला फुलवारी शरीफ (पटना) के मैनपुर अंडा पंचायत का है, जहाँ निगरानी विभाग ने राजस्व कर्मचारी राणा रन विजय सिंह को डेढ़ लाख रुपये की रिश्वत लेते रंगे हाथों धर दबोचा। बसंत चक निवासी अजीत सिंह की शिकायत पर हुई इस कार्रवाई ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि अंचल कार्यालयों में बिना 'चढ़ावे' के पत्ता भी नहीं हिलता। ​धन की पिपासा और न्याय का कत्ल ​भ्रष्टाचारियों के भीतर धन कमाने की पिपासा इस कदर बढ़ चुकी है कि उन्हें न कानून का खौफ है और न ही जनता की हाय का डर। इनके लिए पैसे का वजन ही सही और गलत का पैमाना तय करता है। मोटी रकम मिलते ही ये चंद मिनटों में गलत काम को सही और सही काम को गलत साबित कर देते हैं। जमीन के कागजातों में हेराफेरी करना तो जैसे फुलवारी अंचल के रग-रग में बस चुका है। कैसे किसी की पुश्तैनी जमीन को...

​बिहार में 'बकैती, फेकेती और लठैती' की सरकार: राजद का बड़ा एलान, महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ राज्यव्यापी आंदोलन !

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    ​पटना, 3 जून 2026 — बिहार की सियासत में एक बार फिर गर्माहट आ गई है। प्रदेश की कानून व्यवस्था, आसमान छूती महंगाई, बेरोजगारी और संगठित भ्रष्टाचार के खिलाफ मुख्य विपक्षी दल राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने नीतीश-एनडीए सरकार के खिलाफ सीधे मोर्चे का एलान कर दिया है। राजद आगामी 9 जून से पूरे राज्य में दो चरणों में व्यापक आंदोलन और धरना प्रदर्शन करने जा रही है। ​इस सिलसिले में पटना में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए राजद के प्रदेश अध्यक्ष श्री मंगनी लाल मंडल और अन्य वरिष्ठ नेताओं ने वर्तमान सरकार पर तीखे हमले किए और इसे "बकैती, फेकेती और लठैती वाली सरकार" करार दिया। ​दो चरणों में होगा राज्यव्यापी धरना: जानें पूरा शेड्यूल ​राजद ने साफ कर दिया है कि आम जनता से जुड़े ज्वलंत मुद्दों को लेकर अब लड़ाई सड़कों पर लड़ी जाएगी। आंदोलन की रूपरेखा कुछ इस प्रकार तय की गई है: ​प्रथम चरण (9 जून 2026): बिहार के सभी प्रखंड (Block) मुख्यालयों पर राजद कार्यकर्ताओं और आम जनता द्वारा व्यापक व प्रभावकारी धरना दिया जाएगा। ​द्वितीय चरण (17 जून 2026): राज्य भर के सभी जिला मुख्यालयों पर बड़े स्...

वफादारी बनाम योग्यता: शासन व्यवस्था में विशेषज्ञों की भूमिका और भारतीय प्रधानमंत्रियों का इतिहास!

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  जवाहरलाल नेहरू और होमी भाभा, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी और एमएस स्वामीनाथन , इंदिरा-राजीव गांधी और सैम पित्रोदा, नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह ..  भारतीय लोकतंत्र और शासन व्यवस्था में हमेशा से एक बुनियादी यक्ष प्रश्न रहा है: वफादारी या योग्यता ? इतिहास गवाह है कि जब भी भारत के प्रधानमंत्रियों ने राजनीतिक वफादारी से ऊपर उठकर विषय-विशेषज्ञों और पेशेवरों (Professionals) पर भरोसा किया और उन्हें काम करने की खुली छूट दी, देश ने अभूतपूर्व और ऐतिहासिक उपलब्धियां हासिल की हैं। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: जब प्रधानमंत्रियों ने विशेषज्ञों को चुना भारत के विकास की नींव रखने में कई प्रधानमंत्रियों ने राजनीतिक जोखिम उठाकर भी सही प्रतिभाओं को सही जगह दी: जवाहरलाल नेहरू और होमी भाभा: साल 1948 में कैम्ब्रिज से प्रशिक्षित एक भौतिक विज्ञानी (होमी भाभा) ने नेहरू को आश्वस्त किया कि नए देश को एक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की आवश्यकता है। नेहरू ने बिना किसी राजनीतिक लाभ के परमाणु ऊर्जा आयोग को अपने कार्यालय के अधीन रखा और भाभा को पूरा राजनीतिक संरक्षण दिया। इसी तरह विक्रम साराभाई के प्रयासों से अंतरिक...

सच्चा कौन, मुखौटा कौन? योग्यता की कीमत कौड़ियों में है और चाटुकारिता का मूल्य आसमान छू रहा है।

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    ​अंधेर नगरी से लंका विजय तक: आज की राजसत्ता का एक रिपोर्ताज!  ​1. भूमिका: समय बदला, पर रंगमंच वही है ​साहित्य सिर्फ अतीत का आईना नहीं होता, वह भविष्य की बही-खाता भी होता है। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने जब 19वीं सदी में 'अंधेर नगरी चौपट राजा' लिखा, तो उनका निशाना तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत और विवेकहीन सत्ता थी। वहीं, हरिशंकर परसाई ने जब 'लंका विजय के बाद' जैसी रचनाओं के माध्यम से रामकथा के उत्तर-प्रसंगों पर व्यंग्यबाण चलाए, तो उनका टार्गेट आज़ाद भारत की वह सत्ता थी जो मर्यादा के नाम पर अपनी कमियों को छुपाती है। ​आज साल 2026 में जब हम देश-दुनिया की राजसत्ता को देखते हैं, तो ऐसा लगता है कि भारतेंदु का 'टक्के सेर भाजी, टके सेर खाजा' और परसाई की 'मर्यादावादी राजनीति' का कॉकटेल हमारे सामने परोस दिया गया है। यह रिपोर्ताज आज की सत्ता, उसके चाल-चरित्र और साहित्यिक प्रसंगों के बीच के अंतर्संबंधों की एक पड़ताल है। ​2. 'टका सेर' का नया दौर: आज की 'अंधेर नगरी' ​भारतेंदु के नाटक में एक ऐसी व्यवस्था थी जहाँ न्याय और अन्याय, योग्यता और अयोग्यता का मूल्य एक बरा...

न्यायालय की 'घंटी' और व्यवस्थागत सुधार: एक विश्लेषण!

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    यह  देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा 'सुओ मोटो' (स्वतः संज्ञान) के बढ़ते उपयोग पर चर्चा  है। मूल रूप से एक असाधारण और अत्यंत दृश्यमान अधिकार क्षेत्र माने जाने वाले स्वतः संज्ञान ने अब एक ऐसे 'पुनरावर्ती उपकरण' का रूप ले लिया है, जो मीडिया कवरेज और तात्कालिक चर्चाओं से प्रेरित होता है। यह प्रवृत्ति 'अदालत की अपनी घंटी' बजाने जैसी है, जो दृश्यमान हस्तक्षेपों पर केंद्रित है, जबकि जमीनी स्तर पर न्यायपालिका के बुनियादी ढांचे और सुधारों जैसे 'कठिन रास्ते' उपेक्षित रह जाते हैं। ​स्वतः संज्ञान का दृश्यीकरण और चुनौतियाँ: ​हाल के वर्षों में सर्वोच्च अदालत ने कई प्रमुख मामलों में स्वतः संज्ञान लिया है, जिससे उसे मीडिया की सुर्खियों में जगह मिली है। हालांकि यह त्वरित प्रतिक्रिया सुनिश्चित करता है, लेकिन यह सवाल उठाता है कि क्या यह दृष्टिकोण दीर्घकालिक न्यायिक सुधारों के लिए कारगर है। निचली अदालतों के सुधारों को पीछे धकेल सकता है, जो वास्तव में न्याय प्रणाली को मजबूत करने के लिए आवश्यक हैं। ​अदालत का ध्यान एक दुर्लभ संसाधन है। जब मीडिया की चर्चाएँ अदालत के कार्यों को...

ज्ञान की सार्थकता: उदारता, विवेक और आत्म-मंथन!

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     ​आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम सब कुछ न कुछ हासिल करने की होड़ में लगे हैं। कोई डिग्रियां बटोर रहा है, तो कोई सूचनाओं का अंबार। लेकिन क्या केवल जानकारियों को दिमाग में भर लेना ही वास्तविक ज्ञान या शिक्षा है? अनातोले फ्रांस का एक बेहद खूबसूरत है: ​"शिक्षा का यह मतलब नहीं है कि आपने कितना कुछ याद किया है, या यह कि आप कितना जानते हैं। इसका मतलब है कि आप जो जानते हैं और जो नहीं जानते हैं, उसमें अंतर कर पाएं।" ​यह विचार हमें सिखाता है कि सच्ची शिक्षा हमारे भीतर विनम्रता और विवेक पैदा करती है। यह हमें यह समझने की शक्ति देती है कि हमारा ज्ञान असीमित नहीं है, और अभी भी बहुत कुछ ऐसा है जो हमें सीखना बाकी है। जब हम अपनी अज्ञानता को स्वीकार करने का साहस जुटा पाते हैं, तभी हमारे भीतर वास्तविक बुद्धिमत्ता का जन्म होता है। ​ज्ञान का असली मर्म: बांटना और आत्म-मंथन ​सिर्फ यह जान लेना ही काफी नहीं है कि हम क्या जानते हैं; बल्कि जो ज्ञान हमारे पास है, उसका उपयोग हम समाज के लिए कैसे करते हैं, यह सबसे महत्वपूर्ण है।  ​"अगर कोई ज्ञानी है, तो अपने ज्ञान को उदारता के साथ सबको बांटते...

माटी के लाल का राष्ट्रीय क्षितिज पर उदय: श्याम नंदन बने राष्ट्रीय किसान मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष!

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    ​अदम्य साहस, निष्ठा और कर्मठता के पर्याय श्याम नंदन कुमार यादव को मिली तीन राज्यों की अतिरिक्त कमान; देश भर में हर्ष की लहर!  ​पटना, बिहार। माटी की सौंध को अपनी रगों में समेटे, संघर्षों की भट्टी में तपकर कुंदन बने नायक श्री श्याम नंदन कुमार यादव (ग्राम- चौड़ा, खुसरूपुर, पटना) को राष्ट्रीय किसान मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री सचिन सरोहा द्वारा संगठन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के गरिमामयी पद पर मनोनीत किया गया है। यह मनोनयन मात्र एक पद का हस्तांतरण नहीं, बल्कि उनके दीर्घकालीन सामाजिक-राजनैतिक तप, अटूट निष्ठा और अद्वितीय कार्यकुशलता को मिला एक राष्ट्रीय सम्मान है। ​अदम्य साहस और जीवटता के प्रतिमान ​श्याम नंदन बाबू का जीवन सादगी, अदम्य साहस और नेकदिली का एक अनुपम कोलाज है। वे जहाँ भी रहे, अपनी कर्मठता की अमिट छाप छोड़ी। उनकी इसी सांगठनिक प्रखरता और कृषक समाज के प्रति अनन्य अनुराग को देखते हुए राष्ट्रीय नेतृत्व ने उन पर यह महती जिम्मेदारी सौंपी है। उन्हें न केवल राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का दायित्व मिला है, बल्कि उत्तर प्रदेश, ओडिशा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में संगठन के विस्तार क...