महंगाई की मार: सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच पिसता आम आदमी !
यह एक विडंबना ही है कि जब भी सरकारी आंकड़े जारी होते हैं, वे अक्सर 'नियंत्रण' और 'संतुलन' का गुलाबी चित्र पेश करते हैं, लेकिन बाजार जाते ही आम आदमी की जेब का खालीपन एक अलग ही कहानी बयां करता है। हालिया आंकड़ों ने एक बार फिर विकास के दावों की कलई खोल दी है। आंकड़ों का मायाजाल बनाम वास्तविकता सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, खुदरा महंगाई दर मार्च में बढ़कर 3.4% हो गई है, जो फरवरी में 3.2% थी। हालांकि सरकार इसे रिजर्व बैंक के 4% के औसत अनुमान से नीचे बताकर अपनी पीठ थपथपा सकती है, लेकिन विश्लेषण के कुछ गहरे बिंदु चिंताजनक हैं: ग्रामीण बनाम शहरी खाई: शहरी इलाकों में महंगाई दर 3.11% है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह 3.63% तक जा पहुँची है। यह आंकड़ा डराने वाला है क्योंकि ग्रामीण भारत में आय के साधन सीमित हैं और वहां की आबादी पहले से ही आर्थिक दबाव में है। दैनिक उपयोग की वस्तुओं में उछाल: भले ही आलू-प्याज की कीमतों में कुछ कमी आई हो, लेकिन टमाटर, फूलगोभी, नारियल और सोने-चांदी की कीमतों में भारी बढ़ोत्तरी हुई है। बिजली, गैस और ईंधन श्रेणी में भी वृद्धि दर्ज की गई है, जिसका सीधा...