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लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर प्रहार और खाकी की मनमानी!

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  राजधानी दिल्ली के साकेत थाने से सामने आई यह घटना न सिर्फ लोकतंत्र के मूल्यों को शर्मसार करती है, बल्कि प्रेस की आजादी और महिला सुरक्षा के दावों की धज्जियां भी उड़ाती है। यदि पत्रकार सवाल पूछने जैसे अपने मूल संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल करने पर हिरासत और बर्बरता का शिकार बनते हैं, तो यह सीधे तौर पर अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का हनन: एक पत्रकार का काम सत्ता से तीखे और जरूरी सवाल पूछना है। यदि सवाल पूछने के बदले पुलिस हिरासत और शारीरिक प्रताड़ना मिले, तो यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों पर गहरा आघात है।   महिला सुरक्षा के दावों पर सवाल: देश की राजधानी में, जहां महिला सुरक्षा को लेकर लगातार बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, वहीं महिला पत्रकारों के साथ थाने के भीतर कथित तौर पर अभद्रता और मारपीट होना पुलिस तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जवाबदेही और निष्पक्ष जांच की सख्त जरूरत: हालांकि पुलिस प्रशासन इन आरोपों को खारिज कर रहा है, लेकिन इस तरह की घटनाओं से जनता का न्याय व्यवस्था पर से विश्वास डगमगाता है। इस मामले की बिना किसी दबाव के निष्पक...

सत्ता के गलियारे, विज्ञापनों का सच और 'शेष कुशल है' की कड़वी हकीकत!

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  मंत्री हैं अब राजा-रानी, असली राजा भरता पानी। संसद के भीतर जंगल है, शेष कुशल है। परिवर्तन नारों में है, उपलब्धि अखबारों में है। नालों में ही गंगाजल है, शेष कुशल है। न्याय बिके अब बाजारों में, सच्चाई दुबकी कारों में। हर तरफ केवल हड़कंप है, शेष कुशल है। -प्रसिद्ध व्यंग्यकार और कवि अशोक चक्रधर ।    यह पंक्तियाँ भारतीय लोकतंत्र की वर्तमान तस्वीर पर एक धारदार व्यंग्य हैं। यह कविता उस बड़े अंतर को रेखांकित करती है जो सरकार के दावों (विज्ञापनों) और धरातल की कड़वी सच्चाई के बीच मौजूद है। संविधान के अनुसार जनता ही लोकतंत्र में 'राजा' है, लेकिन आज आम नागरिक बुनियादी सुविधाओं—पानी, स्वास्थ्य, रोजगार—के लिए तरस रहा है। वहीं, जनप्रतिनिधि या 'मंत्री' सामंती राजा-रानी की तरह विशेषाधिकारों का आनंद ले रहे हैं। संसद, जो जन-समस्याओं के समाधान का मंदिर थी, आज शोर-शराबे, हंगामे और गिरते राजनीतिक विमर्श का अखाड़ा बन चुकी है।  राजनीति केवल लुभावने नारों और अखबारों के बड़े-बड़े विज्ञापनों तक सीमित हो गई है। कागजों और मीडिया कवरेज में तो नदियाँ साफ हो रही हैं और विकास की नदियाँ बह रही हैं,...

चोरी का नशा, नशे की चोरी! - प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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    भोर की पहली किरण अभी ठीक से फूटी भी नहीं थी कि दिनचर्या के नियम से कदम मन्दिर की ओर बढ़ गए। गाँव का मन्दिर महज आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि पूरे जेवार का ताजा-तरीन समाचार कक्ष भी होता है। वहाँ हर सुबह कुछ ‘खबरची’ जमा रहते हैं, जिनके मुखारविंद से जब तक दस-बीस लोगों को रात भर की वारदातें न सुनवा दी जाएँ, तब तक उनका पेट नहीं पचता। खबर की गंभीरता के हिसाब से ही उनके चेहरे के भाव बदलते हैं। बिना किसी औपचारिकता के, एक खबरची ने बड़े नाटकीय अंदाज़ में सुनाया—"आपके भैया के समर्सिबल का केबल कट गया, और पड़ोस वाले का भी!" खबर सुनकर मैं अपनी रोज़मर्रा की टहलकदमी पर निकल गया। लौटते-लौटते तक यह खबर पूरे गाँव की हवा में आग की तरह फैल चुकी थी। रस्ते में भैया मिले, हाल-चाल हुआ तो नए बन रहे मकान की सुरक्षा को लेकर सीसीटीवी कैमरे लगाने की चिंता जताने लगे। सुबह की इस हलचल के बाद सब अपने-अपने गृह-कार्यों में व्यस्त हो गए। कुछ ही घंटे बीते होंगे कि भतीजा घर आया। मंझले भाई ने उससे कहा—"रात में चाचा का केबल कट गया।" भतीजे ने उत्सुकतावश पूछा कि तार कैसा होता है? भाई ने अपने समर्सिबल के लट...

रामलला की तिजोरी, एयर मार्शल की ड्यूटी: जब ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का अनुभव आया मंदिर के काम! - शिवानंद तिवारी।

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    अयोध्या के भव्य राम मंदिर में चंदे की हेराफेरी क्या हुई, व्यवस्थापकों के तो मानो होश ही उड़ गए। घोटाले की जांच पूरी हुई, पुरानी कमेटी के चेहरे बदले, लेकिन असली 'मास्टरमाइंड्स' की सेहत पर रत्ती भर असर नहीं पड़ा। वे आज भी उतने ही सुरक्षित हैं जितने कल थे। असली चमत्कार तो इसके बाद देखने को मिला—चंदे की सुरक्षा का जिम्मा एक रिटायर्ड एयर मार्शल को सौंप दिया गया! अब देश की जनता असमंजस में है कि इस फैसले पर ठहाका लगाए या सिर धुनकर रोए। व्यवस्था का आलम तो देखिए—मंदिर के दानपात्र की चौकीदारी के लिए अब वही अनुभव चाहिए जो कभी पाकिस्तान से जंग में काम आया था। 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान आसमान से दुश्मनों के छक्के छुड़ाने वाले अफसर को शायद अंदाज़ा भी नहीं होगा कि देश की सबसे बड़ी चुनौती सीमा पार नहीं, बल्कि मंदिर के भीतर चंदे की रसीदों को संभालना बन जाएगी। यह फैसला चीख-चीखकर कह रहा है कि देश में प्रशासनिक अनुभव और ईमानदारी का अकाल पड़ चुका है। अब सिविल अफसरों या ईमानदार ट्रस्टियों के बस की बात नहीं रही कि वे चढ़ावे का हिसाब-किताब रख सकें। रामलला की तिजोरी इतनी संवेदनशील हो चुकी है ...

पूछो उस कुत्ते से !

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    26 अगस्त की बाढ़ में नेपाल का त्रिशूली बाज़ार तबाह होकर 'भूतिया शहर' बन गया, लेकिन एक कुत्ता वहीं शांत खड़ा रहा। इंसानों ने तुरंत मान लिया कि वह अपने मालिक का इंतज़ार कर रहा है, क्योंकि हम हर जानवर के अस्तित्व को केवल इंसानी सेवा और वफ़ादारी के चश्मे से ही देखते हैं।   जापान का हाचिको और रॉयल नेवी का कुत्ता 'जस्ट नूइसेंस' (जो रात में नशे में धुत नाविकों को सुरक्षित जहाजों तक पहुँचाता था) वफ़ादारी के बड़े प्रतीक माने जाते हैं। लेकिन इंसान हमेशा मानता है कि जानवरों का जीवन उसकी ज़रूरतों के लिए ही है।   इंसान खुद को सोचने-समझने की क्षमता के कारण श्रेष्ठ मानता आया है और जानवरों को बिना अधिकारों की 'संपत्ति' समझता है। लेकिन विज्ञान (डार्विन के बाद से) यह स्पष्ट कर चुका है कि इंसानी दिमाग मौलिक रूप से जानवरों से श्रेष्ठ नहीं है।   तबाही के बीच बिल्कुल शांत (Stoic) खड़ा नेपाल का कुत्ता इंसानी सभ्यता के सामने एक आईना रख रहा है। सदियों से इंसानों के साथ रहते हुए इन बेजुबानों ने हमारे बुरे-से-बुरे कृत्यों को देखा है।   जानवर इंसानों के अधीन या...

फिल्म 'तरेंगन' (Tarengan) का मुख्य कथा सार (Synopsis)

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   यह बिहार के मुशहर  परिवार की एक मार्मिक कहानी है।एक पिता के निस्वार्थ प्रेम, त्याग और बेटे की कृतघ्नता की भावुक कहानी पर आधारित है: 1. संघर्ष और समर्पण (1993 - 2004) कहानी बिहार की पृष्ठभूमि में 1993 से 2004 के दौर को दर्शाती है। मुख्य पात्र जुगल मुसहर समाज से आने वाला एक मूक-बधिर (बोल और सुन न पाने वाला) रिक्शा चालक है। जुगल का जीवन अत्यंत अभावों में बीतता है, जहाँ वह अमीरों के बच्चों को रिक्शा से स्कूल छोड़ने का काम करता है। तमाम मुश्किलों और सामाजिक विषमताओं के बावजूद, जुगल का एक ही सपना है—अपने प्यारे बेटे 'तरेंगन' को पढ़ा-लिखाकर एक बड़ा और आदरणीय इंसान बनाना। वह अपने बेटे के बेहतर भविष्य के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी और खुशियाँ न्योछावर कर देता है। 2. सफलता और दूरी पिता के कड़े परिश्रम और त्याग के बल पर तरेंगन अपनी पढ़ाई पूरी करता है और आगे चलकर एक ऊँचे पद और अच्छे सामाजिक ओहदे पर पहुँच जाता है। 3. घमंड और रिश्तों का पतन सफलता और ओहदा मिलते ही तरेंगन के व्यवहार में बदलाव आ जाता है। वह अपने गरीब और मूक-बधिर पिता के त्याग और संघर्षों को भूलकर घमंडी तथा लापरवाह हो जाता है...

विष का प्याला और चढ़ता पाप: बेढना के उस खूनी जाम की कहानी। -प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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     कहते हैं कि पाप का घड़ा चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, एक दिन उसके भरने का वक्त आ ही जाता है। जब इंसान के सर पर बदले की आग चढ़कर बोलने लगती है, तो विवेक की आँखें बंद हो जाती हैं। लेकिन वो यह भूल जाता है कि कानून और कुदरत के हाथ हमेशा जुर्म की गर्दन तक पहुँच ही जाते हैं। पटना के शांत ग्रामीण इलाके बाढ़ के बेढना गांव में 30 अगस्त की शाम कुछ अलग नहीं लग रही थी। गांव के चार दोस्त—नीशू और उसके साथी—खुशनुमा माहौल में महफिल जमाने की तैयारी में थे। उन्हें क्या मालूम था कि जिस जाम को वो खुशी का जरिया समझ रहे हैं, उसमें मौत घुल चुकी है। इस साजिश का ताना-बाना बुन रहा था लाली कुमार। लाली के दिल में पिछले दो-ढाई सालों से नफरत का जहर उबल रहा था। वजह थी नीशू का उसकी बहन के साथ प्रेम प्रसंग। ऊपर से नीशू और उसके साथियों के तंज और ताने लाली के जख्मों पर नमक का काम करते थे। प्रतिशोध की आग में अंधा हो चुका लाली अब सिर्फ सही मौके की तलाश में था। लाली ने अपने साथी, सब्जी विक्रेता रुदल कुमार, और एक अन्य मददगार के साथ मिलकर एक खौफनाक योजना बनाई। बाजार से जहर खरीदा गया। लाली ने बड़े ही दोस्त...