सलाह एक, चालान अनेक / आगे रहने की भारी कीमत। ( कहानी) _ प्रो प्रसिद्ध कुमार।
पटना में जेठ-अषाढ़ की धूप हो और राजेंद्र नगर टर्मिनल पर आरपीएफ की चौकसी—ये दो ऐसी चीजें हैं जो इंसान का दिमाग तुरंत 'अपडेट' कर देती हैं। किस्सा हमारे मित्र प्रोफेसर साहेब का है। कॉमर्स कॉलेज, पटना में उत्तरपुस्तिकाओं का मूल्यांकन चल रहा था। कापियों के भारी-भरकम बोझ और राजेंद्र नगर पहुँचने की जल्दी में वे रोज परेशान होते थे। एक दिन मैंने दानापुर से ट्रेन पकड़ते समय उन्हें भी बड़प्पन वाली एक सरल मुफ़्त सलाह दे दी, "अरे प्रोफेसर साहेब! रोज़-रोज़ का झंझट छोड़िए, सीधे पैसेंजर ट्रेन पकड़िए और हमेशा 'आगे' रहा करिए! भीड़ कम मिलती है और राजेंद्र नगर उतरते ही सीधा निकास!" ज्ञान के भूखे प्रोफेसर साहेब ने 'आगे' शब्द को जीवन का परम सत्य मान लिया। अगले ही दिन वे स्टेशन पहुंचे और बिना दाएं-बाएं देखे पैसेंजर ट्रेन के सबसे 'आगे' वाले डिब्बे में सीना तानकर सवार हो गए। मन ही मन मुझे धन्यवाद भी दे रहे होंगे कि यार ने क्या जीवन बदलने वाली सलाह दी है। पर ट्रेन जैसे ही राजेंद्र नगर टर्मिनल के प्लेटफॉर्म पर रुकी, प्रोफेसर साहेब का 'आगे' रहने का सपना एक झटके ...