खाद्य सुरक्षा: जन-स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था की दहलीज पर संकट !
आज के दौर में 'शुद्धता' एक दुर्लभ शब्द बन गई है। जिस भोजन को हम जीवनशक्ति का आधार मानते हैं, वही आज बीमारियों का घर बनता जा रहा है। खाद्य पदार्थों में मिलावट केवल एक स्वास्थ्य समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्र की साख और उसकी आर्थिक नींव पर भी एक बड़ा प्रहार है। स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था का अंतर्संबंध: जब खाद्य पदार्थों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होती, तो सार्वजनिक स्वास्थ्य का स्तर गिरता है। एक बीमार कार्यबल देश की उत्पादकता को कम करता है। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय बाजार में 'मेड इन इंडिया' खाद्य उत्पादों की विश्वसनीयता कम होने से निर्यात और अंततः अर्थव्यवस्था पर गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। त्रिपक्षीय जिम्मेदारी (सरकार, उद्योग और नागरिक): यह लड़ाई अकेले नहीं जीती जा सकती: सरकार: कानून सख्त हों और उनका पालन 'कागजों' के बजाय धरातल पर हो। उद्योग: केवल मुनाफे की अंधी दौड़ के बजाय नैतिक व्यापार को प्राथमिकता दी जाए। नागरिक: एक जागरूक उपभोक्ता ही बाजार को सुधरने पर मजबूर कर सकता है। जांच और न्याय प्रक्रिया में सुधार: अक्सर मिलावटखोर इसलिए नहीं डरते क्योंकि जांच की...