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संकट की ओर भारतीय अर्थव्यवस्था!

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    भारतीय अर्थव्यवस्था हाल के वर्षों में कई गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। कभी विश्व की पाँचवीं और फिर तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में अग्रसर भारत अब वैश्विक रैंकिंग में पीछे खिसकने की आशंका से घिरा हुआ है। डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी, विदेशी निवेश में कमी, बढ़ता व्यापार घाटा और वैश्विक आर्थिक अस्थिरता ने आर्थिक विकास की गति को प्रभावित किया है तेल और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ रहा है। इसका सीधा असर महँगाई और आम नागरिक की क्रय-शक्ति पर पड़ता है। दूसरी ओर, विदेशी निवेशकों द्वारा पूँजी। रुपये के लगातार अवमूल्यन से आयात महँगा हो रहा है, जिससे पेट्रोलियम, खाद्य तेल और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ रहा है। इसका सीधा असर महँगाई और आम नागरिक की क्रय-शक्ति पर पड़ता है। दूसरी ओर, विदेशी निवेशकों द्वारा पूँजी निकासी से शेयर बाजार और निवेश वातावरण भी प्रभावित हुआ है। भारत का व्यापार घाटा लगातार बढ़ रहा है क्योंकि आयात की तुलना में निर्यात अपेक्षित गति से नहीं बढ़ पा रहा है। विनिर्माण क्षेत्र, रोजगार सृजन और निजी निवेश में अपेक्षित सुधार ...

जनआंदोलनों की राजनीति और भारतीय लोकतंत्र की चुनौती!

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  भारतीय लोकतंत्र में समय-समय पर उभरने वाले जनआंदोलन केवल तत्कालीन असंतोष की अभिव्यक्ति नहीं होते, बल्कि वे राजनीतिक दलों के लिए अवसर और चुनौती दोनों प्रस्तुत करते हैं। किसानों के आंदोलन, नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) विरोधी आंदोलन तथा हाल के विभिन्न सामाजिक आंदोलनों ने यह स्पष्ट किया है कि जनता की नाराज़गी यदि व्यापक समर्थन प्राप्त कर ले, तो उसका प्रभाव सत्ता और विपक्ष दोनों की राजनीति पर पड़ता है।  किसी भी जनआंदोलन की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह कितने बड़े सामाजिक वर्ग को प्रभावित करता है और क्या वह असंतोष को संगठित राजनीतिक शक्ति में बदल पाता है। 2011 के अन्ना हज़ारे आंदोलन ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर व्यापक जनसमर्थन जुटाया, जिससे तत्कालीन सरकार की छवि प्रभावित हुई और आगे चलकर नई राजनीतिक संभावनाएँ भी बनीं। इसके विपरीत, किसान आंदोलन और सीएए विरोधी आंदोलन अपने-अपने दायरे तक अधिक सीमित रहे, इसलिए उनका राजनीतिक प्रभाव अपेक्षाक एक दशक में मजबूत संगठन, वैचारिक आधार और व्यापक सामाजिक विस्तार के कारण स्वयं को ऐसी स्थिति में स्थापित किया है, जहाँ किसी एक आंदोलन से उसकी राज...

भारत के युवाओं की बदलती आकांक्षाएँ और परिवार की नई परिभाषा!

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    भारत में परिवार और विवाह को हमेशा सामाजिक जीवन का आधार माना गया है, लेकिन आज के युवा इन परंपरागत मूल्यों को नए दृष्टिकोण से देख रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) के डेमोग्राफिक फ्यूचर्स सर्वे के अनुसार, अधिकांश युवा परिवार बनाना चाहते हैं, परंतु वे इसके लिए अनुकूल आर्थिक, सामाजिक और व्यक्तिगत परिस्थितियों की भी अपनी स्वतंत्र पसंद का विषय मानते हैं। महँगाई, रोजगार की अनिश्चितता, आवास की समस्या और आर्थिक सुरक्षा की कमी उन्हें विवाह और संतानोत्पत्ति के निर्णय में सावधान बनाती है। विशेष रूप से महिलाओं पर घर और कार्यस्थल दोनों की अपेक्षा रखते हैं। सर्वेक्षण से स्पष्ट होता है कि युवा कम बच्चे चाहते हैं और परिवार नियोजन को अपनी स्वतंत्र पसंद का विषय मानते हैं। महँगाई, रोजगार की अनिश्चितता, आवास की समस्या और आर्थिक सुरक्षा की कमी उन्हें विवाह और संतानोत्पत्ति के निर्णय में सावधान बनाती है। विशेष रूप से महिलाओं पर घर और कार्यस्थल दोनों की जिम्मेदारियों का असमान बोझ उन्हें परिवार और करियर के बीच कठिन चुनाव करने के लिए विवश करता है। युवाओं की चिंताओं में जलवायु परिवर्तन, ...

वैश्विक शिक्षा हब बनने की राह में भारत: सस्ती पढ़ाई, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय छात्रों का अभाव।

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  दिल्ली दुनिया का सबसे सस्ता छात्र शहर !  क्वाक्वेरेली साइमंड्स (QS) बेस्ट स्टूडेंट सिटीज 2027 की नवीनतम रैंकिंग में भारतीय उच्च शिक्षा परिदृश्य की मजबूतियों और चुनौतियों का एक स्पष्ट खाका सामने आया है। एक तरफ जहाँ भारत के प्रमुख शहर वैश्विक स्तर पर पढ़ाई के लिहाज से बेहद किफायती और रोजगार योग्य स्नातकों के निर्माण में आगे हैं, वहीं अंतर्राष्ट्रीय छात्रों को आकर्षित करने के मामले में स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। QS रैंकिंग के अनुसार, दिल्ली को दुनिया में छात्रों के लिए सबसे किफायती (Affordable) शहर चुना गया है, जहाँ अंतर्राष्ट्रीय छात्रों के लिए औसत शिक्षण शुल्क लगभग $2,700 प्रति वर्ष है। समग्र रैंकिंग में दिल्ली 5 पायदान की छलांग लगाकर 99वें स्थान पर पहुँच गई है। अन्य भारतीय शहरों में: मुंबई: भारत का सबसे शीर्ष स्थान प्राप्त शहर बनकर उभरा है, जो 7 पायदान चढ़कर 91वें स्थान पर पहुँच गया है (किफायती मामले में 12वाँ स्थान)। बेंगलुरु: 6 पायदान फिसलकर संयुक्त रूप से 114वें स्थान पर आ गया है। यहाँ औसत अंतर्राष्ट्रीय शिक्षण शुल्क लगभग $5,400 प्रति वर्ष (चारों शहरों में सबसे अधिक) दर्...

विवेकपूर्ण ढंग से भूलना कैसे याद रखें?

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    डिजिटल युग में जहां हर जानकारी हमेशा के लिए इंटरनेट पर दर्ज हो जाती है, व्यक्ति के सम्मान और निजता की रक्षा करना एक बड़ी चुनौती बन गया है। इस दिशा में दिल्ली उच्च न्यायालय ने भारत में 'भूल जाने का अधिकार' (Right to be Forgotten) के न्यायशास्त्र को आकार देते हुए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए निजता के अधिकार से निकलता है। अदालत के इस फैसले का मुख्य उद्देश्य न्यायिक रिकॉर्ड को डी-इंडेक्स करना और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध अदालती दस्तावेजों से व्यक्तिगत पहचान को छिपाना  है। इंटरनेट पर डिजिटल रिकॉर्ड की स्थायी उपलब्धता किसी भी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को जीवनभर के लिए नुकसान पहुंचा सकती है, भले ही वह मामला सुलझ गया हो या वह बरी हो चुका हो। हालांकि, यह अधिकार असीमित या निरपेक्ष  नहीं है: अपवाद: महिलाओं या बच्चों के खिलाफ हुए अपराधों, जन-विश्वास के उल्लंघन या उन मामलों में यह राहत नहीं मिलेगी जहाँ सार्वजनिक हित व्यक्तिगत निजता से अधिक महत्वपूर्ण हो। इतिहास से छेड़छाड़ नहीं: यह अधिकार इतिहास को फिर से लिखने...

क्रांति का शंखनाद! ( कविता) -प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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    सवाल पूछो तो मौन साधते, उत्तर कोई पास नहीं,  परीक्षा की जो ट्रिक सिखाते, उन पर अब विश्वास नहीं।  प्रश्नपत्र लीक होने पर जो चुप्पी साध कर बैठे हैं,  मन की बात सुनाने वाले, सच से आँखें ऐंठे हैं। अंधभक्ति के इस दलदल में, कैसा हश्र दिखाया है,  जाहिल को नेता मानकर, खुद का भविष्य गँवाया है।  अपने ही हाथों से तुमने, बच्चों के सपने रौंदे,  कुर्सी के सौदागर बैठे, करने को काले सौदे। नासमझी की भारी कीमत, जंतर-मंतर चुका रहा,  लाठियां खाकर लहूलुहान, आज नौनिहाल हो रहा।कल तक जो मसरूफ रहे थे, जाति-धरम के झगड़ों में,  आज लगी है आग वही, खुद के घर के ही आँगनों में। पर धन्य भाग्य इन युवाओं का, जिसने आज अंगड़ाई ली,  काँप उठी दिल्ली की गद्दी, पूरे भारत ने गवाही दी।हिल गई है चूल हुकूमत की, संसद छोड़ वो भाग रहे,  बहुत बनाया मूर्ख हमें, अब सोते हुए सब जाग रहे। प्रश्न उठाने वाले को, जो देशद्रोही बतलाते थे,  जनता की गाढ़ी कमाई पर, जो ऐश सदा उड़ाते थे।  अब खैर नहीं है अत्याचारी, सब्र का बाँध ये टूटा है, युवा शक्ति का महाप्रलय, अब तेरे विनाश ...

बेशर्म सरकार! लोकतंत्र पर प्रहार: हक मांगते युवाओं पर लाठियां और तानाशाही का उदय! - प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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    बहुत ही भारी मन से, मर्माहत होकर इस पोस्ट को लिख रहा हूँ। इसे पढ़कर आपको अगर पीड़ा नहीं होता है तो फिर क्या कहें!..  लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का मौलिक अधिकार है, लेकिन वर्तमान परिदृश्य में सरकार संवाद के बजाय दमन का रास्ता चुन रही है। नीट (NEET) जैसी प्रतिष्ठित परीक्षाओं में लगातार होते पेपर लीक ने देश के करोड़ों युवाओं के भविष्य को अधर में लटका दिया है। जब यही पीड़ित युवा अपने अधिकारों की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर लोकतांत्रिक तरीके से इकट्ठा हुए, तो सरकार ने उनसे बात करने के बजाय पुलिसिया बर्बरता का सहारा लिया। शांत मन से अपनी बात कह रहे छात्रों पर लाठियां बरसाना और आंसू गैस के गोले छोड़ना बेहद निंदनीय और शर्मनाक है। यह कार्रवाई स्पष्ट करती है कि सत्ता अब जनसरोकारों के प्रति पूरी तरह असंवेदनशील हो चुकी है। संवाद का अंत और लाठीशाही का राज किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र की पहली शर्त होती है—जनता और सरकार के बीच निरंतर संवाद। शिक्षा मंत्री से जवाब मांगने आए छात्रों को अपराधियों की तरह खदेड़ना इस बात का प्रमाण है कि सरकार अपनी कमियों ...