शिक्षा की पूर्णता: ज्ञान, दर्शन और अनुभव का संगम !
आज के आधुनिक युग में शिक्षा को अक्सर केवल डिग्रियों और रोजगार पाने के साधन के रूप में देखा जाता है। लेकिन वास्तव में, शिक्षा एक बहुआयामी प्रक्रिया है। ज्ञान, दर्शन और अनुभव —इन तीनों का संतुलन ही शिक्षा को उसकी पूर्णता प्रदान करता है। यदि इनमें से एक भी पक्ष कमजोर पड़ जाए, तो शिक्षा का उद्देश्य अधूरा रह जाता है। शिक्षा के तीन स्तंभ 1. विज्ञान और ज्ञान: यांत्रिकता का खतरा विज्ञान हमें तथ्य, तर्क और तकनीकी कौशल देता है। यह अनिवार्य है, लेकिन यदि शिक्षा केवल 'विज्ञान' या तकनीकी ज्ञान तक सीमित रह जाए, तो वह मनुष्य को केवल एक उपयोगी साधन (Machine) बना देती है। ऐसी शिक्षा में दक्षता तो होती है, पर संवेदनशीलता और मानवीय मूल्यों का अभाव हो जाता है। मनुष्य केवल उत्पादन की एक इकाई बनकर रह जाता है। 2. दर्शन: अमूर्तता और व्यवहार का संतुलन दर्शन हमें 'क्यों' और 'कैसे' के गहरे अर्थ समझाता है। यह जीवन के उद्देश्यों को स्पष्ट करता है। परंतु, यदि शिक्षा केवल दर्शन पर आधारित हो और उसका जमीन से जुड़ाव न हो, तो वह 'अमूर्त' (Abstract) हो जाती है। ऐसी शिक्षा विचारो...