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पटना में 'सोनारू' ऑटो गैंग का भयंकर आतंक! अब कॉलेज की प्रध्यापिका को बनाया निशाना!

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  सुशासन के दावों की खुली पोल: पुलिस अधिकारी की बेटी ने सूझबूझ से बचाई जान, 6 महीने पहले भी इसी कॉलेज के कर्मी से हुई थी लूट की असफल प्रयास।   पटना। बिहार की राजधानी पटना में कानून-व्यवस्था का जनाजा निकल चुका है। सड़कों पर खुलेआम घूम रहे अपराधियों के हौसले इस कदर बुलंद हैं कि अब शहर की पढ़ी-लिखी और संभ्रांत महिलाएं भी सुरक्षित नहीं हैं। पटना में 'ऑटो लिफ्टर और सोने की बिस्किट' दिखाने वाला एक शातिर गैंग बेखौफ होकर घूम रहा है, जिसे न तो खाकी का खौफ है और न ही कानून का डर। ताजा मामला एक कॉलेज की इतिहास विभाग की प्रध्यापिका (प्रोफेसर) से जुड़ा है, जो अपराधियों के एक सुनियोजित षड्यंत्र का शिकार होते-होते बाल-बाल बचीं। साजिश का जाल: 70 फीट से अनीसाबाद के बीच बुना गया जाल घटना के अनुसार, प्रध्यापिका सुबह करीब 10 बजे पटना बाईपास 70 फीट स्थित अपने घर से राम लखन सिंह यादव कॉलेज (अनीसाबाद) जाने के लिए निकली थीं। तभी एक ऑटो उनके पास आकर रुका और चालक ने उन्हें गंतव्य तक छोड़ने की बात कही। मैडम जैसे ही ऑटो में बैठीं, पहले से घात लगाए बैठे अपराधियों का खेल शुरू हो गया। तभी एक अन्य व्यक्...

सिर्फ असेंबल न करें, नवाचार (Innovation) करें!

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    भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माता बन गया है, जिसका श्रेय मुख्य रूप से PLI (उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन) जैसी सरकारी नीतियों को जाता है। वर्तमान में, भारतीय कंपनियाँ मुख्य रूप से केवल 'असेंबली' (जुड़ाव) तक सीमित हैं। उच्च-मूल्य वाली गतिविधियाँ जैसे डिजाइन, तकनीक और बौद्धिक संपदा (IP) अभी भी अमेरिका, यूरोप और चीन की कंपनियों के पास हैं। अतीत में भारतीय ब्रांड (जैसे लावा, माइक्रोमैक्स) ने बाजार में अच्छी हिस्सेदारी बनाई थी, लेकिन वे R&D (अनुसंधान और विकास) में निवेश न करने के कारण लंबे समय तक टिक नहीं पाए।  वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए, भारतीय कंपनियों को केवल दूसरों की तकनीक का उपयोग करने के बजाय अपनी खुद की तकनीक विकसित करनी होगी और पेटेंट पोर्टफोलियो का विस्तार करना होगा।  भारत को एक 'असेंबली हब' से बदलकर एक 'नवाचार-संचालित तकनीकी पावरहाउस' बनने की आवश्यकता है। इसके लिए स्थानीय नवाचारों को बनाने और उनका मुद्रीकरण करना अनिवार्य है, जो 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' के लक्ष्यों के अनुरूप है।

राष्ट्रीय किसान मोर्चा का एक दिवसीय चिंतन शिविर सम्पन्न, बिहार के किसानों की समस्याओं पर हुआ गंभीर मंथन !

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  पटना (खुसरूपुर): राष्ट्रीय किसान मोर्चा बिहार इकाई संगठन के तत्वावधान में खुसरूपुर प्रखंड के चौड़ा ग्राम में एक दिवसीय परिचय, सम्मान सह चिंतन शिविर का आयोजन किया गया। इस भव्य कार्यक्रम में संगठन के तमाम शीर्ष नेताओं सहित सैकड़ों की संख्या में किसान और मजदूर शामिल हुए। सभा की अध्यक्षता चौड़ा ग्राम के विश्वनाथ यादव ने की, जबकि मंच का कुशल संचालन राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्याम नंदन कुमार यादव द्वारा किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत में आए हुए सभी अतिथियों का अंग वस्त्र (शॉल) और पुष्पहार देकर भव्य स्वागत किया गया। कार्यक्रम के समापन पर प्रदेश महासचिव रवींद्र कुमार सिंह ने सभी के प्रति धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। दिग्गजों का जुटाव इस अवसर पर संगठन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्याम नंदन कुमार यादव, राष्ट्रीय महासचिव विपिन चौधरी, प्रदेश महासचिव (मधुबनी) श्री विनोद कुमार सिंह यादव, प्रदेश महासचिव व फतुहा प्रखंड के उप प्रमुख रवींद्र कुमार सिंह, प्रदेश कोषाध्यक्ष उत्तम सिंह बाल्यान, रुपेश सिंह कुंतल, खुसरूपुर के प्रखंड अध्यक्ष सुरेश यादव, शंभूशरण सिंह यादव, सूरज कुमार यादव, पुनीत सिंह, जगवीर सिंह शा...

मृत्युभोज: आस्था के नाम पर सामाजिक अभिशाप और हमारी संवेदनहीनता !

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  शोक के आंगन में स्वाद की तलाश क्यों? किसी प्रियजन के चले जाने का दुख क्या होता है, यह केवल वही परिवार समझ सकता है जिसने अपना कोई खोया है। मृत्यु के बाद घर में पसरा सन्नाटा, अपनों के आंसू और वो कभी न भरने वाला खालीपन... ऐसे गमगीन माहौल में जब पूरा समाज उस पीड़ित परिवार के घर 'मृत्युभोज' (तेरहवीं) के नाम पर पकवान खाने जुटता है, तो मानवता सचमुच शर्मसार हो जाती है। जिस चौखट पर बैठकर कभी ढांढस बंधाना चाहिए था, वहां बैठकर भोजन की फरमाइश करना हमारी संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। शास्त्रों का सच्चा संदेश: पुण्य नहीं, यह पाप है हम अक्सर परंपराओं की दुहाई देकर अपनी गलतियों को छुपाने की कोशिश करते हैं, लेकिन हमारे ग्रंथ और इतिहास कुछ और ही सीख देते हैं। महाभारत का अनुशासन पर्व: महाभारत में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि विपदा और संकट के समय पीड़ित परिवार की तन, मन और धन से सहायता करनी चाहिए, न कि उनके घर जाकर भोजन ग्रहण करना चाहिए। श्रीकृष्ण का उपदेश: भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार, भोजन हमेशा प्रसन्न मन की स्थिति में ही ग्रहण करना चाहिए। शोक संतप्त मन से बनाया और खिलाया गया भोजन कभी तृप्ति नहीं ...

E20 ईंधन नीति: पारदर्शिता का अभाव और उपभोक्ता का संशय !

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    क्या एक बड़ी नीतिगत बदलाव के लिए केवल तकनीकी तैयारी पर्याप्त है, यदि उपभोक्ता ही विश्वास में न लिया गया हो?  हालांकि सरकार, वाहन निर्माताओं और इथेनॉल डिस्टिलर्स के बीच व्यापक विचार-विमर्श हुआ, लेकिन इन प्रयोगों के निष्कर्षों को वाहन खरीदारों के साथ पर्याप्त रूप से साझा नहीं किया गया। यह सूचना का अभाव सीधे तौर पर जनता के बीच 'इंजन के स्वास्थ्य' को लेकर भ्रामक जानकारी और डर पैदा करने का आधार बना।  ईंधन विकल्प के मामले में उपभोक्ताओं की पसंद को चुनौती दी जा रही है। नीति निर्माताओं की यह लापरवाही कि उन्होंने उपभोक्ताओं को इस प्रक्रिया में शामिल नहीं किया या उन्हें आश्वस्त नहीं किया, एक गंभीर 'कम्युनिकेशन गैप' (संवाद की खाई) पैदा करती है। सरकार और उद्योग जगत का रुख 'प्रतिक्रियाशील'  रहा है, न कि 'सक्रिय' ! भ्रामक सूचनाओं को दूर करने के लिए पूर्व-सक्रिय कदम उठाने के बजाय, एक 'आत्मसंतुष्टि'  का माहौल विकसित हुआ है। यह तब और अधिक गंभीर हो जाता है जब हम दुनिया के तीसरे सबसे बड़े ऑटोमोबाइल बाजार की बात कर रहे हों। यद्यपि भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा और जल...

श्रीराम के हुंडी में चोर!

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      चढ़ावे का सच और पाखंड का बाज़ार !  ​रामलला की आँखों में है, भक्तों की अटूट आस, मंदिर तो है भव्य, पर चढ़ावे का है काला इतिहास। भंडार में लगे दान के सिक्के और नोटों के ढेरे, पर भ्रष्टाचार की घुटन से, साँसें हैं रुकते, ठहरे। ​राम से बड़ा नाम का आधार, ये कहते सब ज्ञानी, पर नाम की आड़ में रचा, इन्होंने ये झूठा संसार। नाम जपने वाले ही बने, नाम के महाभक्षक, राम के नाम पर, खुद ही बन बैठे नए रक्षक। ​चंदे के नाम पर, आम आदमी के विश्वास की हत्या, चढ़ावे की लूट ने, श्रद्धा के श्राद्ध में रीत को नहलाया। पाखंड का पाषाण है, इनकी ये चाकी की चाल, राम के नाम को व्यापार बना, ये कर रहे हैं बेहाल। ​'अयोध्या तो झांकी है'—बस, एक नारा बनकर रह गया, मंदिर के पीछे का ये गोरखधंधा, सब को डरा गया। परजीवी भोग-विलास में मस्त हैं, और भूखा है श्रम करने वाला, जब तक मूर्खता रहेगी, तब तक  वर्चस्व ढोंगी माला। ​जागो, हे भारतवासियों! इस पाखंड का पर्दा हटाओ, राम के नाम को कलंकित, अब और न होने पाओ।

कैंसर: राष्ट्रीय स्तर पर 'अधिसूचनीय रोग' बनाने की आवश्यकता!

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    ​वर्तमान में भारत में कैंसर एक 'अधिसूचनीय रोग' नहीं है। स्वास्थ्य मंत्रालय का पारंपरिक दृष्टिकोण यह है कि इस श्रेणी में केवल संक्रामक रोगों को ही शामिल किया जाना चाहिए। अब इस नीति को बदलने और कैंसर को राष्ट्रीय स्तर पर अधिसूचनीय बनाने का समय आ गया है। केंद्र सरकार वर्तमान में जनसंख्या-आधारित और अस्पताल-आधारित कैंसर रजिस्ट्रियों पर निर्भर है। ये रजिस्ट्रियां देश की केवल 10% से 16% आबादी को कवर करती हैं और इनमें शहरी तथा सरकारी स्वास्थ्य ढांचे की ओर झुकाव अधिक है।  भारत में कैंसर का एक बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र द्वारा संभाला जाता है, जिसका डेटा समान रूप से दर्ज नहीं हो पाता है। ​राज्यों की पहल: कई राज्य पहले ही कैंसर को अधिसूचनीय बना चुके हैं। तेलंगाना इस सूची में शामिल होने वाला नवीनतम राज्य है, जिससे अब ऐसे राज्यों की कुल संख्या 17 हो गई है। ग्लोबल कैंसर ऑब्जर्वेटरी (WHO) के अनुमान के अनुसार, 2022 (1.41 मिलियन) से 2045 (2.46 मिलियन) के बीच कैंसर के मामलों में 74% से अधिक की वृद्धि होने की आशंका है। बढ़ती उम्र और जीवनशैली में बदलाव को देखते हुए, सार्वजनिक स्वास्थ्य के दृष...