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​राम लखन सिंह यादव कॉलेज अनीसाबाद में पुस्तकालयकर्मी सतीश कुमार सिंह के निधन पर गहरा शोक !😢😢

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  उनका निधन दिनांक 26 दिसम्बर 2025 को हुआ था।  ​उनके निधन की दुखद खबर मिलते ही, कॉलेज परिसर में आज एक शोक सभा का आयोजन किया गया। इस दौरान, कॉलेज परिवार ने दिवंगत आत्मा की शांति के लिए  दो मिनट का मौन धारण कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।​उनके निधन की दुखद खबर मिलते ही, कॉलेज परिसर में आज एक शोक सभा का आयोजन किया गया। इस दौरान, कॉलेज परिवार ने दिवंगत आत्मा की शांति के लिए  दो मिनट का मौन धारण कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।   ​इस अवसर पर, कॉलेज के कई शिक्षक और शिक्षकेतर कर्मचारी उपस्थित थे और उन्होंने दिवंगत आत्मा के प्रति अपनी गहरी संवेदनाएं व्यक्त कीं। शोक व्यक्त करने वालों में     ​कॉलेज के प्राचार्य प्रो. सुरेंद्र प्रसाद , प्रो. शंकर साह , प्रो. बीरेंद्र सिंह, प्रो. , प्रो. आर एन उपाध्याय, प्रो. परिवेश साह, प्रो डॉ महेंद्र सिंह , प्रो आनंद कुमार , प्रो प्रसिद्ध कुमार , प्रो राजकुमार , प्रो. उसम्मानी, प्रो. सतेंद्र प्रसाद, प्रो. अरुण कुमार, प्रो. रामजीवन यादव,  प्रो कुमारी निधि , प्रो   मनीष भारती ,मुंद्रिका साह ,रामजी राय ,...

,सफलता और जीवन का अदृश्य सूत्रधार !

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    समय बलवान है और हम सब इसकी धारा में बह रहे हैं। लेकिन समय केवल एक धारा नहीं, बल्कि वह पूंजी है जिसे सही जगह निवेश कर हम अपना भाग्य बदल सकते हैं। समय की महत्ता को शब्दों से ज्यादा उन पलों की कीमत से समझा जा सकता है जहाँ 'एक सेकंड' भी हार और जीत के बीच की दीवार बन जाता है। ​1. खेल के मैदान में समय की कीमत ​एक एथलीट जो सालों तक कड़ा अभ्यास करता है, उसके लिए समय का मूल्य घंटों में नहीं, बल्कि सेकंड के सौवें हिस्से  में होता है। ओलंपिक जैसे मंचों पर अक्सर देखा गया है कि मात्र पलक झपकने जितनी देरी किसी खिलाड़ी को स्वर्ण पदक से वंचित कर देती है। वह एक छोटा सा अंश उसे इतिहास रचने या गुमनामी में रहने के बीच खड़ा कर देता है। ​2. जीवन और मृत्यु का अंतर ​चिकित्सा के क्षेत्र में समय को 'गोल्डन ऑवर' कहा जाता है। किसी दुर्घटना के शिकार व्यक्ति या गंभीर रोगी के लिए कुछ मिनटों की देरी जीवन और मृत्यु का फैसला कर देती है। डॉक्टर समय पर पहुँच जाए तो प्राण बच जाते हैं, और यदि चंद मिनटों का विलंब हो जाए, तो हाथ में केवल पछतावा रह जाता है। ​3. अवसरों की गति ​हमारी आधुनिक जीवनशैली में ट्रेन ...

​विनाश की नींव पर खड़ा विकास: अरावली का दम घोंटती आधुनिकता !

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    ​आज के युग में हमने 'विकास'  की एक ऐसी परिभाषा गढ़ ली है, जिसका रास्ता विनाश की गलियों से होकर गुजरता है। जिस अरावली पर्वतमाला को हमारे पूर्वज उत्तर भारत का 'कवच' मानते थे, आज वह कंक्रीट के जंगलों और अवैध खनन की भेंट चढ़ रही है। ​एक प्राकृतिक दीवार का अंत ​अरावली केवल पत्थरों का ढेर नहीं है, जैसा कि अक्सर इसे समझा जाता है। यह 650 किलोमीटर लंबी श्रृंखला थार रेगिस्तान को गंगा के उपजाऊ मैदानों की ओर बढ़ने से रोकने वाली एक 'प्राकृतिक दीवार' है। यदि हम अपने क्षणिक आर्थिक लाभ के लिए इस दीवार को ढहाते रहे, तो वह दिन दूर नहीं जब दिल्ली और आसपास के क्षेत्र धूल के गुबार में दफन हो जाएंगे। रेगिस्तान का विस्तार कोई काल्पनिक भय नहीं, बल्कि एक कड़वी सच्चाई है। ​पारिस्थितिक तंत्र बनाम रियल एस्टेट ​विडंबना देखिए, जिस पर्वतमाला से चंबल, साबरमती और लूनी जैसी नदियाँ जीवन पाती हैं, उसी के जलभराव वाले क्षेत्रों पर आज ऊंची इमारतें खड़ी की जा रही हैं। हम भूजल स्तर गिरने की शिकायत तो करते हैं, लेकिन उन पहाड़ों को नष्ट कर रहे हैं जो प्राकृतिक रूप से पानी को जमीन के भीतर सोखने का काम करते ...

​खाद्य सुरक्षा: जन-स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था की दहलीज पर संकट !

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    ​आज के दौर में 'शुद्धता' एक दुर्लभ शब्द बन गई है। जिस भोजन को हम जीवनशक्ति का आधार मानते हैं, वही आज बीमारियों का घर बनता जा रहा है। खाद्य पदार्थों में मिलावट केवल एक स्वास्थ्य समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्र की साख और उसकी आर्थिक नींव पर भी एक बड़ा प्रहार है। ​स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था का अंतर्संबंध: जब खाद्य पदार्थों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होती, तो सार्वजनिक स्वास्थ्य का स्तर गिरता है। एक बीमार कार्यबल देश की उत्पादकता को कम करता है। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय बाजार में 'मेड इन इंडिया' खाद्य उत्पादों की विश्वसनीयता कम होने से निर्यात और अंततः अर्थव्यवस्था पर गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। ​त्रिपक्षीय जिम्मेदारी (सरकार, उद्योग और नागरिक):  यह लड़ाई अकेले नहीं जीती जा सकती: ​सरकार: कानून सख्त हों और उनका पालन 'कागजों' के बजाय धरातल पर हो। ​उद्योग: केवल मुनाफे की अंधी दौड़ के बजाय नैतिक व्यापार को प्राथमिकता दी जाए। ​नागरिक: एक जागरूक उपभोक्ता ही बाजार को सुधरने पर मजबूर कर सकता है। ​जांच और न्याय प्रक्रिया में सुधार: अक्सर मिलावटखोर इसलिए नहीं डरते क्योंकि जांच की...

नया वर्ष: आत्मनिरीक्षण, बदलाव और नई संभावनाओं का संगम !

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  जीवन अपनी प्रकृति में अनिश्चित और अप्रत्याशित है। जिस प्रकार ऋतुएं बदलती हैं, उसी प्रकार 'वर्ष का परिवर्तन' हमें यह याद दिलाने का एक सशक्त माध्यम है कि परिवर्तन ही जीवन का आधार है। विकास के लिए बदलाव अनिवार्य है, और यही वह समय है जब हम अपनी सीमाओं को लांघकर एक नई यात्रा की शुरुआत कर सकते हैं। 1. आराम क्षेत्र से बाहर कदम अक्सर हम भय या हिचकिचाहट के कारण नए अवसरों को टाल देते हैं।  हम अपने 'कंफर्ट ज़ोन' से बाहर निकलें। सोच-समझकर लिया गया जोखिम न केवल हमें साहसी बनाता है, बल्कि उन द्वारों को भी खोलता है जिन्हें हमने डर के मारे बंद कर रखा था। 2. प्रशंसा और सकारात्मक दृष्टिकोण बीते वर्ष की उपलब्धियों और दूसरों के प्रयासों की सराहना करना केवल शिष्टाचार नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक निवेश है। जब हम कृतज्ञता  का भाव रखते हैं, तो जीवन के प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित होता है। यह नजरिया हमें मुश्किल समय में भी टूटने के बजाय लड़ने की शक्ति देता है। 3. सजगता और मानसिक स्पष्टता आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में 'सजगता'  और 'ध्यान' अनिवार्य हैं। दैनिक उद्दे...

समय की पुकार ( कविता )-प्रो प्रसिद्ध कुमार । नववर्ष 2026 मंगलमय हो!💐💐

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​ नववर्ष तो आता रहता है, पर उम्र घटती जाती है, टिक-टिक करती घड़ी हमें, बस यही याद दिलाती है। न काल रुकेगा, न आयु रुकेगी, यह वश में हमारे नहीं, पर जो करना है आज हमें, वह याद हमें रहता ही नहीं। ​ हम 'कल' पर सब कुछ टाल रहे, जो आज हाथ में आया है, न पल मिलना, न उम्र दोबारा, यह कैसी मोह-माया है? हम प्रेम-भाव से रह सकते, सद्भाव की राह चुन सकते थे, हम नेक राह पर चलकर भी, सुंदर सपने बुन सकते थे। ​ पर फितरत ऐसी बदल गई, हम भेदभाव में खो बैठे, जाति-धर्म और रंग-रूप के, कड़वे बीज हम बो बैठे। बनावटी चेहरा ओढ़ लिया, सादगी कहीं अब खो गई है, औरों के पथ में जाल बिछाना, फितरत अपनी हो गई है। ​ ऐश्वर्य की अंधी चाहत में, हम मानवता को भूल गए, कुकर्मों की बैसाखी थामी, मर्यादा से मुँह मोड़ लिए। न कबीर पढ़े, न रहीम पढ़े, न तर्क-ज्ञान को माना है, कुएँ के मेंढक बन बैठे, बस खुद को ही पहचाना है। ​ अभी वक्त है, जाग उठें हम, सत्कर्मों की राह चलें, इतिहास-बोध और ज्ञान की ज्योति, अपने भीतर हम ढलें। समय की रेत फिसलने से पहले, इंसान ज़रा तू जाग जा, नफ़रत के इस अंधेरे से, उजाले की ओर तू भाग जा।

​कलम की स्वतंत्रता और आँकड़ों की वैश्विक उड़ान: मेरी ब्लॉगिंग यात्रा का एक स्वर्णिम अध्याय !प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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    ​"जब गुलामी वाली पत्रकारिता का सामना हुआ, तो मैंने उसे छोड़कर अपनी राह खुद बनाना ही श्रेष्ठ समझा।" इसी संकल्प के साथ मैंने करीब  पाँच साल पहले अपने इस स्वतंत्र ब्लॉग की नींव रखी थी। आज 31 दिसंबर 2025 को, जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो 4300 ब्लॉग पोस्ट और 2,69,661 (पौने तीन लाख के करीब) व्यूअर्स का यह आँकड़ा मेरे वैचारिक संघर्ष की जीत का प्रमाण देता है। ​विकास का तुलनात्मक विश्लेषण (2022 - 2025) ​मेरे ब्लॉग की प्रगति केवल अंकों की वृद्धि नहीं, बल्कि आप पाठकों के बढ़ते विश्वास की कहानी है। साल 2022 में मेरे 1,816 ब्लॉग पर 71 हजार व्यूअर्स थे। आज 2025 के अंत तक यह संख्या बढ़कर 4,300 ब्लॉग और 2.69 लाख से अधिक व्यूअर्स तक पहुँच गई है। ​प्रतिशत के नजरिए से देखें तो: ​ब्लॉग पोस्ट की संख्या में 136% की वृद्धि हुई है। ​व्यूअर्स (पाठकों) की संख्या में 280% की भारी बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। ​वैश्विक मानचित्र पर मेरी वैचारिक गूँज ​आज मुझे गर्व है कि मेरे विचारों को सीमाएं नहीं रोक पाईं। वर्तमान में 30 से अधिक देशों के लोग मेरे ब्लॉग को नियमित पढ़ रहे हैं। भारत के अलावा मुख्य रूप से ...