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मेरी यात्रा: अनुभव का अर्घ्य! -प्रो प्रसिद्ध कुमार.

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  19 मार्च की वह ढलती सुबह, रविवार का वह प्रहर, जब धरा पर मैंने रखा कदम, शुरू हुआ यह सफर। सन सड़सठ (1967) से अब तक का, यह लंबा अंतराल, छठे दशक के अंतिम सोपान पर, खड़ा आज खुशहाल। फुर्सत की कोई चाह नहीं, काम ही विश्राम बना, जिम्मेवारी की धूप में, व्यक्तित्व का आयाम बना। अर्थ बिना अनर्थ है माना, पर ज़मीर न डोल सका, सौदेबाजी की मंडी में, खुद को कभी न तोल सका। कौड़ी-कौड़ी जोड़कर, जिसने बुना समाज। नीति तजी न लाभ हित, वही आज सिरताज॥ जीवन की 'रिप्ले' चली, तो दृश्य सभी जीवंत हुए, कड़वे अनुभव पीछे छूटे, मीठे पल अनंत हुए। मूर्खों की संगति त्यागी मैंने, जहाँ न कोई मान था, असफलता की राहें बदलीं, यही प्रज्ञा-ज्ञान था। कनिष्ठ से ज्येष्ठ हुए, बदली रिश्तों की परिभाषा, स्वार्थ भरा यह जग सारा, पर निस्वार्थ रही अभिलाषा। चुम्बकीय है वह व्यक्तित्व, जो औरों को अपना ले, खोट वहीं है निश्चित ही, जो अपनों को बिसरा दे। अहम तजो रे बावरे, नश्वर है यह देह। जग में केवल शेष है, करुणा, सत्य और नेह॥ समय अनमोल है इतना, जिसे कोई न खरीद सके, नफरत और द्वेष की खातिर, क्यों कोई मन को डसे? शिक्षा और सदाचार ही, जीवन के ...

खाकी का 'खूनी' चेहरा: मुजफ्फरपुर में रक्षक बना भक्षक! 😂

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  (लाल घेरे में आरोपी थानाध्यक्ष)  लोकतंत्र में पुलिस की भूमिका नागरिक सुरक्षा की होती है, लेकिन जब सत्ता का संरक्षण और वर्दी का अहंकार मिल जाए, तो परिणाम बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के गायघाट थाना अंतर्गत चोरनीया गांव जैसी हृदयविदारक घटनाओं के रूप में सामने आता है। 16 मार्च 2026 की यह घटना न केवल पुलिस की बर्बरता को दर्शाती है, बल्कि बिहार के प्रशासनिक ढांचे पर भी गहरे सवाल खड़े करती है। घटनाक्रम: छापेमारी या तांडव? प्राप्त जानकारी के अनुसार, थानाध्यक्ष राजा सिंह भारी दलबल के साथ एक वारंट के सिलसिले में गांव पहुंचे थे। आरोप है कि एक अपराधी की तलाश के नाम पर पुलिस ने मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ दीं। अमानवीय व्यवहार: पुलिस ने केवल वांछित अपराधी ही नहीं, बल्कि निर्दोष ग्रामीणों के घरों में भी जबरन प्रवेश कर अभद्रता की। अंधाधुंध फायरिंग: झड़प के दौरान थानाध्यक्ष ने कथित तौर पर अनियंत्रित होकर गोलियां चलाईं, जिससे एक मूक पशु (भैंस) को गोली लगी। जगतवीर राय की हत्या: इस घटना का सबसे भयावह पहलू समाजसेवी जगतवीर राय की हत्या है। आरोप है कि थानाध्यक्ष ने अत्यंत क्रूरता का परिचय देते हुए उन...

भारतीय रेलवे: 'धीमी प्रगति' से 'सुपर-फास्ट परिवर्तन' के नए युग का सूत्रपात!

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  भारतीय रेलवे वर्तमान में आधुनिकीकरण और अभूतपूर्व विस्तार के एक ऐतिहासिक दौर से गुजर रही है। केंद्रीय बजट 2026-27 में ₹2.78 लाख करोड़ के रिकॉर्ड आवंटन के साथ, रेलवे अब केवल एक परिवहन सेवा नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और आम आदमी की आकांक्षाओं का मुख्य आधार बन गई है। प्रमुख संरचनात्मक और वित्तीय सुधार रेल बजट का आम बजट में विलय होने से रेलवे को तीन मुख्य लाभ हुए हैं: बजटीय सहायता में वृद्धि: आवंटन ₹25,000 करोड़ से बढ़कर ₹2.78 लाख करोड़ तक पहुँच गया है। त्वरित निर्णय प्रक्रिया: परियोजनाओं और नई तकनीक की मंजूरी अब वर्ष भर सुगम हो गई है। पारदर्शिता: वित्त मंत्रालय और नीति आयोग की निगरानी से प्रणालियों में जवाबदेही बढ़ी है। इन्फ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा में क्रांति नेटवर्क विस्तार: पिछले दशक में 35,000 किमी नई पटरियां बिछाई गई हैं और 99% रेल नेटवर्क का विद्युतीकरण पूरा हो चुका है। कवच प्रणाली: स्वदेशी सुरक्षा तकनीक 'कवच' को 3,000 किमी पर लागू किया जा चुका है और 20,000 किमी पर कार्य जारी है। सुरक्षित यात्रा: एलएचबी (LHB) कोचों की संख्या में भारी वृद्धि और 'रूट कॉज़ एनालिसिस'...

मानवता की बलि चढ़ाता आधुनिक युद्धोन्माद: नियम बनाम यथार्थ!

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  आज जब दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और अंतरिक्ष अनुसंधान के माध्यम से भविष्य की ओर देख रही है, वहीं दूसरी ओर मध्य-पूर्व से लेकर मध्य-एशिया तक धधकती युद्ध की आग ने पूरी मानवता को पाषाण युग की बर्बरता में धकेल दिया है। हाल ही में पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव और काबुल के अस्पताल पर हुए हवाई हमले ने एक बार फिर यह कड़वा सच उजागर किया है कि युद्ध के मैदान में नैतिकता और अंतर्राष्ट्रीय नियम केवल किताबों तक सीमित रह गए हैं। नियमों का चीरहरण और मूक दर्शक दुनिया जिनेवा कन्वेंशन और अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानूनों के तहत युद्ध के दौरान अस्पताल, स्कूल और रिहायशी इलाकों को निशाना बनाना एक 'युद्ध अपराध' (War Crime) की श्रेणी में आता है। बावजूद इसके, चाहे वह गाजा हो, यूक्रेन या अब काबुल—हॉस्पिटलों का मलबे में तब्दील होना एक सामान्य प्रक्रिया बनती जा रही है। काबुल के अस्पताल पर हमले में 400 मासूमों की जान जाना केवल एक सैन्य चूक नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं की सामूहिक हत्या है। यह शर्मनाक है कि रमजान जैसे पवित्र महीने में भी हिंसा का तांडव थमने का नाम नहीं ले रहा। भू-राजनीति ...

तपती धरती, संकट में जीवन: ग्लोबल वार्मिंग की भयावह दस्तक!

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  आज हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ 'प्रकृति' केवल शांति का प्रतीक नहीं, बल्कि एक चेतावनी बन चुकी है। वैज्ञानिकों के अनुसार, औद्योगिक क्रांति के बाद से पृथ्वी के औसत तापमान में जो निरंतर वृद्धि हुई है, उसने हमारे अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। यह केवल मौसम का बदलना नहीं है, बल्कि एक वैश्विक आपातकाल है। विनाश के मुख्य कारक हमारी आधुनिक जीवनशैली और विकास की अंधी दौड़ ने इस संकट को जन्म दिया है: जीवाश्म ईंधनों का दोहन: कोयला, तेल और गैस का अत्यधिक उपयोग वातावरण को प्रदूषित कर रहा है। निर्वनीकरण : कंक्रीट के जंगल बनाने की होड़ में हमने उन फेफड़ों (वनों) को काट दिया जो कार्बन सोखते थे। ग्रीनहाउस गैसों का जाल: कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य हानिकारक गैसें सूरज की गर्मी को धरती की सतह पर ही रोक लेती हैं, जिससे 'हीट ट्रैप' बन रहा है। स्वास्थ्य पर सीधा प्रहार यह केवल ग्लेशियर पिघलने तक सीमित नहीं है, इसका असर अब सीधे हमारे शरीर पर दिख रहा है: थर्मोरेगुलेशन की विफलता: जब बाहरी तापमान शरीर की सहनशक्ति से बाहर हो जाता है, तो शरीर अपनी प्राकृतिक ठंडक बनाए रखने की क्षमता खो देता है।...

छोटे कदम, बड़ी मंजिल: शुरुआत का साहस!

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   अक्सर हम बड़े सपनों और लंबी यात्राओं को देखकर घबरा जाते हैं। हमें लगता है कि मंज़िल इतनी दूर है कि वहां तक पहुँचना असंभव है। लेकिन सच्चाई यही है कि "यात्राएं कितनी भी लंबी क्यों न हों, वे एक कदम से ही शुरू होती हैं।" 1. छोटे कदम का आत्मविश्वास जब हम किसी काम की शुरुआत करते हैं, तो वह शुरुआत भले ही बहुत छोटी हो, लेकिन वह हमारे भीतर एक अद्भुत आत्मविश्वास भर देती है। यह विश्वास कि "मैं कर सकता हूँ," हमें आगे बढ़ने की ऊर्जा देता है। रुका हुआ इंसान एक जगह स्थिर तालाब के पानी जैसा हो जाता है, जबकि चलते रहना हमें नदी की तरह जीवंत रखता है। 2. जमे हुए जीवन में हलचल हम सभी के जीवन में कुछ ऐसे काम होते हैं जो अरसे से रुके हुए होते हैं। जब हम उन रुके हुए कामों को हाथ में लेते हैं, तो हम केवल एक कार्य पूरा नहीं कर रहे होते, बल्कि हम अपनी ठहरी हुई जिंदगी को गति दे रहे होते हैं। वह एक छोटा सा निर्णय हमारे नीरस जीवन में हलचल पैदा करता है और हमें फिर से जीवंत महसूस कराता है। 3. परिणाम से ज्यादा प्रक्रिया महत्वपूर्ण सफलता रातों-रात नहीं मिलती। वह हर रोज लिए गए छोटे-छोटे निर्णयों का प...

'बहु-पिता' संस्कृति: एक आधुनिक विमर्श!

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  आज के दौर में 'हैसियत' का पैमाना बदल गया है। अब हैसियत इस बात से नहीं मापी जाती कि आपके बैंक बैलेंस में कितने शून्य हैं, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि आपने कितने 'संरक्षक' (बाप) पाल रखे हैं। परसाई जी का इशारा उस चाटुकारिता और अवसरवाद की ओर है, जहाँ व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए अपनी निष्ठा और स्वाभिमान को गिरवी रख देता है। १. दफ्तर के 'बॉस-बाप' कॉर्पोरेट जगत में जिसे हम 'नेटवर्किंग' या 'मेंटरशिप' कहते हैं, परसाई की भाषा में वह अक्सर 'दफ्तर वाला बाप' बनाना ही है। यह वो शख्स है जिसकी हर गलत बात पर आप 'जी सर' की जुगाली करते हैं ताकि इंक्रीमेंट का झुनझुना आपको मिलता रहे। यहाँ योग्यता से ज्यादा 'जी-हुजूरी' का महत्व है। २. बाजार के 'ब्रैंड-बाप' बाजारवाद के इस दौर में उपभोक्ता खुद एक 'बाप' की तलाश में रहता है—चाहे वो कोई बड़ा उद्योगपति हो या कोई ऐसा बिचौलिया जो कम समय में पैसा दोगुना करने का लालच दे। बाजार में साख बनाने के लिए लोग ऐसे-ऐसे प्रभावशाली लोगों के चरणों में सिर नवाते हैं, जिनसे उनके व्यापार की नैया पार...