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स्पर्श: आत्मा की मूक अभिव्यक्ति!

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   ​मानवीय संवेदनाओं के महासागर में 'स्पर्श' वह मूक लहर है, जो शब्दों के तट को छुए बिना ही हृदय के अंतस तक पहुँच जाती है। मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए, तो स्पर्श केवल त्वचा का त्वचा से मिलन नहीं, बल्कि दो चेतनाओं का एक-दूसरे में विलीन होना है। यह एक ऐसी आदिम भाषा है जिसे बोलने के लिए जिह्वा की नहीं, बल्कि भावों की शुद्धता की आवश्यकता होती है। ​१. आग्रह और पूर्वाग्रह का विसर्जन ​अक्सर मनुष्य अपने भीतर अहंकार, ईर्ष्या और दुराग्रह (पूर्वाग्रहों) की ऊँची दीवारें खड़ी कर लेता है। ये दीवारें तर्कों से नहीं ढहतीं, बल्कि संवेदना के एक कोमल स्पर्श से ताश के पत्तों की तरह बिखर जाती हैं। जब एक मित्र दूसरे के कंधे पर हाथ रखता है या एक माँ अपनी संतान को गले लगाती है, तो वर्षों की कड़वाहट और गलतफहमियां एक क्षण में तिरोहित हो जाती हैं। ​२. संघर्षों में संबल और मनोवैज्ञानिक शक्ति ​जीवन निरंतर एक संघर्ष है। जब हम मानसिक रूप से टूट रहे होते हैं, तब किसी प्रियजन का मौन स्पर्श मस्तिष्क में 'ऑक्सीटोसिन' (प्रेम और विश्वास का हार्मोन) का संचार करता है। यह हमें संघर्षों को झेलने की शक्ति प...

​बिहार के वित्त रहित शिक्षक: व्यवस्था की क्रूरता और 'खाली खजाने' का छलावा ! प्रो प्रसिद्ध कुमार.

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   ​जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं - सरकार और निर्वाचित प्रतिनिधियों की उदासीनता !  ​बिहार की शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले 'वित्त रहित शिक्षक' आज उस मोड़ पर खड़े हैं जहाँ उन्हें न तो सम्मान मिल रहा है और न ही उनका हक। वर्षों से ज्ञान का दीप जलाने वाले ये शिक्षक स्वयं अंधकारमय भविष्य की ओर धकेले जा रहे हैं।  यह उन हजारों परिवारों की चीख है जो व्यवस्था की उपेक्षा की बलि चढ़ रहे हैं।   ​खजाना खाली है या नीयत में खोट? ​सरकार अक्सर यह दलील देती है कि वित्त रहित कर्मियों के लिए 'खजाना खाली' है। लेकिन यह तर्क तब खोखला साबित हो जाता है जब अन्य विभागों और नियमित कर्मचारियों के लिए वेतन, महंगाई भत्ता, समय पर एरियर और तमाम सुख-सुविधाओं के लिए धन की कमी नहीं होती।   ​क्या वित्त रहित शिक्षक इस राज्य के नागरिक नहीं हैं?   ​क्या उनके बच्चों को भविष्य देखने का अधिकार नहीं है?   ​यह भेदभावपूर्ण रवैया सरकार की संवेदनहीनता का सबसे बड़ा प्रमाण है।   ​"हम भी इंसान हैं... हमारे परिवार हैं... बच्चों का भविष्य है... हमें हमारा हक चाहिए, ...

बिहार में 'सुशासन' की खुली पोल: पटना जानीपुर में अपर थानेदार 1 लाख की घूस लेते रंगे हाथों गिरफ्तार, भ्रष्टाचार का खेल जारी!

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    ​पटना: बिहार सरकार भले ही सूबे में 'जीरो टॉलरेंस' और सुशासन का दावा करे, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। ताजा मामला राजधानी पटना का है, जहाँ पुलिस महकमे में व्याप्त भ्रष्टाचार एक बार फिर उजागर हुआ है। ​क्या है पूरा मामला? ​निगरानी अन्वेषण ब्यूरो की मुख्यालय टीम ने एक बड़ी कार्रवाई करते हुए जानीपुर थाना के अपर थानाध्यक्ष संजय कुमार सिंह को ₹1,00,000 (एक लाख) की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया है। ​गिरफ्तारी का स्थान: आरोपी को जानीपुर थाना क्षेत्र के बघ्घा टोला स्थित नहर के पूर्वी सड़क के किनारे से दबोचा गया। ​आरोप: परिवादी कौशल किशोर ने शिकायत दर्ज कराई थी कि उनकी जमीन की सरकारी मापी होने के बावजूद असामाजिक तत्व उन्हें बाउंड्री नहीं करने दे रहे थे। इसी बाउंड्री को कराने में मदद के बदले दारोगा संजय कुमार सिंह ने मोटी रकम की मांग की थी। ​निगरानी विभाग का जाल ​शिकायत के सत्यापन के बाद आरोपों को सही पाया गया, जिसके बाद पुलिस उपाध्यक्ष श्री अरुणोदय पाण्डेय के नेतृत्व में एक धावा दल का गठन किया गया। आज दिनांक 13.05.2026 को टीम ने जाल बिछाकर आरोपी पुलिस अधिकारी...

दृष्टिकोण का विकास: एक सतत प्रक्रिया !

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    ​दृष्टिकोण यानी सोचने-समझने का नजरिया, किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। यह एक कड़वा सच है कि दृष्टिकोण जन्मजात नहीं होता। हम अपने साथ इसे लेकर पैदा नहीं होते, बल्कि यह समय के साथ धीरे-धीरे विकसित होता है। ​दृष्टिकोण को निखारने के साधन ​व्यक्ति अपने नजरिए को केवल भाग्य पर नहीं छोड़ सकता। इसे परिपक्व बनाने के लिए कुछ विशेष माध्यमों की आवश्यकता होती है: ​आत्मचिंतन: स्वयं के विचारों का विश्लेषण करना। ​अध्ययन: निरंतर पढ़ना और ज्ञान अर्जित करना। ​संवाद: दूसरों के साथ विचारों का आदान-प्रदान करना। ​अनुभव: जीवन की परिस्थितियों से सीखना। ​व्यापकता का आधार ​जब हम केवल अपनी दुनिया तक सीमित न रहकर दूसरों के अनुभवों से सीखने का प्रयास करते हैं, तब हमारा दृष्टिकोण व्यापक और गहरा होता है। अंततः, एक सही और परिपक्व दृष्टिकोण ही हमें समाज में एक बेहतर इंसान के रूप में स्थापित करता है।

मानसिक स्वास्थ्य: भागदौड़ भरी जिंदगी में सुकून की तलाश!

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    ​आज के आधुनिक युग में मनुष्य ने तकनीक और विज्ञान के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति कर ली है। ऊँची इमारतें, तेज़ रफ़्तार गाड़ियाँ और उंगलियों पर सिमटी दुनिया ने हमारे जीवन को सुगम तो बनाया है, लेकिन एक गहरी बेचैनी भी दी है। हम सब एक ऐसी दौड़ का हिस्सा बन गए हैं जिसकी कोई फिनिश लाइन नहीं है। इस अंधी दौड़ का सबसे बुरा प्रभाव हमारे मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ा है। ​मानसिक स्वास्थ्य क्या है? ​अक्सर लोग मानसिक स्वास्थ्य का अर्थ केवल 'पागलपन' या 'दिमागी बीमारी' से जोड़ते हैं, जो कि एक संकुचित सोच है। वास्तव में, मानसिक स्वास्थ्य का अर्थ है—भावनाओं, व्यवहार और विचारों का वह संतुलन, जो हमें जीवन की चुनौतियों का सामना करने, काम करने और समाज में योगदान देने के योग्य बनाता है। जैसे शरीर को बुखार होता है, वैसे ही मन को भी थकान, तनाव और उदासी महसूस हो सकती है। ​सुकून छिनने के प्रमुख कारण ​प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़: हर क्षेत्र में सबसे आगे निकलने की चाहत ने व्यक्ति को आराम करना भुला दिया है। दूसरों से तुलना  तनाव का सबसे बड़ा कारण बन गई है। ​डिजिटल कोलाहल: सोशल मीडिया की आभासी दुनिया हमें ...

प्रतीक यादव का आकस्मिक निधन: जब 'किले' सुरक्षित नहीं, तो आम आदमी कहाँ जाए?

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   अखिलेश यादव के भाई प्रतिक यादव अब हमारे बीच नहीं रहे!  ​आज की सुबह उत्तर प्रदेश की राजनीति और यादव परिवार के लिए एक ऐसी खबर लेकर आई जिसने हर किसी को स्तब्ध कर दिया। समाजवादी पार्टी के संरक्षक दिवंगत मुलायम सिंह यादव के छोटे बेटे और अखिलेश यादव के भाई प्रतिक यादव अब हमारे बीच नहीं रहे। मात्र 38 वर्ष की ऊर्जावान आयु में उनका जाना कई सवाल और गहरी उदासियाँ छोड़ गया है। ​एक हँसता-खेलता सफर, यूँ थम गया ​लखनऊ के सिविल अस्पताल से आई खबर के मुताबिक, प्रतीक यादव को सुबह लगभग 6:00 बजे 'ब्रॉट डेड' घोषित किया गया। जानकारी के अनुसार, सुबह घर पर अचानक उनकी तबीयत बिगड़ी। बताया जा रहा है कि वह फेफड़ों से संबंधित किसी गंभीर समस्या (पल्मोनरी एम्बोलिज्म) से जूझ रहे थे। ​एक ऐसा व्यक्ति जिसके पास दुनिया भर की सुख-सुविधाएं, बेहतरीन मेडिकल बैकअप और रसूख था, उसे भी नियति ने संभलने का मौका नहीं दिया। ​रसूख बनाम स्वास्थ्य: एक कड़वा सच ​प्रतीक यादव सिर्फ एक नाम नहीं थे; वह बीजेपी नेता अपर्णा यादव के पति और सूबे के सबसे ताकतवर राजनीतिक परिवारों में से एक के सदस्य थे। जब हम ऐसी हस्तियों के बारे में...

परीक्षा प्रणाली की शुचिता और संस्थागत विफलता: एक विश्लेषण!

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    देश की प्रमुख प्रवेश परीक्षाओं के आयोजन में व्याप्त गंभीर अनियमितताओं और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल है। यह न केवल प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है, बल्कि लाखों युवाओं के भविष्य के साथ हो रहे खिलवाड़ को भी उजागर करता है।  ​पुनरावृत्ति और व्यवस्थागत दोष:   यह स्पष्ट है कि 'नीट-यूजी 2026' में पर्चा लीक (पेपर लीक) की घटना कोई इकलौती घटना नहीं है। इससे पहले 2021 और 2024 में भी गलत प्रश्नपत्र और संदिग्ध कृपांक (ग्रेस मार्क्स) जैसे विवाद सामने आ चुके हैं, जो दर्शाते हैं कि NTA अपनी पिछली गलतियों से सीखने में विफल रहा है। ​तकनीकी बनाम धरातली सुरक्षा: NTA का दावा है कि वह प्रश्नपत्रों की सुरक्षा के लिए 'जीपीएस-ट्रैकिंग' वाले वाहनों और 'एआई-सहायता' प्राप्त सीसीटीवी (CCTV) का उपयोग करता है। हालांकि, इन उन्नत तकनीकों के बावजूद पेपर का चुनिंदा छात्रों तक पहुँचना यह संकेत देता है कि समस्या तकनीकी नहीं, बल्कि नैतिक और संगठनात्मक है। ​मिलीभगत और माफिया का प्रभाव:  यह बिना आंतरिक मिलीभगत के इतनी कड़ी सुरक्षा को भेदना असंभव है। परीक्षा म...