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RBI की नीति: दरें स्थिर, लेकिन क्या बाजार में पैसा ज्यादा है?

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  ​हाल ही में रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने अपनी बैठक में रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रखने का निर्णय लिया है। बजट 2026-27 के ठीक बाद आई यह घोषणा आर्थिक स्थिरता के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है, लेकिन इसके साथ ही कुछ गंभीर सवाल भी खड़े हो रहे हैं। ​1. यथास्थिति का तर्क (Status Quo) ​RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने रेपो रेट में कोई बदलाव न करके एक सुरक्षित रास्ता चुना है। इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं: ​नया डेटा आने का इंतज़ार: सरकार जीडीपी (GDP) और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के लिए 'बेस ईयर' (आधार वर्ष) को बदलने वाली है। जब तक नए आंकड़े सामने नहीं आते, तब तक दरों में बदलाव करना जोखिम भरा हो सकता था। ​महंगाई का लक्ष्य: मुद्रास्फीति फिलहाल 4% के लक्ष्य के दायरे में बनी हुई है, जिससे केंद्रीय बैंक को जल्दबाजी में दरें घटाने या बढ़ाने की जरूरत महसूस नहीं हुई। ​2. लिक्विडिटी (तरलता) का मुद्दा: जरूरत या ज्यादती? ​ ​अत्यधिक सरप्लस: आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, सिस्टम में औसत सरप्लस लिक्विडिटी पिछले वर्ष की तुलना में 117 गुना बढ़ गई है। ​चिंता: लेखक का तर्क है कि RBI "...

आप्रवासन और अमेरिकी अर्थव्यवस्था: एक आर्थिक विश्लेषण !

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  ​हालिया जनगणना डेटा और आर्थिक रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि अमेरिका अपनी जनसंख्या वृद्धि में एक ऐतिहासिक गिरावट का सामना कर रहा है। जहाँ पहले विशेषज्ञों का मानना था कि अमेरिकी जनसंख्या 2081 तक कम नहीं होगी, वहीं वर्तमान अनुमानों के अनुसार यह गिरावट बहुत जल्द शुरू हो सकती है। ​ 1. जनसंख्या संकट और कार्यबल की कमी ​2024-2025 के बीच अमेरिकी जनसंख्या केवल 0.5% बढ़ी है। इस सुस्ती का मुख्य कारण 'शुद्ध अंतर्राष्ट्रीय प्रवासन' (Net International Migration) में भारी कमी है। ​जनसांख्यिकीय असंतुलन: जन्म दर पहले से ही कम है। यदि आप्रवासन और कम होता है, तो कार्यबल में युवाओं की कमी हो जाएगी। ​आर्थिक प्रभाव: युवाओं की कमी का अर्थ है नौकरियों को भरने के लिए श्रमिकों का अभाव और सोशल सिक्योरिटी (Social Security) जैसे सरकारी कार्यक्रमों के वित्तपोषण के लिए करदाताओं की कमी। ​ 2. राजकोषीय योगदान बनाम भ्रांतियाँ ​राजनीतिक बहसों में अक्सर आप्रवासियों को देश पर बोझ बताया जाता है, लेकिन डेटा इसके विपरीत कहानी पेश करता है: ​कैटो इंस्टीट्यूट (Cato Institute) की रिपोर्ट: 1994 से 2023 के बीच, आप्रवासिय...

शिक्षा जगत के एक युग का अंत: प्रो. (डॉ.) कौशल किशोर मंडल जी को भावभीनी श्रद्धांजलि !

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 हमें गर्व है कि इनकी सुपुत्री हमारे कॉलेजमें प्रोफेसर हैं। ​ "शब्दों में पिरोना कठिन है उस व्यक्तित्व को, जिसने अपना संपूर्ण जीवन ज्ञान की ज्योति जलाने में समर्पित कर दिया।" ​अत्यंत भारी मन से हमें यह साझा करना पड़ रहा है कि तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय (TMBU) के पूर्व प्रति कुलपति और प्रखर समाजवादी चिंतक प्रो. (डॉ.) कौशल किशोर मंडल अब हमारे बीच नहीं रहे। उनके निधन से न केवल उनके परिवार, बल्कि समूचे शिक्षा जगत और बौद्धिक समाज में एक अपूरणीय शून्य पैदा हो गया है। ​एक गौरवशाली शैक्षणिक सफर ​डॉ. मंडल केवल एक पद का नाम नहीं थे, बल्कि वे अनुशासन और विद्वता के प्रतिमान थे। उनके करियर के कुछ मुख्य पड़ाव उनकी कर्मठता की कहानी कहते हैं: ​नेतृत्व: उन्होंने 12 दिसंबर 2004 से 11 दिसंबर 2007 तक TMBU के प्रति कुलपति के रूप में विश्वविद्यालय के विकास में ऐतिहासिक योगदान दिया। ​प्रशासनिक कुशलता: बीएनएमयू (BNMU) में सामाजिक विज्ञान संकायाध्यक्ष के रूप में उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों का बखूबी निर्वहन किया। ​संस्थानों से जुड़ाव: मधेपुरा के टीपी कॉलेज और वहां की मिट्टी से उनका गहरा लगाव था। ...

बिहार: न्याय की गुहार बनाम प्रतिशोध की गिरफ़्तारी !😢😢

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  ​बिहार की राजनीति में 'न्याय के साथ विकास' का नारा अब एक विडंबना की तरह लगने लगा है। 7 फरवरी 2026 की आधी रात को सांसद पप्पू यादव की गिरफ्तारी ने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली और उसकी प्राथमिकताओं पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह घटनाक्रम केवल एक नेता की गिरफ़्तारी नहीं, बल्कि इस बात का प्रमाण है कि सत्ता जब असुरक्षित महसूस करती है, तो वह कानून को न्याय का औज़ार बनाने के बजाय प्रतिशोध का हथियार बना लेती है। ​ 31 साल पुराने मामले की 'सजगता' और वर्तमान का सन्नाटा ​सरकार की कार्यकुशलता पर सबसे बड़ा सवाल इसकी टाइमिंग को लेकर है। जिस मामले में पप्पू यादव को आधी रात को गिरफ्तार किया गया, वह 31 साल पुराना है—किराए के मकान से जुड़ा एक विवाद। ​सवाल उठता है कि: क्या तीन दशकों से सो रहा प्रशासन अचानक इतना मुस्तैद हो गया कि बिना किसी पूर्व सूचना या नोटिस के रात के 12 बजे कार्रवाई करना ज़रूरी हो गया? ​सच्चाई: यह 'मुस्तैदी' कानून के पालन से अधिक, सत्ता की खीझ को दर्शाती है। ​ नीट छात्रा कांड: न्याय कहाँ है? ​एक तरफ प्रशासन 31 साल पुराने छोटे से मामले में 'सुपर एक्टिव' ...

भारत में मानसिक स्वास्थ्य संकट: चुनौतियां और समाधान !

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  ​भारत वर्तमान में एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य आपातकाल का सामना कर रहा है। हालिया आर्थिक सर्वेक्षण और बजट घोषणाओं ने इस मुद्दे को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है। विशेष रूप से बच्चों और किशोरों में बढ़ती डिजिटल लत (Digital Addiction) और स्क्रीन से जुड़ी समस्याओं ने विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। ​1. मानसिक स्वास्थ्य का बढ़ता बोझ ​आंकड़े एक डरावनी तस्वीर पेश करते हैं: ​वैश्विक हिस्सेदारी: दुनिया की कुल आत्महत्याओं, अवसाद और नशे की लत के मामलों में भारत की हिस्सेदारी लगभग एक-तिहाई है। ​युवाओं पर प्रभाव: 15 से 29 वर्ष की आयु के भारतीयों में मृत्यु का एक प्रमुख कारण आत्महत्या है। ​आर्थिक नुकसान: WHO के अनुसार, 2012 से 2030 के बीच मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों के कारण भारत को लगभग $1.03 ट्रिलियन का आर्थिक नुकसान होने का अनुमान है। ​इलाज का अंतर: लगभग 70% से 90% लोगों को जागरूकता की कमी, सामाजिक कलंक और पेशेवरों की कमी के कारण उचित उपचार नहीं मिल पाता है। ​2. बुनियादी ढांचे की कमी ​भारत में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की भारी कमी है। भारतीय मनोचिकित्सा जर्नल के अनुसार: ​भारत में प्रति 1,...

सचेत रहें: आपकी सुनने की क्षमता खतरे में है!

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​अक्सर हम बड़े संगीत समारोहों, रैलियों या तेज शोर वाले आयोजनों का आनंद तो लेते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह शोर आपके कानों को स्थायी रूप से बीमार कर रहा है? हालिया शोध और विशेषज्ञों की राय के अनुसार, तेज संगीत से होने वाला नुकसान आपकी जानकारी में आने से बहुत पहले ही शुरू हो जाता है। ​क्या है 'हिडन हियरिंग लॉस'? ​सामान्य तौर पर हम मानते हैं कि अगर हम धीमी आवाजें सुन पा रहे हैं, तो हमारे कान बिल्कुल ठीक हैं। लेकिन वैज्ञानिकों ने कोक्लियर सिनैप्टोपैथी (Cochlear Synaptopathy) नामक स्थिति की पहचान की है, जिसे "छिपी हुई श्रवण हानि" कहा जाता है। ​नुकसान कहाँ होता है?: यह हमारे कान की कोशिकाओं और मस्तिष्क के बीच संपर्क बनाने वाले सिनैप्स (Synapses) को नुकसान पहुँचाता है। ​पकड़ में क्यों नहीं आता?: मानक ऑडियोोग्राम टेस्ट केवल ध्वनि की संवेदनशीलता (कितना धीमा आप सुन सकते हैं) को मापते हैं। चूंकि सिनैप्स का नुकसान शुरुआत में सुनने की क्षमता (Volume) को कम नहीं करता, इसलिए टेस्ट रिपोर्ट 'नॉर्मल' आती है, जबकि नुकसान शुरू हो चुका होता है। ​मुख्य लक्षण और प्रभाव ​यदि आप...

आयुष (AYUSH) क्षेत्र का कायाकल्प: बजट 2026-27 और भविष्य की राह !

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  ​हाल ही में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा प्रस्तुत बजट 2026-27 में आयुष (आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी) क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण घोषणाएं की गई हैं। यह न केवल स्वास्थ्य क्षेत्र में एक बड़े निवेश का संकेत है, बल्कि भारतीय पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने की एक सोची-समझी रणनीति भी है। ​बजट की प्रमुख घोषणाएं और वित्तीय प्रोत्साहन ​सरकार ने आयुष क्षेत्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराते हुए बजट आवंटन में भारी वृद्धि की है: ​कुल बजट: आयुष का कुल बजट बढ़कर ₹4,408 करोड़ हो गया है (जो पिछले वर्ष ₹3,992 करोड़ था)। ​राष्ट्रीय आयुष मिशन: इसके बजट में 66% की भारी वृद्धि की गई है, जिससे यह अब ₹1,300 करोड़ का हो गया है। ​अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (AIIA): एम्स (AIIMS) की तर्ज पर तीन नए संस्थानों की स्थापना की घोषणा की गई है, जो शोध, शिक्षण और उपचार में स्वर्ण मानक स्थापित करेंगे। ​भारत-यूरोपीय संघ (EU) मुक्त व्यापार समझौता और वैश्विक पहुंच ​आयुष के लिए सबसे बड़ा 'गेम-चेंजर' भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुआ मुक्त व्यापार समझौता (FTA)...