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​लघु व्यवसायों का सुदृढ़ीकरण: आर्थिक एवं प्रशासनिक सुधार !

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   ​ सूक्ष्म और लघु उद्यमों (MSEs) के पारिस्थितिकी तंत्र को सरल बनाने और उनके आर्थिक योगदान को बढ़ाने के लिए प्रमुख रणनीतियों का विवरण ।- ​1. प्रशासनिक सरलीकरण और एकल खिड़की प्रणाली (Single Window System) ​छोटे स्तर के व्यवसायों के पंजीकरण और अन्य वैधानिक प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने के लिए 'एकल खिड़की प्रणाली' का कार्यान्वयन अनिवार्य है। यह तंत्र व्यवसाय करने की लागत को कम करता है और उद्यमियों को एक ही स्थान पर सभी आवश्यक अनुमोदन प्रदान कर 'इज ऑफ डूइंग बिजनेस' को बढ़ावा देता है। ​2. डिजिटल परिवर्तन और ई-गवर्नेंस  ​व्यापारिक प्रक्रियाओं का डिजिटलीकरण और ई-गवर्नेंस को अपनाना आधुनिक अर्थव्यवस्था की मांग है। इससे न केवल पारदर्शिता बढ़ती है, बल्कि बिचौलियों की भूमिका समाप्त होती है। ऑनलाइन सेवाओं की उपलब्धता से दूर-दराज के क्षेत्रों के छोटे व्यवसायी भी मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से जुड़ सकते हैं। ​3. विनियामक ढांचा  ​व्यापारिक नियमों और विनियमों में स्पष्टता और सरलता 'अनुपालन बोझ' को कम करती है। जटिल कानूनी प्रक्रियाओं के स्थान पर स्पष्ट नीतिगत दिशा-निर्देश लघु उद्य...

भीषण ठंड में सिस्टम 'फ्रीज': मैनपुर अंडा पंचायत में PM किसान रजिस्ट्रेशन ठप, घंटों लाइन में लगकर मायूस लौटे बुजुर्ग किसान !

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    ​फुलवारी शरीफ (पटना): एक तरफ प्रकृति का कहर और दूसरी तरफ सिस्टम की बेरुखी—इन दोनों के बीच पिसा जा रहा है देश का अन्नदाता। फुलवारी प्रखंड के मैनपुर अंडा पंचायत में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना (PM Kisan) के लिए आयोजित कैंप बदइंतजामी की भेंट चढ़ गया। आलम यह रहा कि सुबह 10 बजे से कड़ाके की ठंड में कांपते हुए कतारों में खड़े सैकड़ों किसानों को अंत में निराशा ही हाथ लगी। ​सर्वर ने बढ़ाई मुसीबत, दो दिन में मात्र 15 रजिस्ट्रेशन ​कैंप में आए किसानों की भीड़ के सामने तकनीक पूरी तरह फेल नजर आई। शनिवार को सुबह से ही किसान अपनी बारी का इंतजार करते रहे, लेकिन सर्वर डाउन होने के कारण दिनभर में मात्र 8 किसानों का ही रजिस्ट्रेशन हो सका। स्थानीय लोगों के अनुसार, पिछले दिन भी स्थिति ऐसी ही थी और महज 7 किसानों का काम हो पाया था। ​ठिठुरते बुजुर्ग और प्रशासन की लाचारी ​भीषण ठंड के बावजूद मैनपुरा के वयोवृद्ध किसान दिनेश सिंह और विजेंदर सिंह हाथ में लाठी लिए थरथराते हुए अपनी बारी का इंतजार करते दिखे। उनके साथ ही बाबूचक के कुलेश्वर राय, ललन गोप, मंझौली के समेश्वर शर्मा, खड़कचक के विजय शर्मा ...

बाजारवाद की भेंट चढ़ते मानवीय संबंध !

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  ​आज के दौर में परिवर्तन ही एकमात्र स्थिर सत्य है। जैसा कि कहा जाता है, "बदलाव यदि सकारात्मक और मानवीय हो, तो इससे अच्छा क्या हो सकता है।" लेकिन समकालीन समाज में हम जिस बदलाव के साक्षी बन रहे हैं, वह अक्सर मानवीय संवेदनाओं से प्रेरित न होकर 'बाजारवाद'  से संचालित है। ​बाजार का मनोवैज्ञानिक दबाव ​मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो बाजारवाद ने मनुष्य को केवल एक 'उपभोक्ता' बना दिया है। जब यही मानसिकता मानवीय रिश्तों में प्रवेश करती है, तो हम रिश्तों को भी 'उपयोगिता'  के चश्मे से देखने लगते हैं। ​परिणाम: जिस तरह हम पुरानी वस्तुओं को बदलकर नई वस्तुएं लेने के आदी हो गए हैं, वही अधीरता अब हमारे सामाजिक और निजी संबंधों में भी दिखाई देने लगी है। ​विवाह संस्था और अनिश्चितता  विवाह, जो कभी स्थायित्व और सुरक्षा का प्रतीक था, आज एक जटिल पहेली बन गया है। ​उलझन: व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच फंसे आधुनिक इंसान के लिए यह तय करना कठिन हो गया है कि रिश्ता कब तक टिकेगा। ​असुरक्षा: भविष्य की अनिश्चितता रिश्तों में वह 'गहराई' और 'ठहराव' नहीं...

बढ़ता प्रदूषण: हमारे स्वास्थ्य और भविष्य पर गहराता संकट !

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    ​आज के दौर में विकास की अंधी दौड़ ने हमें एक ऐसे मुकाम पर खड़ा कर दिया है, जहाँ खुली हवा में सांस लेना भी दूभर हो गया है। हालिया शोध और सर्वेक्षणों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि प्रदूषण अब केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि एक गंभीर 'मेडिकल इमरजेंसी' बन चुका है। ​स्वास्थ्य पर बहुआयामी प्रहार ​प्रदूषण का असर अब केवल फेफड़ों तक सीमित नहीं है। चित्र में दिए गए तथ्यों के अनुसार, इसके प्रभाव अत्यंत चिंताजनक हैं: ​श्वसन और हृदय रोग: हवा में मौजूद सूक्ष्म कण न केवल सांस लेने में दिक्कत पैदा कर रहे हैं, बल्कि हृदय संबंधी बीमारियों और गंभीर एलर्जी का कारण भी बन रहे हैं। ​मस्तिष्क पर प्रभाव: चौंकाने वाली बात यह है कि लोग अब प्रदूषण के कारण अल्जाइमर और पार्किंसन जैसी न्यूरोलॉजिकल बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। ​कमजोर होती रोग प्रतिरोधक क्षमता: प्रदूषण ने इंसानी शरीर की इम्यूनिटी (रोग प्रतिरोधक क्षमता) को इस कदर घटा दिया है कि अब सामान्य एंटीबायोटिक दवाएं भी शरीर पर असर करना कम कर रही हैं। यह स्थिति भविष्य में किसी भी महामारी को और अधिक घातक बना सकती है। ​प्रकृति का बिगड़ता संतुलन ​प्रद...

​शिक्षा: केवल जीविका नहीं, जीवन का आधार !-प्रो प्रसिद्ध कुमार ।

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    ​आज के दौर में अक्सर शिक्षा को केवल डिग्रियों और अच्छी नौकरी पाने के माध्यम के रूप में देखा जाता है। लेकिन जैसा कि भारतीय दर्शन हमें सिखाता है, शिक्षा का असली उद्देश्य इससे कहीं अधिक व्यापक और गहरा है। शिक्षा केवल मस्तिष्क का विकास नहीं, बल्कि आत्मा का परिष्कार है। ​1. विद्या, ज्ञान और प्रज्ञा का संगम ​भारतीय दर्शन के अनुसार, शिक्षा प्रणाली के चार मुख्य स्तंभ हैं—विद्या, ज्ञान, मेधा (बुद्धि) और प्रज्ञा। इनका वास्तविक उद्देश्य एक ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण करना है जो न केवल बौद्धिक रूप से सक्षम हो, बल्कि नैतिक कसौटी पर भी पूरी तरह खरा उतरे। जब ज्ञान के साथ नैतिकता का समावेश होता है, तभी वह 'सार्थक शिक्षा' कहलाती है। ​2. भौतिक सुख से परे: 'सत्, चित्, आनंद' ​शिक्षा का अर्थ केवल धनार्जन या सुख-सुविधाओं का संग्रह करना नहीं है। यदि हम केवल भौतिकवाद की दौड़ में शामिल हैं, तो हम शिक्षा के उच्चतम लक्ष्य से दूर हैं। एक आदर्श शिक्षा वह है जो हमें: ​सत् (सत्य): जीवन की सच्चाई और नैतिकता से परिचित कराए। ​चित् (चेतना): हमारी जागरूकता और सोच को विस्तार दे। ​आनंद: हमें आंतरिक शांति ...

भारत में 'मुफ्त उपहार' बनाम लोक कल्याण: एक आर्थिक विश्लेषण ! प्रो प्रसिद्ध कुमार, अर्थशास्त्र ,विभाग।

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    ​ अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन का प्रसिद्ध सिद्धांत "There’s No Such Thing As A Free Lunch" (दुनिया में कुछ भी मुफ्त नहीं मिलता) आज के भारतीय आर्थिक परिदृश्य में अत्यंत प्रासंगिक है। जब हम भारत में बिजली, पानी, बस यात्रा या अनाज को 'मुफ्त' मिलते हुए देखते हैं, तो अर्थशास्त्र की दृष्टि में वह 'मुफ्त' नहीं होता, बल्कि उसका भार कहीं और स्थानांतरित हो रहा होता है। ​1. अवसर लागत  का सिद्धांत ​भारत के संदर्भ में, यदि सरकार ₹10,000 करोड़ की राशि मुफ्त बिजली पर खर्च करती है, तो उसकी अवसर लागत वह स्कूल या अस्पताल है जो उस पैसे से बनाया जा सकता था। अर्थशास्त्र के अनुसार, संसाधनों का चयन ही सबसे बड़ी चुनौती है। ​2. वित्तीय घाटा और करदाता पर बोझ  ​सरकार के पास अपना कोई पैसा नहीं होता; वह या तो करदाताओं  से वसूला गया धन होता है या उधार लिया गया पैसा। ​प्रत्यक्ष प्रभाव: जब सब्सिडी बढ़ती है, तो सरकार का वित्तीय घाटा बढ़ता है। ​अप्रत्यक्ष प्रभाव: इस घाटे को भरने के लिए सरकार अधिक नोट छापती है या बाजार से कर्ज लेती है, जिससे मुद्रास्फीति (Inflation) बढ़ती है। अंततः, गरीब व...

उपभोक्तावाद का मायाजाल: व्यक्ति से वस्तु बनने की प्रक्रिया !

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    ​आज के दौर में बाजार केवल सामान खरीदने-बेचने का स्थान नहीं रह गया है, बल्कि यह एक ऐसी एकाधिकारवादी (Monopolistic) शक्ति बन चुका है जो मानवीय चेतना को नियंत्रित कर रही है। बाजार किस प्रकार एक व्यक्ति की मौलिकता को समाप्त कर उसे मात्र एक 'उपभोक्ता' की सांख्यिकीय इकाई में बदल देता है। ​बाजारवाद का मनोवैज्ञानिक एकाधिकार ​बाजारवाद का सबसे घातक पहलू 'प्रदर्शनकारी उपभोग' है। "हम दूसरों की तरह दिखना चाहते हैं।" बाजार हमारी हीनभावना का लाभ उठाता है और हमें यह विश्वास दिलाता है कि हमारी सामाजिक प्रतिष्ठा उन वस्तुओं से तय होती है जिन्हें हम खरीदते हैं। यह 'भेड़चाल' बाजार के एकाधिकार को और मजबूत करती है क्योंकि यहाँ व्यक्ति अपनी आवश्यकता से नहीं, बल्कि बाजार द्वारा निर्मित 'कृत्रिम मांग'  प्रेरित होता है। ​व्यक्ति बनाम उपभोक्ता: एक आर्थिक रूपांतरण ​आर्थिक शब्दावली में कहें तो बाजार 'उपभोक्ता संप्रभुता' का भ्रम पैदा करता है, जबकि असल में वह 'उपभोक्ता अधिशेष' को सोखने का काम करता है। ​समान धरातल का भ्रम: बाजार सबको एक समान धरातल पर लाने का...