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ज़ूफार्माकोग्नोसी: जब जानवर स्वयं बनते हैं अपने चिकित्सक!

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  प्रकृति ने जीवों को केवल जीवन ही नहीं दिया, बल्कि स्वास्थ्य और उपचार का ज्ञान भी उनके सहज व्यवहार (Instinct) में समाहित किया है। विज्ञान की भाषा में इस प्रक्रिया को ज़ूफार्माकोग्नोसी (Zoopharmacognosy) कहा जाता है, जिसका सीधा अर्थ है—पशु-पक्षियों और अन्य जीवों द्वारा आत्म-उपचार (Self-medication) के लिए वनस्पतियों और प्राकृतिक तत्वों का उपयोग करना। स्व-उपचार के अद्भुत उदाहरण ओरंगुटान का देसी इलाज: इंडोनेशिया के मध्य कालीमंतन स्थित सेबंगु जंगल में ओरंगुटान 'ड्राकेना' (Dracaena) नाम के पौधे की पत्तियों को अपनी लार के साथ मिलाकर पेस्ट बनाते हैं। वे इस पेस्ट को शरीर पर लगाते हैं ताकि मांसपेशियों का दर्द, जोड़ों की अकड़न और त्वचा संबंधी समस्याएं दूर हो सकें। शालपर्णी और चिंपैंजी: नाइजीरिया में चिंपैंजी 'डेस्मोडियम गैंगेटिकम' (Desmodium gangeticum या शालपर्णी) की पत्तियों को निगलकर अपनी त्वचा पर मौजूद परजीवियों से छुटकारा पाते हैं। दिलचस्प बात यह है कि प्राचीन आयुर्वेद में भी महर्षि सुश्रुत जैसे वैद्यों ने इस पौधे का उपयोग दमा, बवासीर और टाइफाइड जैसी बीमारियों के इलाज के लिए...

माता-पिता को खोने का असमय डर और आज की पीढ़ी !

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   माता-पिता: हमारे जीवित अभिलेखागार!  माता-पिता की मृत्यु जीवन की सबसे अटल सच्चाइयों में से एक है। इसके बावजूद, आज के मिलेनियल्स और जेन-जी के लिए यह केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि एक स्थायी और डरावनी चिंता बन चुकी है। दूर देशों में बैठकर अपने माता-पिता के स्वास्थ्य डेटा (स्मार्टवॉच और सेंसर) पर लगातार नजर रखना, दवाइयों का स्टॉक बनाए रखना, करियर के बड़े फैसलों को टालना या उन्हें पीछे छोड़ देना—आज की पीढ़ी इस कड़वे सच को टालने के लिए सब कुछ कर रही है। हालांकि, इस पूरी जद्दोजहद के पीछे एक सबसे बड़ा खौफ यह है कि जिस दिन माता-पिता नहीं रहेंगे, उस दिन वे किसी के "बच्चे" नहीं रहेंगे और जीवन की अग्रिम पंक्ति पर आकर खड़े हो जाएंगे। एक समय था जब माता-पिता की मृत्यु का विचार वयस्कता के उत्तरार्ध में आता था, जब बच्चे खुद जीवन के परिपक्व चरण में होते थे। लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है। 20 से 40 वर्ष की आयु के बीच के युवा अत्यधिक एंग्जायटी और इस असमय डर का सामना कर रहे हैं। कुछ लोग अपने माता-पिता की सुरक्षा को लेकर इतने आशंकित हैं कि उन्होंने घरों में कैमरे और स्मार्ट डिवाइसेस लगवा ल...

अपलिट (UpLit): जब किताबें बनती हैं जीवन का मरहम!

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  आज की भागदौड़ भरी, तनावपूर्ण और शोर-शराबे से भरी ज़िंदगी में लोग सुकून और मानसिक शांति की तलाश में किताबों की ओर रुख कर रहे हैं। इसी रुझान ने साहित्य की दुनिया में एक नए और तेज़ी से उभरते जॉनर (Genre) को जन्म दिया है, जिसे 'UpLit' (Uplifting Literature), कम्फर्ट फिक्शन या हीलिंग फिक्शन कहा जा रहा है। ये ऐसी किताबें हैं जो पाठक को किसी सनसनीखेज सस्पेंस या भारी-भरकम ड्रामा में उलझाने के बजाय, उन्हें मानसिक संबल, आशा और आत्म-सहानुभूति का अहसास कराती हैं। क्या है 'हीलिंग फिक्शन' या अपलिट? अपलिट ऐसी कहानियाँ हैं जो सीधे तौर पर आत्म-सुधार (Self-help) की किताबें नहीं हैं, लेकिन पाठक के दिल को छूकर एक उपचारात्मक (healing) अनुभव देती हैं। जापानी साहित्य में इसे 'इयाशि केई' (Iyashikei) यानी 'भावनात्मक रूप से स्वस्थ करने वाली कहानियाँ' कहा जाता है। इन कहानियों में आमतौर पर: साधारण जीवन के किस्से: रोज़मर्रा की छोटी-छोटी घटनाएँ, खाना बनाना, कॉफी की महक और पुरानी किताबों की दुकानों का वर्णन। सहानुभूति और जुड़ाव: दयालुता, दूसरे मौकों (second chances), नए रिश्तों और प...

मैं दिल्ली का जंतर-मंतर हूँ! - प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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  समय के शिलालेख पर लिखी जनक्रांति और सत्ता के परिवर्तन की अमर गाथा!  1. स्थापत्य से क्रांति तक का सफर मैं केवल पत्थर, चूने और ईंटों से खड़ा कोई लाल-गुलाबी ढाँचा मात्र नहीं हूँ; मैं काल के गाल पर उकेरा गया इतिहास का एक जीवंत हस्ताक्षर हूँ। १८वीं सदी की शुरुआत में (सन १७२४), महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने मुझे नक्षत्रों की गति नापने, समय की चाल को समझने और खगोलशास्त्र के रहस्यों को सुलझाने के लिए गढ़ा था। मेरे सम्राट यंत्र, जय प्रकाश यंत्र और राम यंत्र सदियों से तारों और ग्रहों से बातें करते आ रहे हैं। पर समय का चक्र बदला, और खगोलशास्त्र की गणना करने वाली मेरी दीवारें देश की राजनीति और जन-आंदोलनों की दिशा तय करने लगीं। तारों की चाल से शुरू हुआ मेरा सफर, सत्ता की चाल बदलने का सबसे बड़ा केंद्र बन गया। "मैं वो वेधशाला हूँ जो सिर्फ़ आसमान के तारे नहीं गिनती, बल्कि धरातल पर तख्तो-ताज की किस्मत भी नापती है।" 2. सत्ता के गुरूर को तोड़ती मेरी ज़मीन मेरे आगोश में आज़ादी के बाद के भारत का संपूर्ण इतिहास और धड़कता हुआ वर्तमान समाहित है। जब-जब सत्ता के गलियारों में निरंकुशता ने जन्म लिया, ...

लोकतंत्र में जनशक्ति की विजय: जब छात्र आंदोलन के आगे झुकी सत्ता ! -प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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   जन-आकांक्षाएँ, प्रशासनिक जवाबदेही और लोकतंत्र में आम आदमी की शक्ति।  लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि इसमें सत्ता का अंतिम स्रोत कोई पद, महल या व्यवस्था नहीं, बल्कि इस देश का आम नागरिक होता है। जब-जब सत्ता अपने कर्तव्यों से विमुख होती है या प्रशासनिक खामियों के कारण आम जनमानस—विशेषकर युवाओं का भविष्य—अंधकार में जाने लगता है, तब-तब यही लोकतंत्र अपनी वास्तविक ताकत दिखाता है। हाल ही में NEET-UG परीक्षा विवाद के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इसी लोकतांत्रिक शक्ति का एक सजीव प्रमाण है। पृष्ठभूमि: जब सड़कों पर उतरा देश का भविष्य NEET जैसी देश की सबसे बड़ी और संवेदनशील परीक्षाओं में धांधली, पेपर लीक और अनियमितताओं के आरोपों ने लाखों परीक्षार्थियों और उनके परिवारों को झकझोर कर रख दिया था। दिल्ली के जंतर-मंतर पर शुरू हुआ छात्रों का आंदोलन केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं था, बल्कि वह देश के उस युवा का आक्रोश था जिसकी मेहनत पर व्यवस्था की कमियों का पानी फिर रहा था। महीनों तक धूप, बारिश और अनिश्चितता के बीच जंतर-मंतर पर डटे छात्रों और उनके समर्थकों ने ...

1/29 बिहार बटालियन NCC, पटना द्वारा राम लखन सिंह यादव कॉलेज में 'टीबी मुक्त भारत अभियान' का भव्य आयोजन!

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पटना । 25 जुलाई 26 राम लखन सिंह यादव कॉलेज, अनीसाबाद (पटना) के तत्वावधान में 1/29 बिहार बटालियन NCC, पटना द्वारा "टीबी मुक्त भारत अभियान" के अंतर्गत एक भव्य जन-जागरूकता कार्यक्रम का सफल आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य समाज में टीबी (क्षय रोग) के प्रति जागरूकता फैलाना, इसके समय पर इलाज और रोकथाम के उपायों से आमजन को अवगत कराना था। यह पूरा अभियान Associate NCC Officer Lt. Mukesh Kumar Yadav के कुशल मार्गदर्शन में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में महाविद्यालय के माननीय प्राचार्य प्रो. सुरेन्द्र प्रसाद के साथ डॉ. शंकर प्रसाद साहा, प्रो. मनीष भारती, प्रो. हरेन्द्र कुमार, प्रो. सत्येन्द्र कुमार, प्रो. रोहित भारती, प्रो. रोहित कुमार, अन्य शिक्षकगण, एनसीसी कैडेट्स एवं विद्यार्थियों ने बढ़-चढ़कर एवं उत्साहपूर्वक भाग लिया। 🚶‍♂️ विशाल जागरूकता रैली का आयोजन कार्यक्रम के दौरान एक जन-जागरूकता रैली निकाली गई, जो राम लखन सिंह यादव कॉलेज परिसर से प्रारंभ होकर अनीसाबाद – चितकोहरा मार्ग से होते हुए पुनः महाविद्यालय परिसर में समाप्त हुई। हाथों में तख्तियां और बैनर लिए एनसीसी कैडेट्स ने ...

उत्तर क्रांति: जब यूनिवर्सिटी ने खत्म किया पेपर लीक का 'डिप्रेशन'!

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  प्रश्न पत्र के साथ answer भी।  शिक्षा जगत में रोज़ नए-नए प्रयोग होते रहते हैं, लेकिन राजस्थान यूनिवर्सिटी ने जो ऐतिहासिक कीर्तिमान स्थापित किया है, उसकी कल्पना तो स्वयं नोबेल पुरस्कार समिति ने भी नहीं की होगी। जहाँ देश भर के युवा 'पेपर लीक' के डर से अवसाद में चले जाते हैं, वहीं जयपुर की इस महान यूनिवर्सिटी ने समस्या की जड़ पर ही प्रहार कर दिया। ना रहेगा बाँस, ना बजेगी बंसुरी—और ना होगी लीक की टेंशन, जब प्रश्न पत्र के साथ उत्तर पत्र ही 'फ्री' होम डिलीवरी में मिल जाए! मामला एमए समाजशास्त्र के द्वितीय सेमेस्टर का है। परीक्षार्थी हाथों में पेन और दिमाग में डिप्रेशन लिए 'इंडियन सोसायटी' का पेपर देने पहुँचे थे। दिल की धड़कनें बढ़ी हुई थीं कि न जाने कौन सा कठिन सवाल सामने आ जाए। पर जैसे ही प्रश्न पत्र हाथ में आया, परीक्षार्थियों की आँखों से गंगा-जमुना बहने लगी—खुशी के आँसू! सवालों के नीचे बाकायदा थ्योरी और उत्तर छपे हुए थे, वो भी शायद किसी कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की असीम अनुकंपा से। सोचिए, कितना क्रांतिकारी विचार है! छात्र को उत्तर याद करने की झंझट से मुक्ति। नकल कर...