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​नया नेतृत्व, पुरानी उलझनें: क्या भारत और नेपाल बदल पाएंगे अपनी कड़वाहट का इतिहास?

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   ​पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते कांच के बर्तन जैसे होते हैं—ज़रा सी असावधानी और दरार तय है। हाल ही में नेपाल की सत्ता में आए नए और युवा नेतृत्व (RSP और प्रधानमंत्री बालेन शाह) के बाद दिल्ली और काठमांडू के बीच कूटनीतिक हलचलें तेज़ हो गई हैं। नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल और पार्टी अध्यक्ष रबी लामिछाने का दिल्ली दौरा इसी सिलसिले की एक कड़ी है। ​लेकिन सवाल यह है कि क्या यह 'नया और अनुभवहीन' नेतृत्व दशकों पुराने सीमा विवादों और कूटनीतिक संवेदनशीलता को संभालने के लिए तैयार है? ​विवाद की ताज़ा वजह ​नेपाल के नए प्रधानमंत्री बालेन शाह ने अपनी संसद में एक ऐसा बयान दिया जिसने दिल्ली के नीति-निर्माताओं को चौंका दिया। उन्होंने भारत पर नेपाल की ज़मीन कब्ज़ा करने का आरोप तो लगाया ही, साथ ही यह भी कह दिया कि नेपाल इस मुद्दे पर चीन और ब्रिटेन के संपर्क में है। रही-सही कसर तब पूरी हो गई जब उन्होंने भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री से मिलने से मना कर दिया। ​कूटनीति में ऐसे कदम 'आग में घी' का काम करते हैं। हालांकि, बाद में आए नेपाली नेताओं ने "पुरानी कड़वाहट" को पीछे छोड़कर आग...

​सिक्यूरिंग इंडिया: 'माइथोकेलिप्स' का खतरा और हमारी तैयारी!

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    ​आज जब हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की बात करते हैं, तो अमेरिका और उसका सिलिकॉन वैली दुनिया से काफी आगे हैं। लेकिन हाल ही में सामने आए 'क्लॉड माइथॉस' जैसे अत्याधुनिक AI मॉडल ने एक नई और गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है—एक ऐसा खतरा जिसे 'Mythocalypse' कहा जा रहा है। ​यह सिर्फ एक तकनीकी अपडेट नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और साइबर स्पेस के लिए एक वेक-अप कॉल है। ​क्यों खतरनाक है 'माइथॉस' ? ​पारंपरिक AI मॉडल इंसानों की मदद के लिए कमियां  ढूंढते हैं, लेकिन माइथॉस इससे कहीं आगे है: ​अदृश्य कमियों की खोज: यह ऐसी सुरक्षा खामियों को ढूंढ निकालता है जो इंसानी एक्सपर्ट्स की नजरों से भी बची रही हैं। ​स्केल पर ज़ीरो-डे अटैक  ​खुद हमले करने की क्षमता: यह सिर्फ कमियां ढूंढता नहीं, बल्कि स्वायत्त रूप से कई छोटी-मोटी कमियों को मिलाकर एक बड़ा, विनाशकारी साइबर हमला तैयार कर सकता है। ​सीखने और छिपने की कला: सैंडबॉक्स टेस्टिंग में देखा गया कि जब इस मॉडल को रोका गया, तो इसने पकड़े जाने से बचने के लिए अपने तरीके बदल लिए। यानी इसमें 'सिचुएशनल अवेयरनेस' (हालात की समझ) आने लगी है...

रणनीतिक बाद की सोच: सरकार को निकोबार प्रोजेक्ट को लेकर ट्रांसपेरेंट होना चाहिए !

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     ​ग्रेट निकोबार आइलैंड पर प्रस्तावित मेगा डेवलपमेंट प्रोजेक्ट, जिसकी अनुमानित लागत अब ₹91,000 करोड़ हो चुकी है, इस समय गंभीर सवालों के घेरे में है। सरकार द्वारा इस प्रोजेक्ट को "नेशनल सिक्योरिटी" और "रणनीतिक महत्व" का हवाला देकर पर्यावरण मंजूरियों से जुड़ी जानकारियां रोकी जा रही हैं। हालांकि, प्रोजेक्ट की आर्थिक और रणनीतिक प्रासंगिकता पर खुद सरकारी विभागों के भीतर से विरोधाभासी बातें सामने आ रही हैं। ​वित्तीय विसंगतियां और रणनीतिक असमंजस ​अगस्त 2024 में फाइनेंस मिनिस्ट्री की एक विंग, 'पब्लिक इन्वेस्टमेंट बोर्ड' (PIB) ने अपनी रिपोर्ट में पाया था कि इस पोर्ट प्रोजेक्ट में "रणनीतिक मकसद की कमी थी"। ऐसा लगता है कि रक्षा मंत्रालय का "रणनीतिक" लेबल इस प्रोजेक्ट पर बाद में सिर्फ एक विचार के तौर पर जोड़ा गया ताकि शुरुआती कमियों को छुपाया जा सके। ​इसके अलावा, पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप अप्रेजल कमेटी (PPPAC) ने प्रोजेक्ट को मंज़ूरी तो दे दी, लेकिन इसके लिए ₹12,230 करोड़ की 'वायबिलिटी गैप फंडिंग' (VGF) देने से साफ़ मना कर दिया। कमेटी ने पो...

विकास की चकाचौंध में बीमार पड़ता हमारा स्वास्थ्य तंत्र !

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   ​आर्थिक महाशक्ति बनने का दंभ भरते भारत के लिए यह एक कड़वी सच्चाई है कि हमारी विशाल जीडीपी का एक बेहद मामूली हिस्सा स्वास्थ्य सेवाओं के हिस्से आता है। हालिया आंकड़े और रिपोर्ट यह साफ बताते हैं कि भारत अपनी कुल जीडीपी का करीब दो फीसदी भी स्वास्थ्य पर खर्च नहीं करता। इतनी बड़ी आबादी वाले देश के लिए यह बजटीय प्रावधान "ऊंट के मुंह में जीरे" के समान है। जब तक बुनियादी ढांचा खोखला रहेगा, तब तक आर्थिक प्रगति की इमारत कितनी मजबूत रह पाएगी, यह एक बड़ा सवाल है। ​1. योजनाएं बड़ी, पर जमीनी हकीकत अधूरी ​इसमें कोई दो राय नहीं है कि 'आयुष्मान भारत' जैसी महत्वाकांक्षी सरकारी योजनाओं ने करोड़ों गरीब परिवारों को एक सुरक्षा कवच दिया है। लेकिन केवल बीमा कवर दे देने से स्वास्थ्य संकट का समाधान नहीं हो जाता। ​अस्पतालों की कमी: ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में आज भी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) की हालत जर्जर है। ​असंतुलन: आधुनिक चिकित्सा और उपकरण चुनिंदा बड़े शहरों और निजी कॉर्पोरेट अस्पतालों तक ही सीमित हैं। ​अतिरिक्त बोझ: जेब से होने वाला खर्च (Out-of-Pocket Expenditure) आज भी आम आदमी को ...

महंगाई की आंच: दावों की हवा और जनता पर चौतरफा मार!

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      सरकार अपनी 'मुनाफाखोरी' की नीति को छोड़कर जनता को वास्तविक राहत नहीं देती!  ​पश्चिम एशिया में गहराते संकट और वैश्विक उथल-पुथल का बहाना बनाकर एक बार फिर आम जनता की जेब पर डाका डाला गया है। 'सब नियंत्रण में है' का राग अलापने वाली सरकार के तमाम दावों की कलई खुल चुकी है। पेट्रोल और डीजल की आसमान छूती कीमतों के बाद अब घरेलू रसोई गैस (LPG) के दामों में 29 रुपये प्रति सिलेंडर की ताजा बढ़ोतरी ने आम आदमी की रसोई में आग लगा दी है। सच तो यह है कि महंगाई की यह आंच अब उस स्तर पर पहुंच चुकी है, जहां से आम आदमी के लिए सम्मान से जीना भी मुहावरा बनता जा रहा है। ​खोखले दावे और समय रहते रणनीतियों की विफलता ​जब संकट की आहट पहले से थी, तो सरकार के वे ऊंचे-ऊंचे दावे कहां गए जिनमें कहा गया था कि संभावित संकट से निपटने के लिए 'समय रहते वैकल्पिक उपाय' खोज लिए जाएंगे? हॉर्मुज जलमार्ग बाधा आने से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हुई, यह एक सच्चाई है। लेकिन क्या भारत जैसे विशाल देश की ऊर्जा सुरक्षा को सिर्फ अंतरराष्ट्रीय उतार-चढ़ाव के भरोसे छोड़ दिया जाना चाहिए? ​यह जानते हुए भी कि भ...

संप्रभु ऋण का चक्रव्यूह: विकास की आड़ में आम आदमी पर बढ़ता वित्तीय बोझ !

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    ​##  1 पूंजीगत व्यय बनाम बाह्य ऋण  ​किसी भी विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए अवसंरचना  का निर्माण अनिवार्य है। इसके लिए जब घरेलू राजस्व कम पड़ता है, तो सरकारें वर्ल्ड बैंक जैसे बहुपक्षीय संस्थानों से दीर्घकालिक ऋण लेती हैं। आर्थिक शब्दावली में इसे राजकोषीय घाटे को पाटने का जरिया माना जाता है। परंतु जब बाह्य ऋण की संचयी राशि अत्यधिक बढ़ जाती है, तो देश का ऋण सेवा अनुपात बिगड़ने लगता है। इसका अर्थ यह है कि देश के राजस्व का एक बड़ा हिस्सा विकास कार्यों में लगने के बजाय केवल पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने में खर्च होने लगता है। ​## 2. कराधान का प्रतिगामी प्रभाव  ​जब सरकार पर विदेशी कर्ज और ब्याज का दबाव बढ़ता है, तो राजकोषीय समेकन के लिए राजस्व बढ़ाना अनिवार्य हो जाता है। ऐसे में सरकारें प्रत्यक्ष करों जैसे इनकम टैक्स, जो अमीरों पर ज्यादा लगता है) के बजाय अप्रत्यक्ष करों  जैसे GST, ईंधन पर वैट/एक्साइज ड्यूटी) पर निर्भरता बढ़ा देती हैं। ​आर्थिक सिद्धांत के अनुसार, अप्रत्यक्ष कर प्रतिगामी होते हैं। एक गरीब मजदूर और एक अरबपति, दोनों को एक लीटर पेट्रोल या एक पैके...

​समाज ईंट-पत्थरों से नहीं, इंसानियत से बनता है!

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  ​मामूली दिखने वाले 'असाधारण' व्यवहार !  ​आज हम जब भी किसी 'विकसित' समाज या शहर की कल्पना करते हैं, तो हमारे दिमाग में बड़ी-बड़ी इमारतें, चौड़ी सड़कें, चमचमाती गाड़ियाँ और आधुनिक योजनाएँ आती हैं। लेकिन क्या वाकई विकास का पैमाना सिर्फ यही है? ​किसी ने सच ही कहा है कि "समाज केवल सड़कों, इमारतों और योजनाओं से नहीं बनता।" ये सब तो केवल एक ढांचा हैं। उस ढांचे में प्राण फूंकने का काम हमारा और आपका व्यवहार करता है। ​छोटी-छोटी बातें, बड़े बदलाव ​एक बेहतरीन और रहने योग्य समाज की नींव सीमेंट से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे मानवीय व्यवहारों से मजबूत होती है। हम अक्सर बड़ी क्रांतियों की तलाश में रहते हैं, जबकि बदलाव की शुरुआत हमारे रोजमर्रा के इन छोटे कदमों से होती है: ​एक छोटा सा झुकाव: चिलचिलाती धूप में काम करके थके हुए किसी अनजान व्यक्ति या डिलीवरी बॉय से बस इतना पूछ लेना—"भैया, थोड़ा पानी पिएंगे?" यह सिर्फ पानी नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व को सम्मान देना है। ​पड़ोसी का संबल: जब आपका पड़ोसी घर पर न हो, तो बिना किसी स्वार्थ के उसके घर पर एक नजर रख लेना कि सब ठीक-ठाक है...