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सूचना, सजगता और लोकतांत्रिक चेतना।

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  हर सूचना पर बिना सोचे-समझे तुरंत विश्वास कर लेना जितना खतरनाक है, उतना ही जोखिमपूर्ण किसी बात को बिना ठोस कारण अनदेखा कर देना भी है। एक परिपक्व और सजग लोकतांत्रिक समाज की पहचान यही है कि वहां के नागरिक अंधभक्त या तर्कहीन नहीं होते, बल्कि वे प्रश्न पूछते हैं, ठोस प्रमाण तलाशते हैं और जब तक पर्याप्त तथ्य सामने न आ जाएं, तब तक अपना अंतिम निर्णय सुरक्षित रखने का धैर्य रखते हैं। यही 'बौद्धिक धैर्य' किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत होता है। आज के डिजिटल और आभासी दौर में भ्रामक व गलत सूचनाओं की बाढ़ आ चुकी है। इस गंभीर चुनौती का समाधान केवल किसी एक संस्था के बस की बात नहीं है; इसके लिए सरकार, तकनीकी कंपनियों, मीडिया, शिक्षा जगत और स्वयं नागरिकों को मिलकर साझा जिम्मेदारी उठानी होगी। सरकार का दायित्व: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन बनाने वाले पारदर्शी व सख्त कानून निर्मित करे। शिक्षा जगत का कर्तव्य: पाठ्यक्रम में आलोचनात्मक चिंतन  और डिजिटल साक्षरता को प्राथमिकता से शामिल करे, ताकि भावी पीढ़ी सही और गलत सूचना में भेद कर सके। जब तक समाज में विश्लेषणात...

असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती नियमावली में बड़ा बदलाव: उम्र सीमा 55 वर्ष करने पर सहमति, RLSY कॉलेज में खुशी का माहौल।

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  उच्च शिक्षा और असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती प्रक्रिया को लेकर बिहार के शोध छात्रों और अभ्यर्थियों के लिए एक बड़ी राहत भरी खबर आई है। लंबे समय से अपनी मांगों को लेकर संघर्ष कर रहे अभ्यर्थियों और ऑल पीएचडी होल्डर्स एंड रिसर्च एसोसिएशन की राज्यपाल के साथ हुई सकारात्मक वार्ता के बाद आंदोलन खत्म करने का आश्वासन दिया गया है। इस ऐतिहासिक फैसले और सफलता की खुशी में RLSY कॉलेज के प्रो. डॉ. पारस नाथ यादव ने, जिन्होंने इस संघर्ष में शुरू से बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था, कॉलेज परिवार और अपने सहयोगियों को लड्डू खिलाकर खुशियां जाहिर कीं। वार्ता में बने प्रमुख सहमति बिंदु राज्यपाल के साथ हुई वार्ता में कई महत्वपूर्ण निर्णय और बदलावों पर सहमति बनी है: उम्र सीमा में छूट: असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्ति में अधिकतम उम्र सीमा को 43 वर्ष से बढ़ाकर 55 वर्ष करने का फैसला किया गया है। ऑब्जेक्टिव परीक्षा का प्रस्ताव: लिखित परीक्षा कराने और उसमें वस्तुनिष्ठ (Objective) प्रश्न पूछने के साथ-साथ टीचिंग डेमो (Teaching Demo) को भी शामिल करने पर विचार किया जा रहा है। API स्कोर और अनुभव: API स्कोर में अनुभव और शोध प्रकाशन (...

युवा बेरोजगारी का घरेलू और आर्थिक बोझ: आँकड़ों से परे एक वास्तविक संकट।

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  भारत में युवा बेरोजगारी को प्रायः केवल व्यक्तिगत आंकड़ों और नौकरी की तलाश कर रहे युवाओं की संख्या के दायरे में देखा जाता है। हालिया 'आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण' (PLFS 2025) के अनुसार, 18-29 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं में बेरोजगारी दर 14.8% है, जो उच्च शिक्षित (डिप्लोमा, स्नातक या स्नातकोत्तर) युवाओं में बढ़कर 29.4% तक पहुँच जाती है। हालाँकि, यह आँकड़ा पूरे परिदृश्य को उजागर नहीं करता। यदि 'NEET' (रोजगार, शिक्षा या प्रशिक्षण में शामिल न होने वाले) श्रेणी को देखें, तो उच्च शिक्षित युवाओं में यह आंकड़ा 40.1% है, जिसमें 74.7% शिक्षित युवतियाँ श्रम बल से ही बाहर हैं। बेरोजगारी केवल व्यक्तिगत विफलता या प्रतीक्षा का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह पूरे परिवार का एक साझा आर्थिक संकट है। खर्च और बचत पर असर: जिन घरों में शिक्षित बेरोजगार युवा हैं, वे सामान्य परिवारों की तुलना में प्रति माह औसतन ₹1,087 कम उपभोग खर्च करते हैं। कम आय वाले स्रोत: ऐसे परिवारों में औसतन केवल 1.5 कमाने वाले सदस्य होते हैं। लगभग 39.5% परिवार केवल एक व्यक्ति की कमाई पर निर्भर हैं, जबकि 62.5% परिवारों में किसी भी सदस...

श्रम अधिकारों व सामाजिक न्याय की चुनौतियाँ।

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        पुराने औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के निरस्त होने और नए औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 लागू होने के बाद श्रम अधिकारों का दायरा सिमटने का जोखिम है। नए कानूनों का ढांचा श्रमिकों को संरक्षण के दायरे से बाहर रखने की प्रवृत्ति दर्शाता है। ऐसे में यह आवश्यक है कि न्यायपालिका और विधायिका संविधान के भाग IV में निहित सामाजिक न्याय के संकल्प को कमजोर न होने दें, बल्कि श्रमिकों के न्यूनतम अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करें।

सड़क से सन्नाटे तक: महंगाई, जन-आक्रोश और लोकतंत्र में गायब होते सवाल!

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  "रोको महंगाई, बांधो दाम! नहीं तो होगा जाम।" और "खा गई चीनी, पी गई तेल... यह देखो सरकार का खेल।" एक दौर था जब ये नारे सिर्फ राजनीतिक पार्टियों के पोस्टरों पर नहीं, बल्कि आम जनता की ज़ुबान और सड़कों की हवाओं में गूंजते थे। जब राशन की दुकानों पर बढ़ती कीमतें सीधे संसद को हिला देती थीं। लेकिन आज जब महंगाई के आंकड़े लगातार नई ऊंचाइयों को छू रहे हैं, तब यह राजनीतिक और सामाजिक सन्नाटा कई गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या जनता अब आवाज़ नहीं उठाती? इस सन्नाटे के पीछे केवल एक वजह नहीं है, बल्कि यह कई सामाजिक और राजनीतिक बदलावों का मिला-जुला नतीजा है: कार्रवाई का डर और 'टैग' लगने की आशंका: आज के दौर में सरकार या उसकी नीतियों पर सवाल उठाना जोखिम भरा मान लिया जाता है। किसी नीतिगत विरोध या महंगाई पर पूछे गए सवाल को अक्सर विचारधारा से जोड़ दिया जाता है। 'देशद्रोही', 'शहरी नक्सल' या 'अराजक' जैसे लेबल चिपका दिए जाने का डर आम नागरिक को पीछे हटने पर मजबूर करता है। सोशल मीडिया और राजनीतिक ध्रुवीकरण: सूचना के इस दौर में वैचारिक विभाजन गहरा हुआ है। एक बड़ा व...

सुशासन का खोखला दावा: जहाँ CCTV की निगरानी में भी खौफ के साए में है नारियां।

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  सरकार के उन दावों की हवा अब पूरी तरह निकल चुकी है, जिनमें यह ढिंढोरा पीटा जाता था कि 'पहले लड़कियाँ सूरज ढलने के बाद घर से बाहर नहीं निकलती थीं, लेकिन अब माहौल सुरक्षित है।' जमीनी हकीकत यह है कि आज बेटियाँ न सड़कों पर सुरक्षित हैं और न ही किसी दुकान या घर के भीतर छुपकर अपनी जान बचा पा रही हैं। अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हो चुके हैं कि अब वे दिन-दिहाड़े बीच सड़क पर फायरिंग कर रहे हैं और पनाह मांगती सहमी हुई लड़कियों को दुकानों से खींच-खींचकर गोलियाँ मार रहे हैं। यह नजारा किसी दूर-दराज के गांव या सुदूर इलाके का नहीं, बल्कि राज्य की राजधानी का है—जहाँ हर कदम पर पुलिस गश्त और CCTV कैमरों की मौजूदगी का दावा किया जाता है। सबसे शर्मनाक और चिंताजनक बात यह है कि इस खौफनाक मंजर के दौरान समाज और प्रशासन महाभारत के 'द्रौपदी चीर-हरण' के समय खड़े लोगों की तरह महज मूकदर्शक बने हुए हैं। जब रक्षक ही बेबस हो जाएँ और जनता तमाशबीन बनी रहे, तो कानून-व्यवस्था की इससे बड़ी नाकामी और क्या हो सकती है? सीसीटीवी कैमरों की निगरानी और पुलिसिया गश्त सिर्फ फाइलों और कागजों तक सीमित रह गई है। अगर...

भारत में हर बच्चे के लिए एआई ट्यूटर: एक नई डिजिटल क्रांति!

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    भारत का कोचिंग उद्योग एक विशाल बाजार का रूप ले चुका है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (2025) के आंकड़ों के अनुसार कक्षा 9-12 के 27% (लगभग 1.7 से 2 करोड़) छात्र निजी कोचिंग का सहारा लेते हैं। कोचिंग संस्थानों की भारी फीस के बावजूद दूरदराज के क्षेत्रों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सही मार्गदर्शन नहीं मिल पाता। इस विषमता को दूर करने के लिए कोचिंग का 'राष्ट्रीयकरण' करने के बजाय एआई (AI) आधारित एक सार्वजनिक डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाने की आवश्यकता है। सार्वजनिक ढांचा, निजी नवाचार: सरकार स्वयं कोचिंग देने या सामग्री बनाने के बजाय केवल ओपन नेटवर्क और प्लेटफॉर्म तैयार करे—ठीक वैसे ही जैसे UPI और ONDC कार्य करते हैं। निजी संस्थान  इस ओपन नेटवर्क पर सामग्री और परामर्श सेवाएँ उपलब्ध कराएं। शुरुआत NEET और JEE से: इसकी शुरुआत देश की सबसे बड़ी और वस्तुनिष्ठ परीक्षाओं (JEE और NEET) से की जानी चाहिए। YouTube पर सामग्री तो प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, लेकिन एआई का असली लाभ अभ्यास , शंका-समाधान और छात्र की व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुसार सीखने की प्रक्रिया  में है। छात्र का डेटा ...