वास्तविक स्वतंत्रता: मानवता की ओर बढ़ते कदम !
आज के दौर में 'स्वतंत्रता' शब्द को अक्सर केवल नागरिक अधिकारों या भौतिक बंधनों के अभाव तक सीमित कर दिया जाता है। वास्तविक स्वतंत्रता बाहरी दुनिया से नहीं, बल्कि भीतरी विकारों से मुक्ति का नाम है। भीतरी बेड़ियों से मुक्ति एक मनुष्य तब तक पूर्णतः स्वतंत्र नहीं हो सकता, जब तक वह अज्ञान, भय, अहंकार और स्वार्थ के अधीन है। अज्ञान हमें संकुचित सोच में बांधे रखता है। भय हमें जोखिम लेने और सत्य बोलने से रोकता है। अहंकार हमारे और समाज के बीच एक दीवार खड़ी कर देता है। स्वार्थ हमें केवल 'स्व' (स्वयं) तक सीमित कर देता है। जब हम इन बेड़ियों को तोड़ते हैं, तभी हमें आत्मबोध होता है—अर्थात् स्वयं की शक्तियों और अस्तित्व के वास्तविक कारण का ज्ञान। 'स्व' से 'सर्व' की ओर समाज की प्रगति तभी संभव है जब व्यक्ति "स्वयं के लिए जीना" छोड़कर "मानवता के लिए जीना" सीख ले। इतिहास गवाह है कि समाज में सकारात्मक बदलाव वही लोग ला पाए हैं जिन्होंने अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरों के दुखों को अपना समझा है। ऐसी स्वतंत्रता व्यक्ति को उदार बनाती है। यह उसे यह समझने की दृष्टि ...