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मन की बेड़ियाँ !

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    ​मनोविज्ञान में इस स्थिति को अक्सर 'लर्न्ड हेल्पलेसनेस' या 'सीखी हुई विवशता' के रूप में देखा जाता है। ​अतीत का बोझ : जब मस्तिष्क बार-बार पुरानी असफलताओं को दोहराता है, तो वह एक सुरक्षात्मक तंत्र विकसित कर लेता है। व्यक्ति को लगता है कि चूंकि पहले परिणाम नकारात्मक थे, इसलिए भविष्य में भी नकारात्मक ही होंगे। ​आत्म-दोष : मनोवैज्ञानिक रूप से, जब व्यक्ति असफलता का श्रेय बाहरी परिस्थितियों के बजाय अपनी योग्यता को देने लगता है, तो उसका आत्म-सम्मान गिरने लगता है। ​हताशा और अवसाद: भविष्य के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण ही अवसाद  की नींव है। "अब कुछ भी बदलना संभव नहीं है"—यह विचार व्यक्ति को 'फिक्स्ड माइंडसेट' में कैद कर देता है। ​२. सामाजिक दृष्टिकोण: समाज का पैमाना ​सामाजिक रूप से, यह स्थिति व्यक्ति और समाज के बीच के जटिल संबंधों को दर्शाती है: ​सफलता का सामाजिक दबाव: हमारा समाज अक्सर 'परिणाम' को 'प्रयास' से ऊपर रखता है। जब समाज केवल सफलता को पुरस्कृत करता है, तो असफल व्यक्ति खुद को हाशिए पर महसूस करने लगता है। ​तुलना की संस्कृति: सोशल मीडिया ...

​वायु प्रदूषण: मात्र पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि एक सामाजिक और स्वास्थ्य संकट !

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    ​आज के समय में वायु प्रदूषण भारत के लिए केवल एक वैज्ञानिक या पर्यावरणीय चर्चा का विषय नहीं रह गया है। यह एक गहरा सामाजिक और आर्थिक संकट बन चुका है, जो सीधे तौर पर गरीबी, असमानता और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा है। ​1. असमानता और प्रदूषण का प्रभाव प्रदूषण की मार समाज के हर वर्ग पर एक समान नहीं पड़ती। गरीब बस्तियां, असंगठित क्षेत्र के मजदूर और सड़कों के किनारे रहने वाले लोग इसके सबसे बड़े शिकार हैं। उनके पास प्रदूषण से बचने के लिए महंगे एयर प्यूरीफायर या सुरक्षित वातावरण के साधन नहीं हैं, जिसके कारण वे सबसे अधिक स्वास्थ्य जोखिम झेलते हैं। ​2. वित्तीय सहायता और स्वच्छ ऊर्जा की चुनौती यदि वैश्विक वित्तीय सहायता केवल जीवाश्म ईंधन आधारित परियोजनाओं पर केंद्रित रही, तो भारत का 'स्वच्छ ऊर्जा अभियान' धीमा पड़ सकता है। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने के लिए निवेश का रुख हरित ऊर्जा की ओर मोड़ना अनिवार्य है। ​3. भविष्य के खतरे: जलवायु और स्वास्थ्य आपदा ​यदि कोयला आधारित बिजली संयंत्र, भारी उद्योग और डीजल वाहनों पर निर्भरता कम नहीं की गई, तो इसके परिणाम दोहरे होंगे: ​जलवायु संकट: वैश्व...

​राम लखन सिंह यादव (आर.एल.एस.वाई.) कॉलेज में शोक सभा का आयोजन: कॉलेज ऑफ कॉमर्स के प्राचार्य डॉ. इंद्रजीत प्रसाद राय के निधन पर जताया गहरा दुख !

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आज स्थानीय राम लखन सिंह यादव कॉलेज, अनीसाबाद के प्रांगण में एक शोक सभा का आयोजन किया गया। यह सभा कॉलेज ऑफ कॉमर्स, आर्ट्स एंड साइंस के निवर्तमान प्राचार्य डॉ. इंद्रजीत प्रसाद  राय के असामयिक निधन पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए बुलाई गई थी। उनके निधन की खबर से पूरे कॉलेज परिवार में शोक की लहर दौड़ गई। ​शिक्षा जगत के साथ-साथ व्यक्तिगत क्षति: प्रो. सुरेंद्र प्रसाद कॉलेज के प्राचार्य प्रो. सुरेंद्र प्रसाद ने अत्यंत भावुक होते हुए डॉ. राय को याद किया। उन्होंने बताया, "श्री राय मेरे सहपाठी थे। हमने वर्ष 1984 में पटना विश्वविद्यालय के वाणिज्य संकाय से एक साथ स्नातकोत्तर (PG) की शिक्षा प्राप्त की थी। उनका निधन शिक्षा जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति तो है ही, साथ ही यह मेरी व्यक्तिगत क्षति भी है। उनके कुशल नेतृत्व में कॉलेज ऑफ कॉमर्स ने विकास की नई ऊंचाइयों को छुआ और उन्होंने हमेशा समय पर पाठ्यक्रम पूरा करने व शैक्षणिक अनुशासन पर जोर दिया।" ​शोक सभा में उपस्थित गणमान्य इस अवसर पर कॉलेज के शिक्षकों और कर्मचारियों ने दो मिनट का मौन रखकर दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की। शो...

​सत्ता की देहरी पर दम तोड़ती मासूमियत: पटना हॉस्टल कांड की रूह कंपा देने वाली दास्तां!😢😢😢

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    ​विश्वास का कत्ल और रसूख का पहरा ! ​जहानाबाद से सपनों का बस्ता लेकर 5 जनवरी को पटना पहुंची उस बच्ची को क्या पता था कि जिस 'शंभू गर्ल्स हॉस्टल' को वह अपना सुरक्षित ठिकाना समझ रही है, वह वास्तव में भेड़ियों की मांद है। हॉस्टल की मालकिन नीलम अग्रवाल और उसके बेटों का रसूख, और उस बिल्डिंग के मालिक मनीष रंजन का संदिग्ध अतीत—जिस पर सांसद पप्पू यादव ने पहले ही सेक्स रैकेट चलाने के गंभीर आरोप लगाए हैं—सब मिलकर एक ऐसा जाल बुन रहे थे जिसमें एक मध्यमवर्गीय परिवार की उम्मीदों की बलि चढ़नी तय थी। ​६ जनवरी: रहस्यमयी खामोशी और षड्यंत्र की शुरुआत ​हॉस्टल प्रशासन की संवेदनहीनता देखिए—बच्ची की तबीयत बिगड़ी, वह पास के डॉक्टर सहजानंद के अस्पताल में भर्ती कराई गई, लेकिन परिजनों को इसकी सूचना हॉस्टल की मालकिन या स्टाफ ने नहीं, बल्कि किसी अनजान शख्स ने दी। ​संदेह का घेरा: आखिर डॉक्टर सहजानंद के अस्पताल से उसे आनन-फानन में प्रभात मेमोरियल क्यों शिफ्ट किया गया? ​पुलिस की संदिग्ध भूमिका: घटना के पहले ही दिन एक महिला सब-इंस्पेक्टर का अस्पताल पहुंचना और अपना नंबर देना, क्या किसी गहरी साजिश की आहट थी या...

कोइलवर पुल: इंजीनियरिंग का कालजयी चमत्कार और सोन का गौरव !

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  ​बिहार की हृदयस्थली में सोन नदी के ऊपर शान से खड़ा कोइलवर पुल (अब्दुल बारी पुल) केवल ईंट, पत्थर और लोहे का ढांचा नहीं है, बल्कि यह 163 वर्षों के निरंतर इतिहास का साक्षी है। 1862 में निर्मित यह पुल आज भी आधुनिक इंजीनियरिंग के लिए एक मिसाल बना हुआ है। ​निर्माण और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ​इस पुल की नींव 1856 में रखी गई थी। हालांकि, 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के कारण इसके निर्माण में कुछ बाधाएँ आईं, लेकिन अंततः 15 जून 1862 को भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड एल्गिन ने इसका उद्घाटन किया। ​डिजाइनर: जेम्स मीडोज रेंडेल और सर मैथ्यू डिग्बी वायट। ​विशेषता: उस समय यह एशिया का सबसे लंबा पुल था और आज यह भारत का सबसे पुराना चालू 'रेल-सह-सड़क' (Rail-cum-Road) पुल है। ​सामग्री: इसके निर्माण में उच्च कोटि के 'रोट आयरन' (Wrought Iron) का प्रयोग किया गया था, जिसकी मजबूती का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि डेढ़ सदी बीत जाने के बाद भी इसके पिलर अडिग हैं। ​वास्तुकला की भव्यता (Double Decker Structure) ​कोइलवर पुल अपनी दोहरी संरचना के लिए प्रसिद्ध है। यह एक डबल डेकर पुल है: ​ऊप...

दरभंगा राज की अंतिम देदीप्यमान स्मृति: महारानी कामसुंदरी देवी !

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    ​भारतीय इतिहास के झरोखों में कुछ ऐसे व्यक्तित्व होते हैं जो अपनी भव्यता से अधिक अपनी सादगी और त्याग के लिए अमर हो जाते हैं। मिथिला की पावन धरती और दरभंगा राज के गौरवशाली इतिहास का एक ऐसा ही स्वर्णिम अध्याय महारानी कामसुंदरी देवी के निधन के साथ विश्राम पा गया। वे केवल एक राजघराने की अंतिम महारानी नहीं थीं, बल्कि एक युग की साक्षात साक्षी और मानवीय मूल्यों की प्रतिमूर्ति थीं। ​त्याग की अनुपम मिसाल ​इतिहास के पन्नों में वर्ष 1962 का भारत-चीन युद्ध केवल संघर्ष की गाथा नहीं है, बल्कि राष्ट्रभक्ति की पराकाष्ठा का भी प्रतीक है। जब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने देश से सहयोग का आह्वान किया, तब महारानी कामसुंदरी देवी के नेतृत्व में दरभंगा राज परिवार ने 600 किलो सोना भारतीय सेना को दान कर दिया। यह दान केवल धातु का अर्पण नहीं था, बल्कि अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए एक राजसी वैभव का सहर्ष समर्पण था। ​साधारण परिवेश से राजसी गरिमा तक ​22 अक्टूबर 1932 को मधुबनी के मंगरौनी गांव के एक साधारण परिवार में जन्मी कामसुंदरी देवी का जीवन सादगी और शालीनता का संगम था। मात्र आठ वर्ष की अल्पा...

​शिक्षा के प्रति सरकारी निद्रा: जब न्यायपालिका को संभालनी पड़े शैक्षणिक कमान !-प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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     ​किसी भी राष्ट्र के विकास की नींव उसकी शिक्षा व्यवस्था होती है। लेकिन भारत में उच्च शिक्षा के वर्तमान हालात को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि यह नींव ही खोखली हो चुकी है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों में खाली पड़े शिक्षकों और गैर-शैक्षणिक पदों को चार माह के भीतर भरने का आदेश देना इस बात का प्रमाण है कि सरकार शिक्षा के प्रति गहरी नींद में सोई हुई है। यह विडंबना ही है कि जो काम प्रशासन को अपनी प्राथमिकता में रखना चाहिए था, उसके लिए देश की सर्वोच्च अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ रहा है। ​आंकड़ों में छिपी बदहाली देश के विभिन्न राज्यों में स्थिति भयावह है: ​मध्य प्रदेश: 19 सरकारी विश्वविद्यालयों में से 15 में 70% से ज्यादा पद खाली हैं। ​हरियाणा: कई विश्वविद्यालयों में पिछले 6 से 8 वर्षों से प्रोफेसरों की भर्ती ही नहीं हुई है, जिससे 60% पद रिक्त पड़े हैं। ​बिहार: विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के लगभग 4000 पद रिक्त हैं। ​इतना ही नहीं, केंद्रीय विश्वविद्यालय भी इस समस्या से अछूते नहीं हैं। यहाँ तक कि कुलपतियों और रजिस्ट्रार जैसे प्रशासनिक पद भी खाली पड़े है...