"राम-राज" का नया गणित: चंदे की ईंट और तिजोरी का कंक्रीट !
अयोध्या की पावन धरा पर आजकल विकास की गंगा नहीं, 'चंदे की सुनामी' बह रही है। सुना था कि भगवान राम ने तो 'त्याग' के लिए राजपाट छोड़ा था, पर आज के "ठेकेदारों" ने उसी त्याग को 'व्यापार' के मॉडल में बदलकर पेटेंट करवा लिया है। यह गजब का 'स्वयंसेवक' धर्म है—सेवा भी अपनी और मेवा भी अपना! चंदे का चमत्कार: आस्था या एसेट मैनेजमेंट? काशी से लेकर अयोध्या तक, धर्म अब 'अनुष्ठान' नहीं, 'आईपीओ' (IPO) बन गया है। पहले लोग भगवान के दर्शन करने जाते थे, अब लोग दर्शन करने जाते हैं कि आज चंदे की कौन सी नई स्कीम लॉन्च हुई है। राम मंदिर के नाम पर जो "डकैती" का शोर सुनाई दे रहा है, वह असल में 'विकास' का ढोल है। इस ढोल में इतनी आवाज है कि न तो मजदूर के पलायन की कराह सुनाई देती है, न ही गिरती हुई अर्थव्यवस्था की चीख। बस एक ही गूँज है—"चंदा दो, पुण्य लो, और बाकी के पीछे के दरवाजे से मुनाफा गिनो!" भेष बदल के लूटा संसार भगवा लबादा ओढ़ना अब एक 'बिजनेस क्लास' का टिकट बन गया है। चम्पत राय हों या अन्य 'भक्त-प्रवर...