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सलाह एक, चालान अनेक / आगे रहने की भारी कीमत। ( कहानी) _ प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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    पटना में जेठ-अषाढ़ की धूप हो और राजेंद्र नगर टर्मिनल पर आरपीएफ की चौकसी—ये दो ऐसी चीजें हैं जो इंसान का दिमाग तुरंत 'अपडेट' कर देती हैं। किस्सा हमारे मित्र प्रोफेसर साहेब का है। कॉमर्स कॉलेज, पटना में उत्तरपुस्तिकाओं का मूल्यांकन चल रहा था। कापियों के भारी-भरकम बोझ और राजेंद्र नगर पहुँचने की जल्दी में वे रोज परेशान होते थे। एक दिन मैंने दानापुर से ट्रेन पकड़ते समय उन्हें भी बड़प्पन वाली एक सरल मुफ़्त सलाह दे दी, "अरे प्रोफेसर साहेब! रोज़-रोज़ का झंझट छोड़िए, सीधे पैसेंजर ट्रेन पकड़िए और हमेशा 'आगे' रहा करिए! भीड़ कम मिलती है और राजेंद्र नगर उतरते ही सीधा निकास!" ज्ञान के भूखे प्रोफेसर साहेब ने 'आगे' शब्द को जीवन का परम सत्य मान लिया। अगले ही दिन वे स्टेशन पहुंचे और बिना दाएं-बाएं देखे पैसेंजर ट्रेन के सबसे 'आगे' वाले डिब्बे में सीना तानकर सवार हो गए। मन ही मन मुझे धन्यवाद भी दे रहे होंगे कि यार ने क्या जीवन बदलने वाली सलाह दी है। पर ट्रेन जैसे ही राजेंद्र नगर टर्मिनल के प्लेटफॉर्म पर रुकी, प्रोफेसर साहेब का 'आगे' रहने का सपना एक झटके ...

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम में सुधार — 'खाद्य उपलब्धता' से 'पोषण सुरक्षा' की ओर।

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  भारत में खाद्य सुरक्षा की बहस एक नए और निर्णायक दौर में पहुँच चुकी है। भारतीय राष्ट्रीय पोषण संस्थान और हालिया उपभोग सर्वेक्षणों के आंकड़ों के अनुसार, पर्याप्त स्वस्थ आहार न जुटा पाने वाले परिवारों का अनुपात वर्ष 2011-12 के 52% से घटकर 2023-24 में लगभग 25% (ग्रामीण 25%, शहरी 21%) पर आ गया है। हालाँकि यह एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन आज भी देश की एक-चौथाई आबादी पौष्टिक भोजन से वंचित है। आधुनिक नीति निर्माण में यह स्वीकार करना आवश्यक है कि गरीबी, भुखमरी और पौष्टिक आहार की अनुपलब्धता तीन अलग-अलग चुनौतियाँ हैं। 'राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा (संशोधन) विधेयक, 2026' का उद्देश्य मौजूदा राशन व्यवस्था को नुकसान पहुँचाए बिना 'पोषण सुरक्षा' की ओर बढ़ना होना चाहिए। वर्तमान में प्राथमिकता वाले परिवारों  को 5 किग्रा प्रति व्यक्ति, जबकि अंत्योदय अन्न योजना  के अति-संवेदनशील परिवारों को परिवार के आकार से परे 35 किग्रा प्रति परिवार एकमुश्त अनाज मिलता है।  विधेयक में AAY राशन को प्रति व्यक्ति 7 किग्रा (अधिकतम 35 किग्रा प्रति परिवार) निर्धारित करने का प्रस्ताव है। इससे 1 से 4 सदस्यों वाले छोटे...

पटना पुलिस की बड़ी कामयाबी: खगौल से लापता 10वीं की छात्रा 36 घंटे में पटना जंक्शन से बरामद, सोशल मीडिया से जुड़ा है मामला।

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  पटना / खगौल: पटना पुलिस (नगर पुलिस अधीक्षक, पश्चिमी कार्यालय) ने एक बार फिर त्वरित और तत्पर कार्रवाई का उदाहरण पेश करते हुए एक नाबालिग छात्रा को सकुशल बरामद कर लिया है। खगौल थाना क्षेत्र से गायब हुई 10वीं की छात्रा को महज 36 घंटे के भीतर पटना जंक्शन से सुरक्षित खोज निकाला गया है। आइए जानते हैं पूरा मामला क्या है और कैसे पुलिस ने इस केस को सुलझाया। क्या है पूरा मामला? दिनांक 10 अगस्त 2026 को खगौल थाने में एक आवेदन प्राप्त हुआ। पीड़ित परिवार के अनुसार, उनकी भतीजी, जो कक्षा 10वीं की छात्रा है, सुबह स्कूल गई थी लेकिन छुट्टी के बाद घर वापस नहीं लौटी। काफी खोजबीन के बाद परिजनों को दानापुर स्टेशन से सटे रेलवे यार्ड की पटरी के पास बच्ची की स्कूल ड्रेस और स्कूल बैग मिले, लेकिन लड़की का कोई सुराग नहीं मिला। इस घटना के बाद परिजनों में भारी चिंता और डर का माहौल बन गया था। घटना की गंभीरता को देखते हुए खगौल थाने में काण्ड सं०-408/26, धारा-137(2)/96 (भारतीय न्याय संहिता-2023) के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू की गई। SIT टीम का गठन और त्वरित कार्रवाई वरीय पुलिस अधीक्षक, पटना के निर्देशानुसार अपर पु...

डिजिटल युग में किशोर मन, अभिभावकों का दायित्व और कानून पर विश्वास: एक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण — प्रो. प्रसिद्ध कुमार।

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    हाल ही में दानापुर/खगौल क्षेत्र से लापता हुई स्कूली छात्रा की महज 36 घंटे के भीतर पुलिस द्वारा की गई सकुशल बरामदगी न केवल एक राहत की खबर है, बल्कि यह वर्तमान समाज, परिवार और किशोर-मनोविज्ञान के संदर्भ में कई गंभीर पहलुओं पर सोचने के लिए हमें मजबूर करती है। इस उत्कृष्ट एवं त्वरित कार्रवाई के लिए मैं दानापुर ए.एस.पी., खगौल थाना प्रभारी एवं एस.आई.टी. (SIT) की पूरी पुलिस टीम को हार्दिक बधाई व साधुवाद देता हूँ। अत्याधुनिक तकनीकी सहायता और पुलिस की उत्कृष्ट कार्यकुशलता के बल पर ली गई यह त्वरित कार्रवाई अत्यंत सराहनीय है। लेकिन एक समाजशास्त्री और मनोवैज्ञानिक के रूप में इस घटना के पीछे छिपे बाल मनोविज्ञान  और सामाजिक मनोविज्ञान के धागों को समझना बेहद जरूरी है। 1. बाल मनोविज्ञान: 'डिजिटल भटकाव' और किशोरावस्था की संवेदनशीलता किशोरावस्था (Adolescence) जीवन का वह पड़ाव है जहाँ मस्तिष्क का निर्णय लेने वाला भाग पूरी तरह विकसित नहीं होता, जबकि भावनाएँ और जिज्ञासाएँ चरम पर होती हैं। प्रलोभन और छद्म आत्मीयता: सोशल मीडिया (जैसे इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप आदि) के जरिए अज्ञात लोगों से दोस्त...

संस्थागत नाकामी और रैगिंग का भयावह सच!

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    सूरत के सरकारी मेडिकल कॉलेज में एक प्रथम वर्ष के रेजिडेंट डॉक्टर की रैगिंग के कारण हुई आत्महत्या की घटना सिर्फ एक छात्र की मौत नहीं, बल्कि हमारी शैक्षणिक और प्रशासनिक व्यवस्था के पूरी तरह खोखले हो चुके रवैये का नग्न प्रदर्शन है। जब किसी प्रतिष्ठित संस्थान में "परिचय" के नाम पर मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न इस हद तक बढ़ जाए कि एक होनहार युवा को अपनी जीवनलीला समाप्त करनी पड़े, तो यह स्पष्ट तौर पर आपराधिक लापरवाही और सामंती मानसिकता की विजय है। कॉलेज प्रशासन का रवैया पूरी तरह निराशाजनक और गैर-जिम्मेदाराना है। छात्र के आत्महत्या जैसा घातक कदम उठाने के बाद चार आरोपियों को केवल छह महीने के लिए निलंबित करना और हॉस्टल खाली कराना एक खोखली औपचारिकता से अधिक कुछ नहीं है। सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन की नींद हमेशा किसी मासूम की बलि चढ़ने के बाद ही खुलेगी? जिस निरोधात्मक और सतर्क रवैये की आवश्यकता परिसर को भयमुक्त बनाने के लिए नियमित रूप से होनी चाहिए, वह केवल हादसों के बाद खानापूर्ति तक ही सीमित क्यों रह जाती है? सर्वोच्च न्यायालय के सख्त निर्देशों और रैगिंग विरोधी कड़े कानूनों के बा...

भारत में अंग्रेजी: औपनिवेशिक विरासत से अपनी भाषा बनने तक का सफर !

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  हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय की एक टिप्पणी के बाद यह बहस पुनः छिड़ गई है कि क्या अंग्रेजी को भारत की एक देशीय या स्थानीय भाषा (Indigenous Language) माना जा सकता है। भारत में भाषाओं के संदर्भ में अक्सर "अंग्रेजी बनाम भारतीय भाषाएं" का एक कृत्रिम द्वंद्व खड़ा किया जाता है, जो ऐतिहासिक और राजनीतिक रूप से निरर्थक है। हिंदी, तमिल, तेलुगु, उड़िया, कन्नड़ या मराठी जैसी भारतीय भाषाओं का विकास अंग्रेजी का बहिष्कार करके नहीं किया जा सकता। भारत का भाषाई भविष्य बहुभाषावाद (Multilingualism) को पोषित करने में निहित है। यद्यपि अंग्रेजी ऐतिहासिक अर्थों में संस्कृत या तमिल की तरह प्राचीन देशीय भाषा नहीं है, फिर भी दो शताब्दियों से अधिक के प्रयोग के बाद इसने भारत से जुड़ने और अपना स्थान बनाने का पूर्ण नैतिक व व्यावहारिक अधिकार प्राप्त कर लिया है। अंग्रेजी की शुरुआत ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन को चलाने, व्यापार और प्रशासनिक कार्यों को आसान बनाने के लिए हुई थी। शुरुआती दौर में इसने अंग्रेजों के हितों की पूर्ति की, लेकिन भाषाएं अपने आगमन की परिस्थितियों की गुलाम नहीं रहतीं। भारतीयों ने अंग्रे...

खगौल में लगातार अनसुलझी गुमशुदगी से दहशत: छात्रा सपना कुमारी का सुराग नहीं, 13 महीने पुराना रामलड्डू के गुमशुदगी जैसा पैटर्न दोहराने की आशंका! -प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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    (तस्वीर में देर रात तक दानापुर ए एस पी के साथ मैं घटना का अवलोकन करते हुए।)  @ फॉलो अप news.  दानापुर/खगौल (पटना)। केंद्रीय विद्यालय (KV) खगौल की 10वीं की छात्रा सपना कुमारी के रहस्यमय परिस्थितियों में गायब होने के बाद पूरे इलाके में डर और आक्रोश का माहौल है। छुट्टी के बाद घर लौट रही 15 वर्षीया छात्रा के कपड़े, स्कूल बैग और आई-कार्ड जमालुद्दीन चक के पास रेलवे ट्रैक के किनारे घनी झाड़ियों में लावारिस हालत में मिले। इस खौफनाक मंजर ने न सिर्फ परिजनों को हिलाकर रख दिया है, बल्कि 13 महीने पहले इसी खगौल इलाके से गायब हुए समाजसेवी रामलड्डू कुमार के अनसुलझे मामले की यादें भी ताजा कर दी हैं। सपना कुमारी मामला: सुनसान रेलवे ट्रैक से कपड़े व बस्ता बरामद बाबूचक गांव की रहने वाली और दानापुर रेलवे में कार्यरत संजय कुमार की पुत्री सपना कुमारी दोपहर 2 बजे स्कूल से निकली थी। अपनी सहेली से जमालुद्दीन चक के पास अलग होने के बाद वह अकेले लोको कॉलोनी स्थित अपने आवास की ओर बढ़ी। रेलवे ट्रैक के दोनों ओर घने जंगल और अत्यधिक वीरान माहौल का फायदा उठाकर अज्ञात अपराधियों ने घटना को अंजाम दिया। ...