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खगौल के सांस्कृतिक क्षितिज पर नई चमक: नगर परिषद की पहल से संवर रहा 'कला मंच'!

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    ​खगौल। महान गणितज्ञ आर्यभट्ट की ऐतिहासिक भूमि 'खगौल' अपनी सांस्कृतिक विरासत को नया आयाम देने के लिए तैयार है। नगर परिषद, खगौल के अध्यक्ष श्री सुजीत कुमार की दूरदर्शिता से बड़ी खगौल स्थित देवी स्थान परिसर में कला मंच, ड्रेसिंग रूम और शेड का निर्माण कार्य अंतिम चरण में है। ​सांस्कृतिक चेतना को समर्पित पहल नगर परिषद के अध्यक्ष सुजीत कुमार के नेतृत्व में षष्ठम वित्त योजना (योजना सं. 04/2024-25) के तहत ₹21.67 लाख की लागत से इस परियोजना को धरातल पर उतारा गया है। बजट सत्र 2025-26 के व्यापक विकास लक्ष्यों के बीच, यह कला मंच कलाकारों के प्रति परिषद के सम्मान का प्रतीक है। ​गुणवत्ता का निरीक्षण   अध्यक्ष सुजीत कुमार ने रंगकर्मी नवाब आलम,  अरुण सिंह पिंटू और शोएब कुरैशी के साथ निर्माण स्थल का भ्रमण किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि निर्माण की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं होगा। इस दौरान रंगकर्मियों ने हर्ष व्यक्त करते हुए कहा कि नए साल में यह मंच स्थानीय प्रतिभाओं के लिए एक अनमोल उपहार साबित होगा। ​सर्वांगीण विकास का संकल्प अध्यक्ष सुजीत कुमार ने कहा, "खगौल की माटी ने हमेशा प्रतिभ...

नशा: सामाजिक पतन का मूक हथियार और मनोवैज्ञानिक त्रासदी !

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  आज के वैश्विक परिदृश्य में नशा केवल एक व्यक्तिगत बुराई नहीं रह गया है, बल्कि यह एक रणनीतिक और सामाजिक संकट बन चुका है। नशीले पदार्थों का उपयोग किसी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को ध्वस्त करने और समाज में बिखराव पैदा करने के लिए एक 'हथियार' के रूप में किया जा सकता है। लेकिन इसके पीछे छिपी मनोवैज्ञानिक तबाही इससे भी कहीं अधिक गहरी है। 1. परिवारों का विघटन: एक मौन महामारी जब घर का एक सदस्य नशे की गिरफ्त में आता है, तो पूरा परिवार 'सह-निर्भरता' के चक्र में फंस जाता है। आर्थिक असुरक्षा: घर की जमा-पूंजी नशे की भेंट चढ़ जाती है, जिससे बच्चों की शिक्षा और बुनियादी जरूरतें प्रभावित होती हैं। घरेलू हिंसा: मनोवैज्ञानिक रूप से, नशा व्यक्ति के नियंत्रण केंद्र को प्रभावित करता है, जिससे वह हिंसक और चिड़चिड़ा हो जाता है। इसका सीधा परिणाम घर की महिलाओं और बच्चों पर मानसिक एवं शारीरिक प्रताड़ना के रूप में निकलता है। 2. मानसिक स्वास्थ्य और नशे का दुष्चक्र नशा और मानसिक रोग एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं। लोग अक्सर तनाव, अवसाद या अकेलेपन से बचने के लिए नशे का सहारा लेते हैं, जिसे मनोविज्ञान में...

नफरत का बढ़ता दौर: क्या कानून और नैतिकता अपनी राह भटक गए हैं?

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  आज के दौर में समाज जिस मोड़ पर खड़ा है, वहां 'सहिष्णुता' शब्द कहीं खोता नजर आ रहा है। नफरत केवल व्यक्तिगत रंजिश तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह सार्वजनिक भाषणों, राजनीतिक मंचों और नस्लीय भेदभाव के रूप में हमारे लोकतंत्र की जड़ों को खोखला कर रही है। हालिया रिपोर्ट्स और घटनाएं इस बात की गवाही देती हैं कि नफरत अब एक संगठित स्वरूप ले चुकी है। सत्ता के गलियारों में नफरती बोल एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स  की साल 2023 की रिपोर्ट एक भयावह तस्वीर पेश करती है। इस रिपोर्ट के अनुसार, देश के कुल 107 सांसदों और विधायकों पर 'घृणास्पद भाषण' के मामले दर्ज थे। इनमें से 33 सांसद ऐसे थे जिन्होंने स्वयं अपने चुनावी हलफनामे में इन मामलों की घोषणा की थी। राजनीतिक विवरण: नफरती भाषणों के मामले में भाजपा के 22 सांसद और 20 विधायक सबसे ऊपर थे, जबकि कांग्रेस, आप, सपा और अन्य क्षेत्रीय दलों के प्रतिनिधियों पर भी ऐसे मामले दर्ज पाए गए। क्षेत्रीय स्थिति: उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में जनप्रतिनिधियों पर सबसे अधिक मामले दर्ज होना यह दर्शाता है कि राजनीति में 'ध्रुवीकरण' का हथियार किस कद...

​AI के युग में मस्तिष्क को समझने की होड़: मनोविज्ञान में बढ़ते करियर विकल्प !

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    ​आज के दौर में जहाँ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) हमारे काम करने के तरीके को बदल रहा है, वहीं यह हमारे व्यवहार, भावनाओं और रिश्तों को भी गहराई से प्रभावित कर रहा है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, AI के इस बढ़ते प्रभाव ने मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में नई चुनौतियाँ पैदा की हैं, जिसके कारण भारतीय छात्रों के बीच मनोविज्ञान (Psychology) और इससे जुड़े विषयों की मांग में अभूतपूर्व उछाल आया है। ​विदेशी पाठ्यक्रमों के प्रति बढ़ता रुझान ​भारतीय छात्र अब मनोविज्ञान को केवल एक 'सॉफ्ट सोशल साइंस' के रूप में नहीं, बल्कि एक भविष्योन्मुखी और तकनीकी रूप से समृद्ध क्षेत्र के रूप में देख रहे हैं। विदेशी विश्वविद्यालयों की ओर छात्रों के आकर्षण के पीछे कुछ मुख्य कारण हैं: ​आसान लाइसेंसिंग प्रक्रिया: विदेशों में प्रैक्टिस के लिए लाइसेंस प्राप्त करने के मार्ग अधिक स्पष्ट और सुलभ हैं। ​गहन शोध के अवसर: वहां शोध के लिए बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और एक्सपोजर उपलब्ध है। ​तकनीक का समावेश: आधुनिक पाठ्यक्रमों में डेटा, टेक्नोलॉजी और एप्लाइड ट्रेनिंग का गहरा समन्वय है, जो छात्रों को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैय...

​जमीन की जालसाजी: जब 'पैसे' की ताकत छीनती है अपनों का हक !

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    ​आज के दौर में जमीन केवल संपत्ति का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि किसी परिवार की जीवन भर की जमा-पूंजी और मान-सम्मान का प्रतीक होती है। लेकिन दुर्भाग्यवश, समाज में कुछ ऐसे भू-माफिया और जालसाज सक्रिय हैं जो चंद रुपयों और रसूख के दम पर किसी भी जमीन के फर्जी कागजात तैयार कर लेते हैं। यह "फर्जी कागजों का खेल" न केवल असली हकदार को मानसिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित करता है, बल्कि पूरी व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाता है। ​1. फर्जीवाड़े का जाल और असली मालिक की पीड़ा ​अक्सर देखा जाता है कि रसूखदार लोग अंचलाधिकारी कार्यालय और अन्य राजस्व विभागों में अपनी 'पहुंच' और 'पैसे' का इस्तेमाल कर कागजों में हेरफेर करवा देते हैं। इसके बाद शुरू होता है असली मालिक का संघर्ष—अदालतों के चक्कर, पुलिस थानों की दौड़ और अपनी ही जमीन पर खुद को साबित करने की बेबसी। यह एक ऐसा अपराध है जो एक इंसान को सड़क पर लाने की ताकत रखता है। ​2. सरकार का कड़ा संदेश: "अब नहीं चलेगा खेल" बिहार के उपमुख्यमंत्री सह राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने स्पष्ट कर दिया है कि भूमि संबंधी मामलों...

कागजों पर विकास और नलों में ज़हर: व्यवस्था की संवेदनहीनता का दस्तावेज़ !

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    ​हाल ही में सामने आई रिपोर्ट ने 'सिस्टम' के उस भयावह चेहरे को उजागर किया है, जहाँ सरकारी दावों और धरातल की हकीकत के बीच करोड़ों रुपयों का फासला है। भोपाल नगर निगम द्वारा 2018 में सुप्रीम कोर्ट में दिए गए हलफनामे और वर्तमान जमीनी स्थिति के बीच का अंतर केवल वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि डेढ़ लाख लोगों के जीवन के साथ किया जा रहा एक आपराधिक खिलवाड़ है। ​हलफनामों का झूठ और भ्रष्टाचार की दुर्गंध ​नगर निगम ने सर्वोच्च न्यायालय को सूचित किया था कि यूनियन कार्बाइड क्षेत्र के आस-पास के मोहल्लों में 145 करोड़ रुपये पानी और सीवेज लाइन पर खर्च किए गए हैं। लेकिन हकीकत यह है कि मात्र 50 करोड़ रुपये ही खर्च हुए और वह भी इस तरह कि पीने के पानी की पाइपलाइनें खुली नालियों और सीवेज के बीच से गुजर रही हैं। शेष 95 करोड़ रुपये का सीवेज प्रोजेक्ट आज भी फाइलों की धूल फांक रहा है। यह सीधे तौर पर अदालत की अवमानना और जनता के विश्वास के साथ विश्वासघात है। ​नरक के मुहाने पर खड़ी आबादी ​शिव शक्ति नगर, ब्लू मून कॉलोनी और गरीब नगर जैसी 42 बस्तियों की स्थिति हृदयविदारक है। ​दूषित पेयजल: लोग वह पानी पीने को ...

नारी अस्मिता का सौदागर: सत्ता के नशे में चूर 'कठपुतली' मानसिकता !😢😢

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    ​इक्कीसवीं सदी के भारत में, जहाँ हम 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' और महिला सशक्तिकरण के बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं, वहीं अल्मोड़ा के सोमेश्वर से सामने आया गिरधारी लाल साहू का कथित बयान आधुनिक समाज के माथे पर कलंक की तरह है। एक सार्वजनिक मंच से यह कहना कि "बिहार में 20–25 हजार रुपये में लड़कियां मिल जाती हैं," न केवल बिहार की बेटियों का अपमान है, बल्कि यह उस सामंती और घृणित सोच का प्रमाण है जो आज भी महिलाओं को इंसान नहीं, बल्कि बाजार में बिकने वाली 'वस्तु' समझती है। ​उपभोक्तावाद की भेंट चढ़ती संवेदनाएं ​साहू का यह बयान कि वह "कुंवारों के लिए बिहार से लड़कियां लेकर आएंगे," सीधे तौर पर मानव तस्करी (Human Trafficking) जैसी जघन्य अपराधों को सामान्य बनाने की कोशिश है। जब एक जिम्मेदार पद पर बैठा व्यक्ति बेटियों की तुलना चंद रुपयों से करता है, तो वह अपराधियों को मूक सहमति दे रहा होता है। क्या एक राज्य की अस्मिता इतनी सस्ती है कि उसे रुपयों के तराजू पर तोला जाए? यह बिहार की महान भूमि और वहाँ की गौरवशाली महिलाओं के साथ एक भद्दा मजाक है। ​'चाल, चरित्र और चेहरा...