युगपुरुष: बाबा साहब! (कविता) -प्रो प्रसिद्ध कुमार.
कितने झेले दंश आपने, कितने पिए जहर के घूंट, ऊँच-नीच की बेड़ियाँ देखीं, देखी जाति और छुआछूत। पिया हलाहल नीलकंठ बन, हर पग पर अपमान सहा, शहर, गाँव या पाठशाला हो—हर पथ पर व्यवधान रहा। कट्टरपंथी, पाखंडी और ढोंगियों के वे प्रहार थे, पशुओं से बदतर जीवन था, बंद सभी द्वार थे। न कुआँ अपना, न ताल अपना, न साथ बैठने का अधिकार, किंतु आपके अडिग संकल्प ने कर डाला सबका उद्धार। त्याग दिया वह संकीर्ण धर्म, जो मनुष्य में भेद करे, अपनाया वह धम्म बुद्ध का, जो जन-जन में स्नेह भरे। ज्ञान-पुंज बन उभरे आप, दलितों के तुम बने विधान, रच डाला वह महाकाव्य—भारत का पावन संविधान। दीप जलाया मानवता का, राष्ट्र प्रेम का बोध दिया, वंचित वर्ग को गौरव और जीने का अधिकार दिया। आज भले ही कोई नफरत में प्रतिमा पर चोट करे, पर हृदय-सिंहासन से तुमको, बोल कौन निष्कासित करे? अटल ध्रुव के तारा हो तुम, अमर रहेगी यह गाथा, जब तक यह वसुंधरा रहेगी, झुकेगा उनके आगे माथा। ढोंग और पाखंड खंडित कर, स्वाभिमान की लौ जलाई, अंधकारमय जीवन में तुमने, ज्ञान की पावन भोर दिखाई। "शिक्षित बनो, संगठित रहो और करो तुम संघर्ष" यही मंत्र अब ग...