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ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन 2026: वैश्विक कूटनीति का नया केंद्र और मध्य पूर्व का बदलता रुख।

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    मूल रूप से 2001 में इस समूह को BRIC (दक्षिण अफ्रीका के बिना) कहा गया था, जिसकी कल्पना अर्थशास्त्री जिम ओ'नील ने की थी। वर्ष 2010 में इसमें दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद इसका नाम BRICS हो गया। ब्रिक्स मीटिंग का औचित्य  ब्रिक्स (BRICS) समूह आज के समय में वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज को बुलंद करने और एक न्यायसंगत, बहुध्रुवीय (Multipolar) विश्व व्यवस्था स्थापित करने का सबसे प्रभावी मंच बन चुका है। वैश्विक वित्तीय सुधार: पारंपरिक पश्चिमी वित्तीय संस्थाओं (जैसे IMF और विश्व बैंक) के एकाधिकार को चुनौती देना और आपसी व्यापार के लिए स्थानीय मुद्राओं को बढ़ावा देना।   आर्थिक और तकनीकी सहयोग: आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना, डिजिटल इकॉनमी, इनोवेशन और डीप-टेक स्टार्टअप्स को बढ़ावा देना।   भू-राजनीतिक स्थिरता: आतंकवाद का मुकाबला करने, क्षेत्रीय संघर्षों को रोकने और वैश्विक शांति स्थापित करने के लिए साझा मंच तैयार करना।   अध्यक्षता और सदस्य देश  18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी और अध्यक्षता भारत (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के...

मौन जहर और हमारा स्वास्थ्य: क्यों पैर पसार रहा है कैंसर और क्या है इससे बचाव की राह?

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  आज के दौर में 'कैंसर' शब्द हर दूसरे घर के लिए एक डरावनी हकीकत बनता जा रहा है। बदलती जीवनशैली, खान-पान में रासायनिक जहर और पर्यावरण प्रदूषण ने इस जानलेवा बीमारी को महामारी के रूप में बदल दिया है। यह सिर्फ एक बीमारी नहीं, बल्कि हमारी जीवनशैली और व्यवस्था पर एक बड़ा सवालिया निशान है।   1. कैंसर क्यों होता है? (मुख्य कारण)  SEER - National Cancer Institute हमारे शरीर की कोशिकाएं एक निश्चित नियम के तहत बढ़ती और विभाजित होती हैं। जब डीएनए (DNA) में म्यूटेशन (दोष) आ जाता है, तो ये कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं और ट्यूमर का रूप ले लेती हैं। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं: आनुवंशिक और आंतरिक कारक: परिवार में यदि किसी को कैंसर रहा हो, तो जोखिम बढ़ जाता है। तंबाकू और अल्कोहल: सिगरेट, बीड़ी, गुटका और शराब का सेवन सीधे तौर पर कैंसर कोशिकाओं को बढ़ावा देता है। शारीरिक निष्क्रियता और मोटापा: सुस्त जीवनशैली और वजन का असंतुलन कई तरह के कैंसर का कारण बनता है।   2. खाद्य पदार्थों में Chemical की मिलावट: एक अदृश्य खतरा आज हमारी थाली में परोसा जाने वाला भोजन पोषक...

सामान्य और विलासिता के बीच की खाई: भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविक तस्वीर।

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    अमीरी और गरीबी के बीच का यह फर्क अवसरों और जीवन-परिस्थितियों का भी है।  इस वैचारिक बदलाव को मैक्रो-इकोनॉमिक डेटा, गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा और असमानता के परिप्रेक्ष्य में समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है।   रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत की कुल आय और संपत्ति का एक बहुत बड़ा हिस्सा शीर्ष स्तर के लोगों के पास केंद्रित है। देश के शीर्ष 10% लोग राष्ट्रीय आय का लगभग 58% हिस्सा नियंत्रित करते हैं, जबकि निचले 50% हिस्से के पास केवल 15% आय ही आ पाती है।    संपत्ति की असमानता आय से भी अधिक गहरी है। देश की कुल संपत्ति का लगभग 65% हिस्सा शीर्ष 10% के पास है, और अकेले शीर्ष 1% अमीर लगभग 40% संपत्ति के मालिक हैं।   इसके विपरीत, निचला तबका अपने दैनिक उपभोग और बजट को मैनेज करने में ही अपनी पूरी ऊर्जा लगा देता है, जहाँ एक के लिए ₹25,000 की कार्गो जींस 'सामान्य' फैशन है, तो दूसरे के लिए ₹1,000 का खर्च भी एक बड़ा वित्तीय निर्णय बन जाता है। भले ही भारत ने पिछले कुछ दशकों में तीव्र आर्थिक वृद्धि दर्ज की है, लेकिन प्रति व्यक्ति आय के स्तर पर असमानता अभी भी एक बड़ी चुनौ...

वैश्विक और भारतीय परिदृश्य में असमानता की दोहरी तस्वीर।

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   विषमता के चक्रव्यूह में दुनिया और भारत: आर्थिक, सामाजिक एवं शैक्षणिक चुनौतियाँ।  दुनिया भर में विकास के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, अंतरिक्ष तक पहुँच बन चुकी है, लेकिन इसके बावजूद मानव समाज एक गहरी और चौड़ी होती खाई (असमानता) का सामना कर रहा है। वैश्विक संस्थाओं (जैसे वर्ल्ड इनइक्विलिटी लैब) की रिपोर्टों के अनुसार, दुनिया की कुल संपत्ति का एक बहुत बड़ा हिस्सा चंद अमीर लोगों के हाथों में सिमटा है, जबकि एक बड़ी आबादी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रही है। 1. वैश्विक स्तर पर सर्वाधिक असमानता वाले देश और उसके कारण   आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक असमानता  के मामले में दुनिया के कुछ देश सबसे आगे हैं: दक्षिण अफ्रीका और नामीबिया - ये देश वैश्विक स्तर पर आय और संपत्ति की असमानता में सबसे ऊपर हैं (यहाँ का गिनी गुणांक सबसे अधिक है)।   कारण: ऐतिहासिक रूप से रंगभेद (Apartheid) की नीतियाँ, भूमि और संसाधनों पर एक छोटे श्वेत या अभिजात वर्ग का कब्जा, और श्रम बाजार का अत्यधिक खंडित होना।   लैटिन अमेरिकी देश (जैसे ब्राजील, कोलंबिया, और मैक्सिको): इन...

बिहार में राज्य विश्वविद्यालय लगभग 21, केंद्रीय विश्वविद्यालय 4 , निजी विश्वविद्यालय 8 व डीम्ड विश्वविद्यालय 1 है। नामांकित विद्यार्थियों की संख्या 27 लाख से अधिक है।एक रिपोर्ट।

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     बिहार में उच्च शिक्षा, विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों और छात्र नामांकन से जुड़े आंकड़े निम्नलिखित हैं:   1. बिहार में कुल विश्वविद्यालय (Universities) बिहार में विभिन्न प्रकार के कुल विश्वविद्यालयों की संख्या लगभग 21 से 29 के बीच है (अलग-अलग श्रेणियों जैसे केंद्रीय, राज्य, निजी और डीम्ड विश्वविद्यालयों को मिलाकर):   राज्य विश्वविद्यालय (State Universities): लगभग 21   केंद्रीय विश्वविद्यालय (Central Universities): 4  निजी विश्वविद्यालय (Private Universities): लगभग 8 डीम्ड विश्वविद्यालय (Deemed University): 1   2. महाविद्यालय (अंगीभूत एवं संबद्धता प्राप्त) और सबसे अधिक कॉलेज बिहार में अंगीभूत (Constituent) और संबद्ध (Affiliated) महाविद्यालयों को मिलाकर कुल कॉलेजों की संख्या सैकड़ों में है। सबसे अधिक कॉलेजों वाला विश्वविद्यालय: बिहार में बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय (BRABU), मुजफ्फरपुर और पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय (PPU), पटना या ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय (LNMU), दरभंगा जैसे बड़े विश्वविद्यालयों के अंतर्ग...

सड़क सुरक्षा और यातायात दुर्घटनाएं: केवल अदालती आदेश काफी नहीं ।

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     दुनिया के वाहनों का मात्र 1% हिस्सा होने के बावजूद, भारत में वैश्विक सड़क यातायात मौतों का लगभग 11% हिस्सा होता है, जिसका मुख्य कारण गाड़ी चलाते समय सीट बेल्ट और हेलमेट का उपयोग न करना है। सड़क सुरक्षा और यातायात दुर्घटनाओं का मुद्दा आज के समय में देश और विशेषकर बिहार जैसे राज्यों के लिए एक गंभीर राष्ट्रीय चिंता का विषय बन गया है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि न्यायालयों के कड़े आदेश, समय-समय पर लगने वाले भारी जुर्माने और पुलिस की सख्ती का अपना एक महत्व है, लेकिन केवल अदालती आदेश या प्रशासनिक निर्देश सड़क हादसों को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए जमीनी स्तर पर व्यापक सुधार, मजबूत बुनियादी ढांचे और जन-जागरूकता की आवश्यकता है।   सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, भारत में सड़क हादसों की स्थिति बेहद भयावह है: देश में कुल सड़क हादसों की संख्या पाँच लाख से अधिक है, जिनमें सालाना 1.83 लाख से अधिक लोग अपनी जान गंवाते हैं। औसतन हर घंटे दर्जनों हादसे होते हैं और हर 3 से 4 मिनट में एक व्यक्ति की सड़क दुर्घटना में मौत हो जाती है।...

दलाली की भी एक सीमा होती है: जदयू के नाम बदलने की चर्चा और नीतीश कुमार की राजनीतिक विडंबना।

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    "वाए नाकामी मता-ए-कारवां जाता रहा / कारवां के दिल से अहसास-ए-ज़ियां जाता रहा।" — अल्लामा इक़बाल राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का नाम अगर कोई कहे कि 'जनता दल (लालू)' कर दिया जाए, तो वैसा प्रस्ताव रखने वाले के साथ बाकी लोग क्या करेंगे, मुझे नहीं मालूम; पर पूर्णतः अहिंसा में गहरा यक़ीन रखने वाला व्यक्ति मैं न चाहते हुए भी अपने जूते की तरफ़ देखने लगूंगा! दलाली की भी एक सीमा होती है! शरद यादव नीत जनता दल में महान समाजवादी नेता रामकृष्ण हेगड़े नीत लोकशक्ति और जॉर्ज फ़र्नांडिस नीत समता पार्टी का क्रमशः विलय हुआ था, और तब जाकर 2003 में नयी पार्टी के रूप में उसका नाम जनता दल (यूनाइटेड) हुआ। जॉर्ज फ़र्नांडिस उसके पहले अध्यक्ष और जहां तक ध्यान आता है शरद यादव पार्टी के पार्लियामेंट्री बोर्ड के अध्यक्ष हुए। 2006 में शरद जी जनता दल (यूनाइटेड) के अध्यक्ष हुए और 2016 तक लगातार तीन बार और अब तक उस पार्टी के सर्वाधिक समय (10 साल) तक अध्यक्ष रहने वाले व्यक्ति हैं। परिस्थितियों के मुख्यमंत्री और वैचारिक विचलन अगर शरद जी ने समता पार्टी का विलय जनता दल में नहीं किया होता, तो न नीतीश कुमार म...