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बिहार के क्षितिज पर 'तेजस्वी' सूर्य: सामाजिक न्याय की विरासत और युवा संकल्प ! प्रो प्रसिद्ध कुमार ।

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  ​बिहार की राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं, बल्कि सदियों से दबे-कुचले समाज की हुंकार रही है। इस हुंकार को स्वर दिया लालू प्रसाद यादव ने, और आज उसी मशाल को थामकर एक युवा नेतृत्व नए इतिहास की इबारत लिख रहा है। ​विरासत: संघर्ष की कोख से उपजा विश्वास ​कल्पना मात्र से अंतर्मन सिहर उठता है कि यदि भारतीय राजनीति के पटल पर लालू प्रसाद यादव जैसा व्यक्तित्व न होता, तो समाज के अंतिम पायदान पर खड़ा व्यक्ति आज भी अपमान और अभाव की बेड़ियों में जकड़ा होता। वे केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि 'गरीबों की मुखर जिह्वा' बनकर उभरे। ​उन्होंने सत्ता के गलियारों के द्वार उन लोगों के लिए खोल दिए, जिन्होंने कभी संसद या विधानसभा की चौखट लांघने का स्वप्न भी नहीं देखा था। जिसे लोग 'वोट' समझते थे, लालू जी ने उसे 'चेतना' बना दिया। हालांकि, समय-समय पर धार्मिक आडंबरों और षड्यंत्रों के द्वारा इस चेतना को कुंद करने के प्रयास हुए, परंतु लोक-शक्ति की जड़ें आज भी अडिग हैं। ​तेजस्वी यादव: राजनीति के नव-आकाश का उदय ​आज जब हम तेजस्वी यादव को देखते हैं, तो उनमें एक परिपक्व राजनेता और युवाओं की धड़कन का अद्भुत सं...

ट्रंप की ग्रीनलैंड महत्त्वाकांक्षा: कूटनीतिक दबाव और नव-साम्राज्यवाद का विश्लेषण !

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  ​ ​संसाधन बनाम सुरक्षा का तर्क: ट्रंप प्रशासन का दावा है कि ग्रीनलैंड "सुरक्षा" के लिए आवश्यक है, लेकिन असली प्रेरणा वहां मौजूद विशाल प्राकृतिक संसाधन हैं। ग्रीनलैंड में ग्रेफाइट और टाइटेनियम जैसे 25 "महत्वपूर्ण कच्चे माल" मौजूद हैं जो सैन्य तकनीक और स्वच्छ ऊर्जा के लिए अनिवार्य हैं। यह सुरक्षा के नाम पर संसाधनों के दोहन की पुरानी साम्राज्यवादी नीति को दर्शाता है। ​आर्थिक ब्लैकमेल: डेनमार्क और यूरोपीय सहयोगियों पर 10% से 25% तक का आयात शुल्क लगाने की धमकी देना अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मानदंडों का उल्लंघन है। यह दर्शाता है कि अमेरिका अपने रणनीतिक हितों को साधने के लिए वैश्विक व्यापार प्रणाली को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है। ​नाटो (NATO) और संप्रभुता का संकट: ग्रीनलैंड पहले से ही नाटो द्वारा संरक्षित है। ऐसे में अमेरिका का अतिरिक्त नियंत्रण चाहना रूस या चीन के प्रभाव को रोकने के बहाने अपनी भू-राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश है। डेनमार्क की संप्रभुता को दरकिनार करना 'नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था' के लिए एक बड़ा खतरा है। ​वैश्विक प्रतिक्रिया की आ...

सादगी का 'श्राद्ध' और वीआईपी संस्कृति का 'अश्वमेध'!

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  ​आज के युग में 'सादगी' शब्द डिक्शनरी के किसी कोने में दुबक कर अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है। विशेषकर हमारे माननीय जनसेवकों के जीवन में सादगी अब केवल चुनाव पूर्व जारी होने वाले 'घोषणापत्र' की शोभा बढ़ाने के काम आती है। जैसे ही मतपेटी से भाग्य का सूर्य उदय होता है, सादगी का 'सूर्यास्त' हो जाता है और 'वीआईपी संस्कृति' का वह अश्वमेध यज्ञ शुरू होता है, जिसके घोड़े आम आदमी की छाती पर दलदल की तरह रेंगते हैं। ​खादी की चमक और मखमली मखौल ​वह दौर अब 'ब्लैक एंड व्हाइट' फिल्मों की रील के साथ इतिहास हो गया, जब खादी का मतलब त्याग होता था। आज की खादी इतनी 'कड़क' है कि उसमें जनता की चीखें सुनाई ही नहीं देतीं। सादगी को तिलांजलि देना अब केवल व्यक्तिगत पसंद नहीं, बल्कि एक अनिवार्य 'राजधर्म' बन गया है। अगर नेता के काफिले में हूटरों का शोर न हो, तो उसे लगता है कि उसकी सत्ता को 'लकवा' मार गया है। सड़कों पर घंटों रुकी हुई एम्बुलेंस और पसीने से तर-बतर जनता दरअसल उस 'वीआईपी' महोदय की महानता के लिए दी गई अनिवार्य बलि है। ​सुरक्षा का घेरा या जन...

जननायक की विरासत और तेजस्वी का संकल्प: "न कर्पूरी झुके, न लालू झुके, न तेजस्वी झुकेगा"

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  ​पटना के राजद राज्य कार्यालय में जननायक कर्पूरी ठाकुर जी की 102वीं जयंती के अवसर पर आयोजित समारोह मात्र एक श्रद्धांजलि सभा नहीं, बल्कि सत्ता की दमनकारी शक्तियों के खिलाफ एक नए शंखनाद का केंद्र बन गई। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी प्रसाद यादव ने इस मंच से स्पष्ट कर दिया कि जिस तरह जननायक और लालू प्रसाद यादव ने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया, वही अडिगता अब उनके नेतृत्व में भी दिखेगी। ​शोषितों और वंचितों के हक की लड़ाई का नया अध्याय ​समारोह का उद्घाटन करते हुए तेजस्वी यादव ने बिहार की वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक स्थिति पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि आज वे लोग सत्ता में बैठे हैं जो कर्पूरी जी के जीवनकाल में उन्हें अपशब्द कहा करते थे, लेकिन अब ढोंग की राजनीति कर रहे हैं। ​ ब्लॉग की मुख्य बातें: ​ अडिग नेतृत्व: तेजस्वी यादव ने हुंकार भरते हुए कहा, "कर्पूरी जी नहीं झुके, लालू जी नहीं झुके और मैं भी नहीं झुकूँगा।" उन्होंने जोर दिया कि शोषित, वंचित और अल्पसंख्यक वर्गों के अधिकारों के लिए हर साजिश का डटकर मुकाबला किया जाएगा। ​ लोकतंत्र बनाम धनतंत्र: उन्होंने एनडीए सर...

डेटा: आधुनिक बाजार का नया आधार !

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​ सभ्यता के विकास के साथ-साथ बाजार का स्वरूप भी निरंतर बदलता रहा है। एक दौर था जब बाजार भौतिक वस्तुओं के आदान-प्रदान और उनकी उपलब्धता पर निर्भर करता था। विक्रेता के पास क्या सामान है और खरीदार की जरूरत क्या है, बस यही व्यापार का मुख्य केंद्र होता था। लेकिन आज के डिजिटल युग में, बाजार की यह परिभाषा पूरी तरह बदल चुकी है। ​ वस्तुओं से डेटा तक का सफर आज का आधुनिक बाजार अब वस्तुओं पर नहीं, बल्कि डेटा (Data) पर चलता है। हम इंटरनेट और डिजिटल माध्यमों का उपयोग करते समय अनजाने में ही अपनी जानकारी साझा करते हैं। यह डेटा हम स्वयं विभिन्न प्लेटफॉर्म्स को उपलब्ध कराते हैं, जो धीरे-धीरे हमारे व्यक्तित्व का एक डिजिटल खाका तैयार कर देता है। ​ डेटा द्वारा 'व्यवहार का मानचित्र' कंपनियाँ हमारे द्वारा साझा किए गए डेटा का विश्लेषण करके हमारी पहचान, पसंद, आदतों और व्यवहार का एक विस्तृत मानचित्र (Map) तैयार करती हैं। इस मानचित्र के माध्यम से बाजार को निम्नलिखित जानकारियाँ प्राप्त होती हैं: ​हम भविष्य में क्या खरीदने की योजना बना रहे हैं। ​हमारी वैचारिक पसंद और नापसंद क्या है। ​किन विज्ञापनों या बा...

ऊब: एक अभिशाप नहीं, सृजन का संकेत !

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  ​अक्सर हम ऊब (Boredom) को एक नकारात्मक भावना मानते हैं। जैसे ही हमारे जीवन में नीरसता आती है, हम बेचैन हो जाते हैं और उसे समय की बर्बादी या अपने स्वभाव का दोष समझने लगते हैं। लेकिन वास्तव में, मनुष्य की ऊब न तो शत्रु है और न ही उसका दोष। यह तो मन का एक अलार्म है जो हमें बताता है कि अब ठहराव को छोड़कर आगे बढ़ने का समय आ गया है। ​ऊब: नए विचारों की जन्मदात्री ​जब हम किसी एक ढर्रे पर चलते-चलते ऊब जाते हैं, तो वह इस बात का संकेत है कि अब कुछ नया सोचा जाए। इतिहास गवाह है कि दुनिया के बड़े आविष्कार और परिवर्तन तभी हुए जब किसी ने अपनी वर्तमान स्थिति से ऊबकर कुछ अलग करने की ठानी। लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण चुनाव हमारा होता है—वह 'नया' कैसा हो? ​तोड़ने में नहीं, संवारने में हो शक्ति ​समाज में परिवर्तन के दो रास्ते होते हैं: एक विध्वंस का और दूसरा सृजन का। हमारी नई सोच तोड़ने में नहीं, बल्कि संवारने में होनी चाहिए। * आविष्कार दुनिया के लिए: यदि हम कुछ नया बना रहे हैं, तो उसका उद्देश्य मानवता का कल्याण और दुनिया को बेहतर बनाना होना चाहिए। ​प्रयास रिश्तों के लिए: अक्सर हम बाहर की दुनिया को ...

2026 में भारतीय अर्थव्यवस्था: अवसर और सुधार की राह ! प्रो प्रसिद्ध कुमार, अर्थशास्त्र, विभाग।

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  ​वर्ष 2026 के लिए भारत के आर्थिक परिदृश्य सकारात्मक दिखाई दे रहे हैं। वैश्विक स्तर पर जारी अनिश्चितताओं के बावजूद, भारतीय अर्थव्यवस्था एक बेहतर स्थिति में खड़ी नजर आती है। हालाँकि, इस मज़बूत आर्थिक गति को निरंतर बनाए रखने के लिए केवल संभावनाओं पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा; इसके लिए ठोस नीतिगत सुधारों और घरेलू मोर्चे पर सक्रियता की आवश्यकता है। ​प्रमुख चुनौतियाँ और रणनीतिक लक्ष्य ​विकास की दर को स्थिर रखने के लिए निम्नलिखित क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना अनिवार्य है: ​घरेलू खपत में वृद्धि: बाहरी आर्थिक उतार-चढ़ाव से बचने के लिए देश के भीतर वस्तुओं और सेवाओं की मांग को बढ़ाना होगा। ​रोजगार सृजन: युवाओं के लिए नए अवसरों का निर्माण करना विकास की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। ​राजकोषीय अनुशासन: राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) पर नियंत्रण रखकर ही लंबी अवधि की स्थिरता प्राप्त की जा सकती है। ​नई पीढ़ी के सुधार (Next-Gen Reforms) ​सिर्फ पारंपरिक सुधारों से काम नहीं चलेगा। अब समय 'नई पीढ़ी के सुधारों' का है, जिनमें मुख्य रूप से शामिल हैं: ​जीवन में आसानी -आम नागरिक के जीवन स्तर को बेह...