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शिक्षा की पूर्णता: ज्ञान, दर्शन और अनुभव का संगम !

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  ​ आज के आधुनिक युग में शिक्षा को अक्सर केवल डिग्रियों और रोजगार पाने के साधन के रूप में देखा जाता है। लेकिन वास्तव में, शिक्षा एक बहुआयामी प्रक्रिया है। ज्ञान, दर्शन और अनुभव —इन तीनों का संतुलन ही शिक्षा को उसकी पूर्णता प्रदान करता है। यदि इनमें से एक भी पक्ष कमजोर पड़ जाए, तो शिक्षा का उद्देश्य अधूरा रह जाता है। ​शिक्षा के तीन स्तंभ ​ 1. विज्ञान और ज्ञान: यांत्रिकता का खतरा विज्ञान हमें तथ्य, तर्क और तकनीकी कौशल देता है। यह अनिवार्य है, लेकिन यदि शिक्षा केवल 'विज्ञान' या तकनीकी ज्ञान तक सीमित रह जाए, तो वह मनुष्य को केवल एक उपयोगी साधन (Machine) बना देती है। ऐसी शिक्षा में दक्षता तो होती है, पर संवेदनशीलता और मानवीय मूल्यों का अभाव हो जाता है। मनुष्य केवल उत्पादन की एक इकाई बनकर रह जाता है। ​ 2. दर्शन: अमूर्तता और व्यवहार का संतुलन दर्शन हमें 'क्यों' और 'कैसे' के गहरे अर्थ समझाता है। यह जीवन के उद्देश्यों को स्पष्ट करता है। परंतु, यदि शिक्षा केवल दर्शन पर आधारित हो और उसका जमीन से जुड़ाव न हो, तो वह 'अमूर्त' (Abstract) हो जाती है। ऐसी शिक्षा विचारो...

डिजिटल साक्षरता: सूचना के जाल से विवेक की पहचान तक !

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  ​आज के दौर में सोशल मीडिया केवल संवाद का जरिया नहीं रहा, बल्कि यह एक ऐसी अदृश्य शक्ति बन चुका है जो हमारे विचारों, प्राथमिकताओं और दृष्टिकोण को नियंत्रित कर रहा है। सुबह उठते ही स्मार्टफोन की स्क्रीन पर आने वाली सूचनाएं तय करती हैं कि आज हम किस विषय पर चर्चा करेंगे और किसे अपना समर्थन देंगे। लेकिन क्या यह सूचना प्रवाह हमेशा शुद्ध होता है? ​धुंधली होती सत्य की रेखा ​सूचना के इस महासागर में सत्य और भ्रम तथा तथ्य और अफवाह के बीच का अंतर मिटता जा रहा है। 'फर्जी खबरों' (Fake News) के इस दौर में एक झूठ को इतनी बार और इतनी खूबसूरती से परोसा जाता है कि वह सच जैसा दिखने लगता है। यह स्थिति न केवल व्यक्तिगत निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करती है, बल्कि पूरे समाज के ताने-बाने को भी अस्थिर कर सकती है। ​डिजिटल साक्षरता की नई परिभाषा ​अक्सर हम कंप्यूटर चलाना या इंटरनेट का उपयोग कर लेना ही 'डिजिटल साक्षरता' मान लेते हैं। लेकिन वास्तव में, आज इसकी परिभाषा बदल चुकी है: ​ मीडिया साक्षरता: यह समझना कि परोसी गई सूचना का स्रोत क्या है और उसका उद्देश्य क्या हो सकता है। ​ आलोचन...

अकेलेपन के शोर में पक्षियों का मौन साथ !

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  ​आज के डिजिटल और प्रतिस्पर्धी युग में, अकेलापन एक ऐसी महामारी बन चुका है जो धीरे-धीरे समाज को अपनी चपेट में ले रहा है। ऊंची इमारतों और भीड़भाड़ वाले शहरों में रहने के बावजूद, इंसान खुद को भीतर से खाली महसूस करता है। ऐसे में सवाल उठता है कि इस मानसिक बोझ का समाधान कहाँ है? जवाब शायद हमारे घर की खिड़की या बालकनी के पास ही है— पक्षियों की मौन संगति में। ​1. बिना शर्त का साथ ​इंसानी रिश्तों में अक्सर उम्मीदें और शिकायतें जुड़ी होती हैं। लेकिन पक्षियों के साथ हमारा रिश्ता पूरी तरह से निस्वार्थ होता है। ​ "वे हमारे दुख नहीं पूछते, हमारी सफलताओं से प्रभावित नहीं होते, फिर भी हमारे साथ होते हैं—एक चिकित्सक की तरह।" ​यह 'मौन साथ' हमें यह महसूस कराता है कि हम जैसे भी हैं, इस प्रकृति का हिस्सा हैं। उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपका बैंक बैलेंस क्या है या आप जीवन में कितने सफल हैं। ​2. एक प्राकृतिक चिकित्सक ​मनोवैज्ञानिक भी अब मानते हैं कि प्रकृति के करीब रहने से तनाव कम होता है। पक्षियों का चहचहाना या उनका शांति से आकाश में उड़ना हमारे मस्तिष्क में 'डोपामाइन...

एआई का 'स्मार्ट' भविष्य: प्रगति और पर्यावरण के बीच का द्वंद्व !

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  ​आज की डिजिटल दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को मानव जाति की हर समस्या के अचूक समाधान के रूप में देखा जा रहा है। चिकित्सा से लेकर अंतरिक्ष विज्ञान तक, एआई हमारी क्षमताओं को नए पंख लगा रहा है। लेकिन इस 'स्मार्ट' क्रांति की एक स्याह हकीकत भी है, जो हमारे डेटा केंद्रों (Data Centers) की बिजली की भूख और पानी की खपत के पीछे छिपी है। ​ 1. बढ़ता ऊर्जा संकट और एआई एआई जितना विकसित हो रहा है, उसे उतनी ही अधिक कंप्यूटिंग शक्ति की आवश्यकता पड़ रही है। अधिकांश डेटा सेंटर आज भी कोयला और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों से चलने वाली बिजली पर निर्भर हैं। ​ तथ्य: एक अनुमान के मुताबिक, एआई के जरिए एक सामान्य ईमेल लिखने या इमेज जनरेट करने में उतनी ही ऊर्जा खर्च हो सकती है जितनी कि कई स्मार्टफोन्स को चार्ज करने में। ​ 2. जल संकट: एक अनकहा पहलू ​एआई के सर्वरों को ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में ताजे पानी की जरूरत होती है। जब जमीन पर बने ये डेटा केंद्र लाखों गैलन पानी 'गटकने' लगते हैं, तो स्थानीय जल स्तर पर इसका सीधा असर पड़ता है। यह विकास की वह कीमत है जिसे हमारा पर्यावरण चुका रहा है। ​...

जातीय श्रेष्ठता की विडंबना: रहीम का साहित्य और समाज !

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  ​मध्यकालीन भारतीय समाज में जाति एक पत्थर की लकीर बन चुकी थी। रहीम ने अपनी लेखनी से इस विडंबना पर प्रहार किया कि मनुष्य का मूल्य उसके 'कुल' या 'जाति' से नहीं, बल्कि उसके गुणों और व्यवहार से होना चाहिए। ​रहीम कहते हैं कि ऊंचे कुल में जन्म लेने मात्र से कोई महान नहीं हो जाता, यदि उसके कर्म नीच हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि श्रेष्ठता 'लेबल' में नहीं, 'स्वभाव' में होती है: ​ "ऊंचे कुल का जनमिया, जे करनी ऊंच न होय। सुबरन कलस सुरै भरा, साधू निंदत सोय॥" ​ साहित्यिक विश्लेषण: यहाँ रहीम 'स्वर्ण कलश' (ऊंची जाति) और 'मदिरा' (बुरे कर्म) का रूपक बांधते हैं। जैसे सोने के घड़े में शराब भर देने से वह पवित्र नहीं हो जाती और सज्जन उसकी निंदा ही करते हैं, वैसे ही उच्च जाति में जन्म लेकर यदि व्यक्ति के संस्कार निम्न हैं, तो वह समाज के लिए त्याज्य है। ​जातीय श्रेष्ठता का अहंकार तब टूटता है जब व्यक्ति को किसी ऐसे काम की आवश्यकता पड़ती है जिसे वह 'छोटा' समझता है। रहीम ने इस सामाजिक विसंगति को बड़े मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है: ​ "र...

बिहार बजट 2026-27: शिक्षा एवं संबद्ध कॉलेजों का विश्लेषण!-प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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  विगत वर्ष में संबंध कॉलेजों के लिए 550 करोड़ (प्रारम्भिक)था ,इस बार 825 करोड़ रुपये बजट है। ​बिहार सरकार ने इस वर्ष शिक्षा को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता में रखा है। शिक्षा के लिए आवंटित ₹60,204.61 करोड़ में से उच्च शिक्षा का हिस्सा गुणवत्तापूर्ण सुधार और बुनियादी ढांचे के विस्तार के लिए समर्पित है। ​1. संबद्ध कॉलेजों (Affiliated Colleges) के लिए प्रावधान ​संबद्ध कॉलेजों के लिए सरकार ने मुख्य रूप से तीन स्तरों पर फंड आवंटित किया है: ​बकाया अनुदान का भुगतान: राज्य के लगभग 300 से अधिक संबद्ध कॉलेजों के लिए लंबित अनुदान (Grant-in-aid) के वितरण हेतु बजट में विशेष व्यवस्था की गई है। इसके लिए ₹800 करोड़ से अधिक का विशेष प्रावधान केवल अनुदान मद में है। ​NAAC एक्रिडिटेशन सपोर्ट: संबद्ध कॉलेजों को बेहतर ग्रेड दिलाने के लिए लैब, लाइब्रेरी और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने हेतु अलग से फंड का प्रावधान है। ​समान काम-समान वेतन की दिशा में कदम: संबद्ध कॉलेजों के शिक्षकों के मानदेय और उनकी भविष्य की निधि (EPF) से संबंधित सुधारों के लिए उच्च शिक्षा बजट का एक हिस्सा विश्वविद्यालयों को हस्तांतरित क...

षड्यंत्र या संयोग? 'Not Found Suitable' के नाम पर पिछड़ों का हक मारने का सच !

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  ​भारतीय लोकतंत्र में 'आरक्षण' केवल गरीबी हटाओ कार्यक्रम नहीं, बल्कि प्रशासन और सत्ता में पिछड़े वर्गों की 'भागीदारी' का संवैधानिक वादा था। लेकिन हाल के आंकड़े और संसद में उठी आवाजें एक भयावह हकीकत बयां कर रही हैं। लाखों पद सिर्फ इसलिए खाली पड़े हैं क्योंकि चयन समितियों ने ओबीसी (OBC) और दलित उम्मीदवारों को "उपयुक्त नहीं पाया" (Not Found Suitable) । ​ 1. आंकड़ों का मायाजाल: रिक्तियों का अंबार ​संसद में पेश किए गए विभिन्न आंकड़ों के अनुसार, केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों, विशेषकर उच्च शिक्षण संस्थानों (IITs, IIMs) और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में ओबीसी के हजारों पद रिक्त हैं। ​बैकलॉग का खेल: जब भी भर्ती निकलती है, आरक्षित सीटों को यह कहकर खाली छोड़ दिया जाता है कि "योग्य उम्मीदवार नहीं मिले।" ​कट-ऑफ का हथियार: कई बार लिखित परीक्षा पास करने के बावजूद, साक्षात्कार (Interview) में बेहद कम अंक देकर उम्मीदवारों को अयोग्य घोषित कर दिया जाता है। ​ 2. 'योग्यता' (Merit) बनाम 'मानसिकता' ​जो वर्ग सदियों से खुद को जन्मजात श्रेष्ठ मानता आया है, उसने ...