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भारत में 'मुफ्त उपहार' बनाम लोक कल्याण: एक आर्थिक विश्लेषण ! प्रो प्रसिद्ध कुमार, अर्थशास्त्र ,विभाग।

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    ​ अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन का प्रसिद्ध सिद्धांत "There’s No Such Thing As A Free Lunch" (दुनिया में कुछ भी मुफ्त नहीं मिलता) आज के भारतीय आर्थिक परिदृश्य में अत्यंत प्रासंगिक है। जब हम भारत में बिजली, पानी, बस यात्रा या अनाज को 'मुफ्त' मिलते हुए देखते हैं, तो अर्थशास्त्र की दृष्टि में वह 'मुफ्त' नहीं होता, बल्कि उसका भार कहीं और स्थानांतरित हो रहा होता है। ​1. अवसर लागत  का सिद्धांत ​भारत के संदर्भ में, यदि सरकार ₹10,000 करोड़ की राशि मुफ्त बिजली पर खर्च करती है, तो उसकी अवसर लागत वह स्कूल या अस्पताल है जो उस पैसे से बनाया जा सकता था। अर्थशास्त्र के अनुसार, संसाधनों का चयन ही सबसे बड़ी चुनौती है। ​2. वित्तीय घाटा और करदाता पर बोझ  ​सरकार के पास अपना कोई पैसा नहीं होता; वह या तो करदाताओं  से वसूला गया धन होता है या उधार लिया गया पैसा। ​प्रत्यक्ष प्रभाव: जब सब्सिडी बढ़ती है, तो सरकार का वित्तीय घाटा बढ़ता है। ​अप्रत्यक्ष प्रभाव: इस घाटे को भरने के लिए सरकार अधिक नोट छापती है या बाजार से कर्ज लेती है, जिससे मुद्रास्फीति (Inflation) बढ़ती है। अंततः, गरीब व...

उपभोक्तावाद का मायाजाल: व्यक्ति से वस्तु बनने की प्रक्रिया !

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    ​आज के दौर में बाजार केवल सामान खरीदने-बेचने का स्थान नहीं रह गया है, बल्कि यह एक ऐसी एकाधिकारवादी (Monopolistic) शक्ति बन चुका है जो मानवीय चेतना को नियंत्रित कर रही है। बाजार किस प्रकार एक व्यक्ति की मौलिकता को समाप्त कर उसे मात्र एक 'उपभोक्ता' की सांख्यिकीय इकाई में बदल देता है। ​बाजारवाद का मनोवैज्ञानिक एकाधिकार ​बाजारवाद का सबसे घातक पहलू 'प्रदर्शनकारी उपभोग' है। "हम दूसरों की तरह दिखना चाहते हैं।" बाजार हमारी हीनभावना का लाभ उठाता है और हमें यह विश्वास दिलाता है कि हमारी सामाजिक प्रतिष्ठा उन वस्तुओं से तय होती है जिन्हें हम खरीदते हैं। यह 'भेड़चाल' बाजार के एकाधिकार को और मजबूत करती है क्योंकि यहाँ व्यक्ति अपनी आवश्यकता से नहीं, बल्कि बाजार द्वारा निर्मित 'कृत्रिम मांग'  प्रेरित होता है। ​व्यक्ति बनाम उपभोक्ता: एक आर्थिक रूपांतरण ​आर्थिक शब्दावली में कहें तो बाजार 'उपभोक्ता संप्रभुता' का भ्रम पैदा करता है, जबकि असल में वह 'उपभोक्ता अधिशेष' को सोखने का काम करता है। ​समान धरातल का भ्रम: बाजार सबको एक समान धरातल पर लाने का...

दोहरी मार: अमेरिका का आंतरिक संकट और भारत पर टैरिफ का प्रहार !

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    ​आज अमेरिका एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहाँ उसकी आंतरिक विफलताएं और बाहरी व्यापारिक नीतियां आपस में टकरा रही हैं। हालिया आंकड़े और रिपोर्ट एक चौंकाने वाली सच्चाई बयान कर रहे हैं, जो न केवल अमेरिकी प्रशासन की कार्यक्षमता पर सवाल उठाते हैं, बल्कि भारत जैसे रणनीतिक साझेदारों के लिए भी आर्थिक चुनौतियां पेश कर रहे हैं। ​1. आंतरिक विफलता का 'प्रवासी' बहाना ​लंबे समय से अमेरिकी राजनीति में यह विमर्श बनाया गया कि 'फेंटानिल' जैसे जानलेवा नशीले पदार्थों की बाढ़ के लिए प्रवासी जिम्मेदार हैं। लेकिन आंकड़ों का निष्पक्ष विश्लेषण इस मिथक को तोड़ता है। रिपोर्टों के अनुसार, फेंटानिल तस्करी में शामिल लोगों में से 75% से अधिक अमेरिकी नागरिक हैं, न कि प्रवासी। ​यह प्रशासन की एक बड़ी नीतिगत विफलता है। जब तस्करी 'अपने ही घर' के नागरिकों द्वारा की जा रही है, तो सीमाओं पर प्रवासियों को दोष देना केवल एक राजनीतिक ढाल नजर आता है। विशेषज्ञों का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल के दौरान भी तस्करी के इन तरीकों में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया, जिससे स्पष्ट है कि समस्या 'बॉर्डर कंट्...

​आभासी संवेदनाएँ: डिजिटल सहानुभूति और शून्य होती सहभागिता !

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    ​डिजिटल युग ने न केवल हमारी जीवनशैली को बदला है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के स्वरूप को भी एक नए और अपरिचित साँचे में ढाल दिया है। आज के समय में संवेदनाएँ अब हृदय की गहराई से कम और अंगुलियों के स्पर्श से अधिक संचालित होती हैं। ​सहानुभूति का सतहीकरण सोशल मीडिया के इस दौर में किसी भी त्रासदी, विमर्श या सामाजिक मुद्दे से जुड़े आंकड़े, हृदयविदारक तस्वीरें और वीडियो क्षण भर में लाखों-करोड़ों आँखों तक पहुँच जाते हैं। सूचना का यह प्रवाह हमें यह आभास तो कराता है कि हम दुनिया से जुड़े हुए हैं, परंतु मनोवैज्ञानिक स्तर पर यह एक 'सतही जुड़ाव' मात्र है। जब हम किसी दुखद तस्वीर पर 'लाइक' करते हैं या 'दुखद' का इमोजी  साझा करते हैं, तो हमारा मस्तिष्क एक कृत्रिम संतोष का अनुभव करता है। इसे मनोविज्ञान में 'स्लैकटिविज़्म' कहा जा सकता है, जहाँ व्यक्ति को लगता है कि उसने अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली है, जबकि वास्तविकता में स्थिति अपरिवर्तित रहती है। ​प्रतिक्रिया बनाम सहभागिता  डिजिटल सहानुभूति हमें 'प्रतिक्रिया'  देना तो सिखाती है, पर 'सहभागिता' (Participation) ...

पत्रकार चंदू प्रिंस की माता सावित्री देवी का निधन, क्षेत्र में शोक की लहर !

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    खगौल (पटना): खगौल नगर के प्रतिष्ठित पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता चंदू प्रिंस की माता सावित्री देवी का 79 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके निधन की खबर से पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई है। निधन का कारण और पारिवारिक पृष्ठभूमि पारिवारिक सूत्रों के अनुसार, सावित्री देवी पिछले काफी समय से बीमार चल रही थीं। वे मानसिक अस्वस्थता से भी जूझ रही थीं, जिनका उपचार पटना के एक निजी अस्पताल में चल रहा था। रविवार शाम लगभग 06:55 बजे अपने निवास स्थान पर हृदय गति रुकने (हार्ट अटैक) के कारण उन्होंने अंतिम सांस ली। वे अपने पीछे 5 पुत्रों और 2 पुत्रियों सहित भरा-पूरा परिवार छोड़ गई हैं। उनके बड़े पुत्र रवि कान्त सिन्हा और छोटे पुत्र तारा कान्त सिन्हा ने बताया कि उनकी मां अत्यंत शांत और मिलनसार स्वभाव की महिला थीं, जो सदैव दूसरों के सुख-दुख में सहभागी बनती थीं। शोक व्यक्त करने वाली प्रमुख हस्तियां सावित्री देवी के निधन पर समाज के विभिन्न वर्गों और प्रशासनिक अधिकारियों ने गहरा दुख व्यक्त किया है। शोक प्रकट करने वालों में मुख्य रूप से शामिल हैं: राजनीतिक एवं प्रशासनिक: बिहार के कृषि मंत्री रा...

खगौल के सांस्कृतिक क्षितिज पर नई चमक: नगर परिषद की पहल से संवर रहा 'कला मंच'!

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    ​खगौल। महान गणितज्ञ आर्यभट्ट की ऐतिहासिक भूमि 'खगौल' अपनी सांस्कृतिक विरासत को नया आयाम देने के लिए तैयार है। नगर परिषद, खगौल के अध्यक्ष श्री सुजीत कुमार की दूरदर्शिता से बड़ी खगौल स्थित देवी स्थान परिसर में कला मंच, ड्रेसिंग रूम और शेड का निर्माण कार्य अंतिम चरण में है। ​सांस्कृतिक चेतना को समर्पित पहल नगर परिषद के अध्यक्ष सुजीत कुमार के नेतृत्व में षष्ठम वित्त योजना (योजना सं. 04/2024-25) के तहत ₹21.67 लाख की लागत से इस परियोजना को धरातल पर उतारा गया है। बजट सत्र 2025-26 के व्यापक विकास लक्ष्यों के बीच, यह कला मंच कलाकारों के प्रति परिषद के सम्मान का प्रतीक है। ​गुणवत्ता का निरीक्षण   अध्यक्ष सुजीत कुमार ने रंगकर्मी नवाब आलम,  अरुण सिंह पिंटू और शोएब कुरैशी के साथ निर्माण स्थल का भ्रमण किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि निर्माण की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं होगा। इस दौरान रंगकर्मियों ने हर्ष व्यक्त करते हुए कहा कि नए साल में यह मंच स्थानीय प्रतिभाओं के लिए एक अनमोल उपहार साबित होगा। ​सर्वांगीण विकास का संकल्प अध्यक्ष सुजीत कुमार ने कहा, "खगौल की माटी ने हमेशा प्रतिभ...

नशा: सामाजिक पतन का मूक हथियार और मनोवैज्ञानिक त्रासदी !

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  आज के वैश्विक परिदृश्य में नशा केवल एक व्यक्तिगत बुराई नहीं रह गया है, बल्कि यह एक रणनीतिक और सामाजिक संकट बन चुका है। नशीले पदार्थों का उपयोग किसी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को ध्वस्त करने और समाज में बिखराव पैदा करने के लिए एक 'हथियार' के रूप में किया जा सकता है। लेकिन इसके पीछे छिपी मनोवैज्ञानिक तबाही इससे भी कहीं अधिक गहरी है। 1. परिवारों का विघटन: एक मौन महामारी जब घर का एक सदस्य नशे की गिरफ्त में आता है, तो पूरा परिवार 'सह-निर्भरता' के चक्र में फंस जाता है। आर्थिक असुरक्षा: घर की जमा-पूंजी नशे की भेंट चढ़ जाती है, जिससे बच्चों की शिक्षा और बुनियादी जरूरतें प्रभावित होती हैं। घरेलू हिंसा: मनोवैज्ञानिक रूप से, नशा व्यक्ति के नियंत्रण केंद्र को प्रभावित करता है, जिससे वह हिंसक और चिड़चिड़ा हो जाता है। इसका सीधा परिणाम घर की महिलाओं और बच्चों पर मानसिक एवं शारीरिक प्रताड़ना के रूप में निकलता है। 2. मानसिक स्वास्थ्य और नशे का दुष्चक्र नशा और मानसिक रोग एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं। लोग अक्सर तनाव, अवसाद या अकेलेपन से बचने के लिए नशे का सहारा लेते हैं, जिसे मनोविज्ञान में...