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दानापुर मंडल से 17 रेलकर्मी सम्मानपूर्वक सेवानिवृत्त: जानें विदाई समारोह की खास बातें!

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  दानापुर मंडल रेल कार्यालय के सभागार में 31 अगस्त 2026 को अगस्त माह में सेवामुक्त हुए 17 रेलकर्मियों के लिए एक भव्य "समापक भुगतान समारोह" का आयोजन किया गया। इस भावुक और गरिमामय कार्यक्रम में सेवानिवृत्त हो रहे कर्मियों को उनकी वर्षों की निष्ठावान सेवा के लिए सम्मानित कर विदाई दी गई। समारोह की प्रमुख झलकियां सम्मान और विदाई: अपर मंडल रेल प्रबंधक (इन्फ्रा), श्री राजीव कुमार ने सभी 17 सेवानिवृत्त रेलकर्मियों को अंगवस्त्र और समापक भुगतान के जरूरी दस्तावेज सौंपकर सम्मानित किया। कार्यक्रम की शुरुआत: वरीय मंडल कार्मिक अधिकारी, श्री अतुल कुमार ने स्वागत भाषण के साथ समापक भुगतान का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया। सुरक्षित भविष्य और निवेश की सलाह: ADRM श्री राजीव कुमार ने कर्मियों के सुखद और स्वस्थ जीवन की कामना करते हुए एक महत्वपूर्ण सलाह दी। उन्होंने सभी से अपील की कि वे अपने समापक भुगतान की गाढ़ी कमाई को किसी भी असुरक्षित या जोखिम भरी जगह पर निवेश न करें। स्वास्थ्य और दीर्घायु का मंत्र: समारोह में एक्युप्रेशर और आयुर्वेदिक डॉक्टरों को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था, जिन्होंने सेवान...

जब पश्चिमी जगत ने ढूंढा भगवद्गीता में मॉडर्न मैनेजमेंट का 'मास्टरकी'!

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    जब भी घर की अलमारी में रखी 'भगवद्गीता' पर नज़र पड़ती है, तो अमूमन मन में विचार आता है—यह तो जीवन के अंतिम पड़ाव या बुजुर्गों के पढ़ने की चीज़ है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस किताब को हम केवल पूजा-पाठ और मोक्ष का साधन मानते रहे, दुनिया के सर्वश्रेष्ठ मैनेजमेंट गुरु उसमें भविष्य के लीडर्स तैयार करने का सूत्र खोज रहे हैं? यह ठीक वैसा ही है जैसे सदियों से हमारी रसोई और आँगन में उगने वाला 'ग्वारपाठा' जब तक 'एलोवेरा' बनकर खूबसूरत बोतलों में नहीं आया, हमने उसकी कीमत नहीं समझी। जब योग 'योगा' बनकर पश्चिम से लौटा, तब हमने उसे दिनचर्या में शामिल किया। अब यही कहानी भगवद्गीता के साथ दोहराई जा रही है।  2008 में इस कैथोलिक यूनिवर्सिटी ने अपने कोर करिकुलम में भगवद्गीता को शामिल करके पूरी दुनिया को चौंका दिया था। दर्शनशास्त्र और मानव जीवन के मूल्यों को समझने के लिए विदेशी छात्र गीता के अध्यायों का अध्ययन कर रहे हैं। इतना ही नहीं, हार्वर्ड से लेकर भारत के IIMs तक—आज हर जगह 'अध्याय 2 का 47वाँ श्लोक' (कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन) किसी भी मॉडर्न मैन...

पटरियों से उड़ान तक: जब एक शिक्षक दंपत्ति ने बदल दी बरौनी स्टेशन के बेसहारा बच्चों की तकदीर! -प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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     बिहार के बरौनी रेलवे स्टेशन पर जहाँ ट्रेनों की आवाजाही और मुसाफिरों की हलचल रहती थी, वहीं पटरियों के किनारे जिंदगी से हारे मासूमों का एक दूसरा ही संसार था। भीख मांगना, बाल मजदूरी और नशे के दलदल में धंसते बचपन के बीच साल 2013 में उम्मीद की एक ऐसी किरण जगी, जिसने दर्जनों जिंदगियों का रुख मोड़ दिया। यह कहानी है बेगूसराय के शिक्षक दंपत्ति अजीत कुमार और शबनम मधुकर की। अजीत जी खुद अपने बचपन में पटरियों पर संघर्ष का दौर देख चुके थे, इसलिए इन बच्चों का दर्द उनसे बेहतर कौन समझ सकता था? इसी दर्द ने उन्हें और उनकी पत्नी को इन बच्चों की जिंदगी संवारने का बीड़ा उठाने के लिए प्रेरित किया। इस मुहिम में उनके दोनों बेटों ने भी कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया। ममता की छांव और अनुशासन का संगम यह अनोखी पाठशाला किसी आलीशान इमारत में नहीं, बल्कि खुले आसमान के नीचे पटरियों के किनारे चलती थी। ममता का टिफिन: शबनम जी हर सुबह दर्जनों बच्चों के लिए खुद अपने हाथों से खाना बनाकर लाती थीं, ताकि कोई भी बच्चा भूखे पेट पढ़ाई न करे। अनुशासन की नींव: अजीत जी बच्चों को अनुशासन के साथ शिक्षा का पाठ पढ़ाते थ...

अपवाद की स्थिति: क्या भारत में भेदभाव सामान्य बनता जा रहा है?

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     वर्ष 2007 के बाद पहली बार संयुक्त राष्ट्र नस्लीय भेदभाव उन्मूलन समिति (CERD) द्वारा भारत में नस्लीय व जातीय भेदभाव की स्थिति की गहन समीक्षा की गई है। इस समीक्षा में समिति ने अल्पसंख्यकों, दलितों और गैर-नागरिकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा, डेटा में पारदर्शिता की कमी तथा मानवाधिकार निकायों की स्वायत्तता में आई गिरावट पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। यह रिपोर्ट भारत की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं, नीतिगत चिंताओं और नागरिक समाज की वर्तमान स्थिति का एक स्पष्ट और विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करती है। UN-CERD रिपोर्ट: मुख्य बिंदु और वैश्विक चिंताएं संयुक्त राष्ट्र की नस्लीय भेदभाव उन्मूलन समिति (CERD) ने भारत द्वारा 'सभी प्रकार के नस्लीय भेदभाव के उन्मूलन पर अंतर्राष्ट्रीय कन्वेंशन (1968)' के अनुपालन पर अपनी समीक्षा रिपोर्ट जारी की है। हिंसा पर चिंता: समिति ने कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा अल्पसंख्यक एथनिक व धार्मिक समूहों, दलितों और गैर-नागरिकों के प्रति हिंसा पर "गंभीर चिंता" व्यक्त की है। 'नस्ल' बनाम 'जाति' का तर्क: भारत सरकार का रुख रहा है कि 'जातिगत भेदभा...

लेबल से आगे: भारत को स्वस्थ खान-पान की ओर कैसे मोड़ें?

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  भारत में पैक्ड खाद्य पदार्थों के सामने वाले हिस्से पर पोषण संबंधी चेतावनी लागू करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरुआत हुई है। हालाँकि, केवल लेबल लगाने से सीमित और जागरूक वर्ग को ही लाभ मिलेगा। व्यापक प्रभाव के लिए भारत को अपनी कर नीतियों, औद्योगिक प्रोत्साहनों , कॉरपोरेट प्राथमिकताओं और स्कूली शिक्षा को स्वास्थ्य उद्देश्यों के साथ एकीकृत करना होगा। FSSAI ने उच्चतम न्यायालय में पैक्ड खाद्य पदार्थों पर अत्यधिक वसा (Fat), चीनी (Sugar), नमक (Salt) या कृत्रिम मिठास होने पर लाल षट्कोणीय (Red Hexagonal) चेतावनी देने का प्रस्ताव रखा है।  चिली और मेक्सिको जैसे देशों में प्रत्येक नुकसानदेह तत्व (नमक, चीनी, संतृप्त वसा) के निर्धारित सीमा से अधिक होने पर अलग-अलग स्पष्ट चेतावनियाँ दी जाती हैं।  भारत को भी 'एक सीमा से अधिक पोषक तत्व = एक चेतावनी', 'दो तत्व = दो चेतावनियाँ' जैसा सरल मॉडल अपनाना चाहिए। इससे उपभोक्ता बिना भ्रमित हुए सही चुनाव कर सकेंगे। स्पष्ट चेतावनियाँ खाद्य निर्माताओं को अपने उत्पादों में चीनी, नमक या वसा की मात्रा घटाने के लिए एक प्रत्यक्ष व्यावसायिक प्रोत्साहन देत...

जब प्रकृति बोले, मानवता को सुनना होगा ।

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  नेपाल-तिब्बत हिमालय क्षेत्र में आई हालिया विनाशकारी बाढ़ केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण मानवता के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यह घटना हमें याद दिलाती है कि भले ही हमने अपनी राजनीतिक और राष्ट्रीय सीमाएं बना ली हों, लेकिन हम सभी एक ही आसमान के नीचे सांस लेते हैं और एक परस्पर जुड़े हुए पारिस्थितिक तंत्र का हिस्सा हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार उच्च तापमान और तेजी से पिघलती बर्फ ने इस विभीषिका में बड़ी भूमिका निभाई है। पिछले तीन दशकों में नेपाल अपने ग्लेशियरों की लगभग एक-तिहाई बर्फ खो चुका है। यहाँ एक गहरा विरोधाभास देखने को मिलता है: नेपाल वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में मात्र 0.05% (2024 के आंकड़ों के अनुसार) का योगदान देता है। फिर भी, न्यूनतम कार्बन उत्सर्जन करने के बावजूद यह देश जलवायु परिवर्तन के सबसे खतरनाक दुष्प्रभावों को झेलने के लिए मजबूर है। प्रकृति किसी राष्ट्रीय सीमा को नहीं मानती। एक जगह उत्सर्जित कार्बन पूरे वातावरण को प्रभावित करता है; नदियों, ग्लेशियरों और हवाओं को पासपोर्ट की आवश्यकता नहीं होती। इस संकट से निपटने के लिए विभिन्न आध्यात्मिक परंपराएं हमें प्रकृति...

रंगमंच के संवाहक: पद्मश्री सतीश आनंद और 'कला संगम' का स्वर्णिम सफर!

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  भारतीय रंगमंच की बात जब भी होगी, तब बिहार और देश के नाटकीय परिदृश्य को नई पहचान देने वाले वरिष्ठ नाट्य निर्देशक और अभिनेता सतीश आनंद का नाम अत्यंत आदर के साथ लिया जाएगा। पांच दशकों से अधिक समय तक थिएटर को समर्पित रहे सतीश आनंद ने न केवल रंगमंच को जिया, बल्कि उसे लोक संस्कृति और आधुनिक चेतना के साथ जोड़कर एक नया विस्तार भी दिया। 'कला संगम' की स्थापना और नाट्य क्रांति सतीश आनंद जी का सबसे ऐतिहासिक योगदान रहा 'कला संगम' नाट्य संस्था की स्थापना। 1970 के दशक में पटना में स्थापित यह संस्था केवल नाटक खेलने का मंच नहीं बनी, बल्कि इसने बिहार में एक सांस्कृतिक क्रांति का रूप ले लिया। प्रतिभाओं को मंच: 'कला संगम' के माध्यम से उन्होंने कई युवा कलाकारों को तराशा, जो आगे चलकर राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय सिनेमा, टेलीविजन और रंगमंच के बड़े स्तम्भ बने। प्रयोगधर्मी नाट्य शैली: उन्होंने पारंपरिक लोक कलाओं (विशेषकर 'विदेशिया' जैसी बोलियों और शैलियों) को आधुनिक नाट्य सिद्धांतों के साथ पिरोया। उनके निर्देशकीय कौशल ने क्षेत्रीय नाटकों को राष्ट्रीय पहचान दिलाई। प्रमुख प्रस्तुतिय...