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स्वाद और सेहत का महासंग्राम: सुधा की "दही खाओ इनाम पाओ" प्रतियोगिता !

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   ​मकर संक्रांति के उत्सव में लगेगा उत्साह का तड़का, पटना में जुटेंगे देशभर के 'दही प्रेमी' ​पटना। बिहार की समृद्ध परंपरा और स्वाद के संगम को एक बार फिर जीवंत करने के लिए पटना डेयरी प्रोजेक्ट (सुधा) तैयार है। पिछले 15 वर्षों से लगातार आयोजित होने वाली अपनी सबसे लोकप्रिय और पारंपरिक प्रतियोगिता "दही खाओ इनाम पाओ" का आयोजन इस वर्ष 20 जनवरी 2026 को होने जा रहा है। ​मकर संक्रांति के पावन अवसर के बाद आयोजित होने वाली यह प्रतियोगिता केवल एक स्पर्धा नहीं, बल्कि उत्तर भारत की ग्रामीण संस्कृति का एक उत्सव बन चुकी है। ​🕒 प्रतियोगिता का मुख्य विवरण ​तारीख: 20 जनवरी 2026 ​स्थान: पटना डेयरी प्रोजेक्ट परिसर, फुलवारी शरीफ, पटना। ​समय सीमा: प्रत्येक प्रतिभागी को दही खाने के लिए 3 मिनट का समय दिया जाएगा। ​पुरस्कार: निर्धारित समय में सर्वाधिक दही खाने वाले विजेताओं को प्रथम, द्वितीय और तृतीय पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। ​📝 कौन ले सकता है भाग? ​इस प्रतियोगिता का आकर्षण इतना अधिक है कि इसमें बिहार के अलावा झारखंड, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली और हैदराबाद जैसे राज्यों से भी लोग ...

जीवन का वास्तविक माधुर्य: प्रेम और समन्वय !

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    सृष्टि की समस्त रचनाओं में मनुष्य को श्रेष्ठ माना गया है, किंतु विडंबना यह है कि वह अक्सर जीवन के सबसे सरल और सहज सत्य को विस्मृत कर देता है। हम अक्सर बाहरी उपलब्धियों और भौतिक सुखों की खोज में इतने लीन हो जाते हैं कि यह भूल जाते हैं कि जीवन का वास्तविक रस बाहरी वैभव में नहीं, बल्कि आंतरिक सद्भाव में निहित है। ​सहयोग और प्रेम: जीवन के आधार स्तंभ  मनुष्य आज इस लघु किंतु मर्मस्पर्शी सत्य को समझने में असमर्थ है कि सहयोग, सत्कार, प्रेम और आपसी समन्वय ही वे कुंजी हैं, जिनसे आनंद के द्वार खुलते हैं। जब हम एक-दूसरे के प्रति सम्मान (सत्कार) का भाव रखते हैं और मतभेदों के बीच समन्वय स्थापित करते हैं, तब जीवन एक बोझ न रहकर एक उत्सव बन जाता है। प्रेम ही वह तत्व है जो दो अपरिचित हृदयों के बीच अपनत्व का सेतु बनाता है। ​घृणा का अंधकार और समय की रेत हमारी जीवन अवधि सीमित है। यदि हम इस बहुमूल्य समय का अधिकांश हिस्सा परस्पर घृणा, ईर्ष्या और दूसरों को मानसिक क्लेश पहुँचाने में व्यतीत कर देते हैं, तो हम अनजाने में स्वयं को भी उसी अशांति की अग्नि में झोंक देते हैं। नकारात्मकता एक ऐसा चक्र...

कृषि की असली सूत्रधार: परंपरा और विज्ञान का संगम!

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   ​ग्रामीण अंचलों में खेती केवल मिट्टी से अनाज उगाने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह एक जीवंत संस्कृति है जिसकी धुरी महिलाएं हैं। महिलाओं के पास पारंपरिक कृषि ज्ञान की अपार संपदा है। वे केवल श्रम नहीं करतीं, बल्कि वे बीजों की संरक्षक, मिट्टी की पारखी और मौसम की भविष्यवक्ता भी हैं। ​1. अनुभव से उपजा विज्ञान ​महिलाओं का कृषि ज्ञान 'अनुभव की प्रयोगशाला' से निकला है। वे बादलों की दिशा देखकर बारिश का अनुमान लगा लेती हैं और मिट्टी की महक से उसकी उर्वरता पहचान लेती हैं। यदि इस पारंपरिक बोध को औपचारिक शिक्षा और आधुनिक शोध से जोड़ दिया जाए, तो कृषि नवाचार अधिक मानवीय और टिकाऊ बन सकता है। ​2. लोकगीतों में रची-बसी खेती ​महिलाओं का कृषि में योगदान केवल खेतों तक सीमित नहीं है, उन्होंने इसे कलात्मकता से भी भरा है। फसल बोते समय, निराई करते समय या कटाई के दौरान गाए जाने वाले मौसमी और ऋतु गीत (जैसे कजरी, चैती या सोहर) न केवल थकान मिटाते हैं, बल्कि कृषि चक्र की जानकारी को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाते हैं। ये गीत खेतों में एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं। ​3. घाघ और भड्डरी की कहावतों...

​लघु व्यवसायों का सुदृढ़ीकरण: आर्थिक एवं प्रशासनिक सुधार !

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   ​ सूक्ष्म और लघु उद्यमों (MSEs) के पारिस्थितिकी तंत्र को सरल बनाने और उनके आर्थिक योगदान को बढ़ाने के लिए प्रमुख रणनीतियों का विवरण ।- ​1. प्रशासनिक सरलीकरण और एकल खिड़की प्रणाली (Single Window System) ​छोटे स्तर के व्यवसायों के पंजीकरण और अन्य वैधानिक प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने के लिए 'एकल खिड़की प्रणाली' का कार्यान्वयन अनिवार्य है। यह तंत्र व्यवसाय करने की लागत को कम करता है और उद्यमियों को एक ही स्थान पर सभी आवश्यक अनुमोदन प्रदान कर 'इज ऑफ डूइंग बिजनेस' को बढ़ावा देता है। ​2. डिजिटल परिवर्तन और ई-गवर्नेंस  ​व्यापारिक प्रक्रियाओं का डिजिटलीकरण और ई-गवर्नेंस को अपनाना आधुनिक अर्थव्यवस्था की मांग है। इससे न केवल पारदर्शिता बढ़ती है, बल्कि बिचौलियों की भूमिका समाप्त होती है। ऑनलाइन सेवाओं की उपलब्धता से दूर-दराज के क्षेत्रों के छोटे व्यवसायी भी मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से जुड़ सकते हैं। ​3. विनियामक ढांचा  ​व्यापारिक नियमों और विनियमों में स्पष्टता और सरलता 'अनुपालन बोझ' को कम करती है। जटिल कानूनी प्रक्रियाओं के स्थान पर स्पष्ट नीतिगत दिशा-निर्देश लघु उद्य...

भीषण ठंड में सिस्टम 'फ्रीज': मैनपुर अंडा पंचायत में PM किसान रजिस्ट्रेशन ठप, घंटों लाइन में लगकर मायूस लौटे बुजुर्ग किसान !

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    ​फुलवारी शरीफ (पटना): एक तरफ प्रकृति का कहर और दूसरी तरफ सिस्टम की बेरुखी—इन दोनों के बीच पिसा जा रहा है देश का अन्नदाता। फुलवारी प्रखंड के मैनपुर अंडा पंचायत में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना (PM Kisan) के लिए आयोजित कैंप बदइंतजामी की भेंट चढ़ गया। आलम यह रहा कि सुबह 10 बजे से कड़ाके की ठंड में कांपते हुए कतारों में खड़े सैकड़ों किसानों को अंत में निराशा ही हाथ लगी। ​सर्वर ने बढ़ाई मुसीबत, दो दिन में मात्र 15 रजिस्ट्रेशन ​कैंप में आए किसानों की भीड़ के सामने तकनीक पूरी तरह फेल नजर आई। शनिवार को सुबह से ही किसान अपनी बारी का इंतजार करते रहे, लेकिन सर्वर डाउन होने के कारण दिनभर में मात्र 8 किसानों का ही रजिस्ट्रेशन हो सका। स्थानीय लोगों के अनुसार, पिछले दिन भी स्थिति ऐसी ही थी और महज 7 किसानों का काम हो पाया था। ​ठिठुरते बुजुर्ग और प्रशासन की लाचारी ​भीषण ठंड के बावजूद मैनपुरा के वयोवृद्ध किसान दिनेश सिंह और विजेंदर सिंह हाथ में लाठी लिए थरथराते हुए अपनी बारी का इंतजार करते दिखे। उनके साथ ही बाबूचक के कुलेश्वर राय, ललन गोप, मंझौली के समेश्वर शर्मा, खड़कचक के विजय शर्मा ...

बाजारवाद की भेंट चढ़ते मानवीय संबंध !

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  ​आज के दौर में परिवर्तन ही एकमात्र स्थिर सत्य है। जैसा कि कहा जाता है, "बदलाव यदि सकारात्मक और मानवीय हो, तो इससे अच्छा क्या हो सकता है।" लेकिन समकालीन समाज में हम जिस बदलाव के साक्षी बन रहे हैं, वह अक्सर मानवीय संवेदनाओं से प्रेरित न होकर 'बाजारवाद'  से संचालित है। ​बाजार का मनोवैज्ञानिक दबाव ​मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो बाजारवाद ने मनुष्य को केवल एक 'उपभोक्ता' बना दिया है। जब यही मानसिकता मानवीय रिश्तों में प्रवेश करती है, तो हम रिश्तों को भी 'उपयोगिता'  के चश्मे से देखने लगते हैं। ​परिणाम: जिस तरह हम पुरानी वस्तुओं को बदलकर नई वस्तुएं लेने के आदी हो गए हैं, वही अधीरता अब हमारे सामाजिक और निजी संबंधों में भी दिखाई देने लगी है। ​विवाह संस्था और अनिश्चितता  विवाह, जो कभी स्थायित्व और सुरक्षा का प्रतीक था, आज एक जटिल पहेली बन गया है। ​उलझन: व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच फंसे आधुनिक इंसान के लिए यह तय करना कठिन हो गया है कि रिश्ता कब तक टिकेगा। ​असुरक्षा: भविष्य की अनिश्चितता रिश्तों में वह 'गहराई' और 'ठहराव' नहीं...

बढ़ता प्रदूषण: हमारे स्वास्थ्य और भविष्य पर गहराता संकट !

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    ​आज के दौर में विकास की अंधी दौड़ ने हमें एक ऐसे मुकाम पर खड़ा कर दिया है, जहाँ खुली हवा में सांस लेना भी दूभर हो गया है। हालिया शोध और सर्वेक्षणों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि प्रदूषण अब केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि एक गंभीर 'मेडिकल इमरजेंसी' बन चुका है। ​स्वास्थ्य पर बहुआयामी प्रहार ​प्रदूषण का असर अब केवल फेफड़ों तक सीमित नहीं है। चित्र में दिए गए तथ्यों के अनुसार, इसके प्रभाव अत्यंत चिंताजनक हैं: ​श्वसन और हृदय रोग: हवा में मौजूद सूक्ष्म कण न केवल सांस लेने में दिक्कत पैदा कर रहे हैं, बल्कि हृदय संबंधी बीमारियों और गंभीर एलर्जी का कारण भी बन रहे हैं। ​मस्तिष्क पर प्रभाव: चौंकाने वाली बात यह है कि लोग अब प्रदूषण के कारण अल्जाइमर और पार्किंसन जैसी न्यूरोलॉजिकल बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। ​कमजोर होती रोग प्रतिरोधक क्षमता: प्रदूषण ने इंसानी शरीर की इम्यूनिटी (रोग प्रतिरोधक क्षमता) को इस कदर घटा दिया है कि अब सामान्य एंटीबायोटिक दवाएं भी शरीर पर असर करना कम कर रही हैं। यह स्थिति भविष्य में किसी भी महामारी को और अधिक घातक बना सकती है। ​प्रकृति का बिगड़ता संतुलन ​प्रद...