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​एसआईआर (SIR) की लंबी और छोटी कहानी: मतदान के अधिकार पर मंडराता खतरा।

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    ​बड़े पैमाने पर मतदाताओं का मताधिकार छिनना: हाल ही में अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज (Jean Drèze) और योगेंद्र यादव ने यह तर्क दिया है कि एसआईआर (SIR) की पूरी प्रक्रिया बड़े पैमाने पर मतदाताओं को उनके मताधिकार से वंचित  कर रही है. अनुमान है कि भारत की कुल वयस्क आबादी का लगभग 12% हिस्सा (कम से कम 12 करोड़ मतदाता) अंतिम एसआईआर सूचियों से बाहर हो सकता है.   ​बहिष्कार (Exclusion) पर आधारित प्रक्रिया: एसआईआर सूचियों को तैयार करने की प्रक्रिया का पहला चरण मूल रूप से 'बहिष्कार' पर आधारित है. इसमें पहले से तैयार सूचियों से एएसडीडी (ASDD - अनुपस्थित, स्थानांतरित, दोहराए गए या मृत) नामों को हटा दिया जाता है.   ​जनसंख्या के आंकड़ों से भारी अंतर: शुरुआती मसौदा सूचियां (Draft lists) वयस्क आबादी के अनुमानों से काफी नीचे हैं. हालांकि कुछ आलोचकों का तर्क है कि शुरुआती सूचियां समावेशी थीं और बाद में 13 करोड़ लोगों को हटाया गया, लेकिन सच्चाई यह है कि शुरुआती सूचियों में ही बड़ी संख्या में ऐसे नाम शामिल थे जो या तो डुप्लीकेट थे या मृत/ स्थानांतरित हो चुके थे, जिससे यह समस्...

भारतीय कर नीति और वैश्विक पूंजी: एलटीसीजी (LTCG) और एसटीटी (STT) पर पुनर्विचार की आवश्यकता।

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     वित्त मंत्री द्वारा लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन (LTCG) टैक्स और सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) पर बहस की शुरुआत करने का स्वागत किया गया है, हालांकि इसमें कोई तात्कालिक बदलाव की घोषणा नहीं की गई थी.   ​विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की निकासी: इस वर्ष 12 अक्टूबर तक FPIs द्वारा भारतीय इक्विटी से लगभग 1.08 लाख करोड़ रुपये की निकासी की गई है. हालांकि कर इसके एकमात्र कारण नहीं हैं, बल्कि वैश्विक ब्याज दरें, प्रतिस्पर्धा और मुद्रा मूल्यह्रास भी इसमें शामिल हैं.   ​अंतरराष्ट्रीय तुलना: ताइवान, ब्राजील और वियतनाम जैसे देश विदेशी निवेशकों को कर मामलों में अधिक अनुकूल और स्पष्ट छूट या लाभ प्रदान करते हैं, जिससे भारत को अपनी नीतियों को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने की आवश्यकता महसूस होती है.   ​मुद्रा और कर संबंधी विसंगतियां: विदेशी मुद्रा गणना और विशेष FPI व्यवस्था में सूचकांक (indexation) का लाभ न मिलना निवेशकों के लिए चिंता का विषय है, जिसे दूर करने की आवश्यकता है.   सरकार को केवल LTCG को समाप्त करने या रखने के विकल्प तक सीमित नहीं रहना चा...

अंतरराष्ट्रीय कानून का पतन और तानाशाही ताकतों का प्रभाव।

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   दक्षिण अफ्रीकी न्यायविद नवी पिल्ले (Navi Pillay) को नोबेल शांति पुरस्कार (2026) के लिए नामांकित/प्रस्तावित किया जाना अंतरराष्ट्रीय कानून की महत्ता को रेखांकित करता है। वर्तमान में शक्तिशाली और सत्तावादी देशों द्वारा अंतरराष्ट्रीय नियमों की अवहेलना की जा रही है, जिससे मानवाधिकारों और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का तेजी से क्षरण हुआ है।    अधिकारवादी/तानाशाह शासन अंतरराष्ट्रीय कानूनों और संस्थाओं को अपने हितों के अनुसार मोड़ रहे हैं या उन्हें कमजोर कर रहे हैं। इजरायल द्वारा संयुक्त राष्ट्र निकायों और अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों के निष्कर्षों की आलोचना इसका एक प्रमुख उदाहरण है। एक निष्पक्ष और न्यायसंगत अंतरराष्ट्रीय कानून व्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए नागरिक समाज, न्यायपालिका और वैश्विक समुदाय को मिलकर तानाशाही प्रवृत्तियों के खिलाफ आवाज उठाने की सख्त जरूरत है।    #InternationalLaw #HumanRights #NaviPillay #GlobalGovernance #NobelPeacePrize #InternationalJustice #Authoritarianism #UnitedNations

सऊदी अरब की चुनौतियाँ: होर्मुज और बाब अल-मंदेब में संकट।

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   सऊदी अरब वर्तमान समय में होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य (Bab al-Mandeb Strait) में बढ़ते तनाव के कारण गंभीर भू-राजनीतिक एवं आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। ऐतिहासिक रूप से सऊदी-हुथी विवाद और यमन के साथ सीमा विवाद पुराने रहे हैं। हालिया घटनाओं में हुथी विद्रोहियों ने लाल सागर तट पर कब्जा कर लिया है और सऊदी अरब के रणनीतिक एवं तेल ठिकानों को मिसाइल व ड्रोन हमलों से निशाना बनाया है।    इस स्थिति के कारण सऊदी अरब के सुरक्षा तंत्र, तेल निर्यात और क्षेत्रीय प्रभाव पर गहरा असर पड़ा है। अमेरिका और इजरायल के साथ संबंधों में आए उतार-चढ़ाव ने भी सऊदी अरब के लिए राह कठिन बना दी है। इसके अलावा, इस वैश्विक तनाव और आपूर्ति श्रृंखला में रुकावट के कारण भारत पर भी प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि खाड़ी देशों में लाखों भारतीय कार्यरत हैं तथा भारत की ऊर्जा सुरक्षा इन जलमार्गों पर निर्भर है।    #SaudiArabia #RedSeaCrisis #HormuzStrait #IranHouthiConflict #Geopolitics #MiddleEastCrisis #EnergySecurity #IndiaMiddleEast

राजनीति का गिरता स्तर और जनता दल (यूनाइटेड): सिद्धांतों से समझौते का लाचार अंजाम।

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    ​बिहार की राजनीति इन दिनों एक ऐसे दिलचस्प और चिंताजनक मोड़ पर है, जहाँ सत्ता के समीकरणों ने राजनीतिक दलों को वैचारिक रूप से पूरी तरह लाचार कर दिया है। हाल ही में एमएलसी चुनाव के दौरान जो दृश्य सामने आए, उन्होंने साफ कर दिया है कि आज के दौर में अनुशासन, पार्टी व्हिप और वैचारिक प्रतिबद्धता महज कागजी बातें बनकर रह गई हैं। जनता दल (यूनाइटेड) यानी जेडीयू के भीतर जिस तरह से पार्टी विधायकों द्वारा खुलेआम बागी तेवर अपनाए गए और जन सुराज के पक्ष में समर्थन जुटाया गया, वह किसी भी राजनीतिक दल के आंतरिक नियंत्रण की विफलता का सबसे बड़ा प्रमाण है। ​अनुशासनहीनता की हदें और सहमी हुई सियासत ​जब किसी दल के विधायक अपनी ही पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ सरेआम ताल ठोकते हैं और पार्टी का शीर्ष नेतृत्व आंखें मूंदकर बैठा रहता है, तो यह राजनीतिक लाचारी की पराकाष्ठा है। स्थिति यहाँ तक बिगड़ गई कि जेडीयू के उम्मीदवार इस राजनीतिक दहशत और अनिश्चितता के चलते सदमे में अस्पताल जा पहुँचे। आखिर यह कैसी राजनीति है? जब दलों के भीतर अनुशासन का डर खत्म हो जाता है, तो कार्यकर्ता और प्रत्याशी खुद को ठगा हु...

लोकतंत्र का महापर्व: पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की चुनावी जंग और शिक्षकों की शक्ति!-प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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    ​बिहार विधान परिषद के चुनावी गलियारों में इन दिनों सरगर्मी अपने चरम पर है। बात जब 01-पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की हो, तो यह राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए किसी महासमर से कम नहीं है। प्रमंडल के कोने-कोने से लेकर राजधानी की हर गली तक, इस चुनाव की गूंज सुनाई दे रही है। आइए जानते हैं इस चुनाव के रोमांचक पहलुओं और मतदाताओं की ताकत को! ​सबसे आगे पटना: आंकड़ों की जुबानी ​बिहार विधान परिषद के शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की चार प्रमुख सीटों पर इस बार कुल 40,253 मतदाता अपने मताधिकार का अनमोल प्रयोग करने जा रहे हैं। इसमें 30,677 पुरुष, 9,573 महिलाएं और 3 तृतीय लिंग के मतदाता शामिल हैं। ​यदि बात करें सबसे बड़े अंचल की, तो मतदाताओं की संख्या के मामले में पटना निर्वाचन क्षेत्र सभी में सबसे आगे है, जहां कुल 11,719 वोटर अपनी राजनीतिक और शैक्षणिक चेतना का परिचय देंगे। इसके बाद सारण में 10,748, दरभंगा में 9,026 और तिरहुत में 8,760 मतदाता दर्ज किए गए हैं। यानी आंकड़ों के आईने में पटना में सबसे अधिक और तिरहुत में सबसे कम शिक्षक मतदाता अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। ​प्रमंडल से लेकर फुलवा...

RSS के 101 वर्ष: बदलाव और निरंतरता के दोराहे पर.

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​राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने अपनी स्थापना के 101 वर्ष पूरे कर लिए हैं। 1925 में हिंदू समाज के सांस्कृतिक पुनरुत्थान के उद्देश्य से शुरू हुआ यह संगठन आज देश के सबसे प्रभावशाली सामाजिक-राजनीतिक संगठनों में से एक बन चुका है। वर्तमान में राजनीतिक सत्ता में प्रत्यक्ष दखल के बावजूद, इसके अतीत, वैचारिक प्राथमिकताओं और समावेशिता को लेकर बहसें आज भी प्रासंगिक हैं। ​ऐतिहासिक अंतर्विरोध और विरासत: संघ का शुरुआती इतिहास स्वतंत्रता संग्राम से दूरी और विभाजन के समय की सांप्रदायिक परिस्थितियों से जुड़ा रहा है। महात्मा गांधी की हत्या के बाद संगठन पर लगा प्रतिबंध और नाथूराम गोडसे से वैचारिक नजदीकियों ने इसके अतीत को गहरा दाग दिया है। साथ ही, एम.एस. गोलवलकर के विचारों में अल्पसंख्यक वर्गों को लेकर जो दृष्टिकोण रहा, उसने राष्ट्रवाद की परिभाषा को लेकर लगातार सवाल खड़े किए हैं। ​नरमी और बदलाव के संकेत (RSS 2.0): हाल के वर्षों में मोहन भागवत के नेतृत्व में संघ के रुख में कुछ नरम और समावेशी बदलाव देखने को मिले हैं। सार्वजनिक मंचों पर इस्लाम स्वीकार्यता, अंतरधार्मिक संवाद की पहल, और शासन-प्रशासन के रोजमर...