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राम लखन सिंह यादव कॉलेज में 'दही-चूड़ा' भोज का आयोजन: विमर्श और मिठास के साथ हुआ नववर्ष का अभिनंदन !

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  अनिसाबाद, पटना। नूतन वर्ष के आगमन और मकर संक्रांति के पावन पर्व की पूर्व संध्या पर, अनिसाबाद स्थित राम लखन सिंह यादव कॉलेज के प्रांगण में आत्मीयता और उत्साह का एक अनूठा संगम देखने को मिला। अवसर था—सामूहिक दही-चूड़ा भोज और शैक्षणिक बेहतरी के लिए आयोजित एक विशेष विमर्श बैठक का। शैक्षणिक संकल्पों की गूँज आयोजन की शुरुआत कॉलेज के भविष्य की रूपरेखा और पठन-पठन की सुचारू व्यवस्था पर चर्चा के साथ हुई। बैठक में मुख्य रूप से पाठ्यक्रम को समयबद्ध तरीके से पूर्ण करने और सत्र को नियमित बनाए रखने पर बल दिया गया। प्राचार्य प्रो. सुरेंद्र प्रसाद ने इस बात पर ज़ोर दिया कि सामूहिक प्रयासों से ही संस्थान को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया जा सकता है। परंपरागत स्वाद और अपनों का साथ बैठक के पश्चात कॉलेज परिवार ने बिहार की पारंपरिक संस्कृति के प्रतीक 'दही-चूड़ा' भोज का आनंद लिया। कड़कड़ाती ठंड के बीच तिलकुट की मिठास और दही-चूड़ा के मेल ने माहौल को उत्सव जैसा बना दिया। शिक्षकों और अतिथियों के बीच हँसी-ठिठोली और स्नेहपूर्ण संवाद ने यह दर्शाया कि अनुशासन के साथ-साथ आपसी सौहार्द ही किसी भी शिक्षण संस्थान की अस...

भारत की उभरती अर्थव्यवस्था: गिग इकोनॉमी का योगदान और चुनौतियाँ !

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  आज भारत की सड़कों पर दौड़ते लाखों युवा केवल सामान की डिलीवरी नहीं कर रहे, बल्कि वे भारत की सप्लाई चेन मैनेजमेंट की अंतिम कड़ी  को मजबूती दे रहे हैं। नीति आयोग के आंकड़ों के अनुसार, लगभग 2 करोड़ कामगार आज इस क्षेत्र से जुड़े हैं, जिन्हें हम 'गिग वर्कर्स' कहते हैं। 1. अर्थव्यवस्था में योगदान और विकास दर गिग इकोनॉमी भारत की आर्थिक रफ्तार को नई दिशा दे रही है। इसके प्रमुख आर्थिक प्रभाव निम्नलिखित हैं: जीडीपी में हिस्सेदारी: भारत के विशाल सप्लाई चेन मैनेजमेंट के अंतिम छोर पर काम करने वाले इन लोगों का जीडीपी के 1.25 फीसदी विकास में बड़ा हाथ है। कारोबार का विस्तार: वर्ष 2024 तक इस क्षेत्र ने 455 अरब डॉलर के कुल कारोबार में अपना योगदान दिया है। उपभोग आधारित अर्थव्यवस्था: भारत की अर्थव्यवस्था निर्यात के बजाय घरेलू उपभोग पर अधिक आधारित हो रही है। इंटरनेट और स्मार्टफोन के विस्तार ने 'क्लिक और डिलीवरी' मॉडल को सफल बनाया है, जिससे क्रय प्रबंधन सूचकांक (PMI) में भी सुधार देखा गया है। 2. गिग वर्कर्स का सामाजिक प्रभाव  गिग इकोनॉमी ने सामाजिक संरचना में भी सकारात्मक बदलाव किए हैं: रोज...

भारतीय अर्थव्यवस्था: एक आलोचनात्मक आर्थिक विश्लेषण !-प्रो प्रसिद्ध कुमार , अर्थशास्त्र ,विभाग।

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  भारत की आर्थिक स्थिति 'दोधारी तलवार' पर खड़ी है। एक ओर जहाँ घरेलू विकास दर सकारात्मक है, वहीं बाहरी कारक 'मैक्रो-इकोनॉमिक' स्थिरता के लिए जोखिम पैदा कर रहे हैं। निर्यात-आधारित विकास बनाम संरक्षणवाद: भारत ने वित्तीय वर्ष 2024-25 में विदेशी मुद्रा भंडार और निर्यात में वृद्धि दर्ज की है। हालांकि, अमेरिका की 'संरक्षणवादी' (Protectionist) नीतियां और टैरिफ बाधाएं भारत के 'तुलनात्मक लाभ'  को प्रभावित कर रही हैं। व्यापार घाटा और टैरिफ युद्ध: राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा भारतीय वस्तुओं पर लगाए गए उच्च शुल्क एक 'टैरिफ युद्ध' जैसी स्थिति पैदा कर रहे हैं। इससे भारत के प्रमुख निर्यात क्षेत्रों जैसे फार्मास्यूटिकल्स, जेम्स एंड ज्वेलरी और आईटी सेवाओं की 'प्रतिस्पर्धात्मकता' कम हो सकती है। आपूर्ति श्रृंखला  लागत-जन्य मुद्रास्फीति: रूस-यूक्रेन और मध्य पूर्व के युद्धों के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बाधित है। यदि अमेरिका रूस से तेल खरीद पर प्रतिबंध कड़े करता है, तो भारत की 'इनपुट लागत' बढ़ेगी, जिससे घरेलू अर्थव्यवस्था में 'लागत-जन्य मुद्रास्फीति...

🌟 साहेब शाही तिलकुट भंडार, खगौल 🌟"रिश्तों जैसी मिठास, शुद्धता के साथ।"

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     (50 वर्षों से आपकी सेवा में समर्पित)    सोंधी खुशबू, शुद्ध मिठास – साहेब शाही पर है सबका विश्वास।" "गया का असली स्वाद, अब खगौल की हर जुबान पर।" "सकरात का असली आनंद, साहेब शाही तिलकुट के संग।" क्या आप भी ढूंढ रहे हैं गया के मशहूर कारीगरों द्वारा निर्मित सोंधी खुशबू वाला असली तिलकुट? खगौल बाजार में साहेब शाही तिलकुट भंडार लेकर आए हैं शुद्धता और स्वाद का बेजोड़ खजाना। हमारे यहाँ अनुभवी कारीगरों द्वारा आपकी आँखों के सामने गर्म-गर्म तिलकुट तैयार किए जाते हैं। हमारी खासियतें: ✅ वैरायटी: तिलवा तिलकुट, शाही मस्का, शुद्ध घी वाला तिलकुट, बादाम पट्टी और खोवा तिलकुट। ✅ शुद्धता: बेहतरीन तिल और गुड़/चीनी का उचित मिश्रण। ✅ उचित मूल्य: थोक एवं खुदरा बिक्री के लिए सबसे विश्वसनीय स्थान। ✅ बहुमुखी सेवा: जाड़े में खास अंडे की दुकान और सालों भर ताजे फलों की उपलब्धता। सेहत का खजाना: तिल केवल स्वाद ही नहीं, सेहत भी देता है! कैल्शियम और मैग्नीशियम से भरपूर तिल हड्डियों को मजबूत बनाता है और कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ने में सहायक है। एक खास बात: हमारे यहाँ मानवता सर्वोपरि है। सकरा...

तकनीकी प्रगति और प्रशासनिक जड़ता के बीच मरते गजराज !

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   ​हाल ही में असम के नागांव जैसी घटनाओं ने एक बार फिर विकास के उस मॉडल पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जहाँ बेजुबान जानवरों की जान की कीमत 'सुपरफास्ट' रफ्तार के नीचे दब गई है। यह विडंबना ही है कि एक तरफ हम आधुनिक भारत में 'सेंसर' और 'डिजिटल इंडिया' का ढोल पीट रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ पटरियों पर हाथियों का लहू बहना बदस्तूर जारी है। ​1. कागजी नियम और नदारद जवाबदेही  जंगल से गुजरने वाली पटरियों पर 'गति सीमा'  के नियम तो हैं, लेकिन धरातल पर उनकी स्थिति शून्य है। क्या यह रेलवे प्रशासन की लापरवाही नहीं है कि संवेदनशील क्षेत्रों में भी ट्रेनें अपनी निर्धारित गति को कम नहीं करतीं? नियमों का उल्लंघन केवल चालक की गलती नहीं, बल्कि उस पूरी निगरानी प्रणाली की विफलता है जो इसे अनदेखा करती है। ​2. सेंसर और सूचना तंत्र: एक 'मॉक ड्रिल' बनकर रह गया ​आधुनिक तकनीक के नाम पर हमारे पास सेंसर तो हैं जो हाथियों की उपस्थिति की सूचना नियंत्रण कक्ष तक पहुँचाते हैं, लेकिन समस्या 'निर्णय लेने की प्रक्रिया' की सुस्ती है। जब तक सूचना एक विभाग से दूसरे विभाग तक पहुँचती है...

​आधुनिक समाज की विडंबना: जीवन से सस्ता भोजन?

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  ​आज का दौर तकनीक और गति का दौर है। हम उस युग में जी रहे हैं जहाँ बटन दबाते ही दुनिया की हर सुख-सुविधा हमारे दरवाजे पर होती है। लेकिन इस 'सुविधा' की अंधी दौड़ में हमने जो खोया है, वह है— मानवीय संवेदना। ​व्यवस्था का विरोधाभास यह कितनी शर्मनाक बात है कि जिस शहर में "10 मिनट में पिज्जा" पहुँचाने की गारंटी दी जाती है, उसी सड़क पर एक घायल व्यक्ति तड़प-तड़प कर दम तोड़ देता है क्योंकि एम्बुलेंस को पहुँचने में घंटों लग जाते हैं। यह विरोधाभास हमारी प्राथमिकताओं पर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। क्या एक व्यक्ति की भूख मिटाना, किसी की जान बचाने से ज्यादा जरूरी हो गया है? ​मानसिकता का पतन ​सड़क पर दुर्घटना होने पर लोग मदद के लिए रुकने के बजाय अपनी गति कम करना भी मुनासिब नहीं समझते। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं: ​उदासीनता: "मुझे क्या लेना-देना" वाली मानसिकता। ​कानूनी डर: पुलिसिया कार्रवाई और अदालती चक्करों का भय। ​डिजिटल संवेदनहीनता: लोग मदद करने के बजाय मोबाइल से वीडियो बनाना ज्यादा जरूरी समझते हैं। ​उपभोक्तावाद बनाम मानवता ​आज की व्यवस्था 'उपभोक्ता' को भगवान मान...

​मोह से मोक्ष तक: अमर फल का वह रहस्यमयी चक्र !

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    ​प्रथम दृश्य: श्रृंगार का चरमोत्कर्ष - ​उज्जयिनी के न्यायप्रिय और कलाप्रेमी राजा भर्तृहरि का जीवन अपनी रानी पिंगला के सौंदर्य के इर्द-गिर्द सिमटा हुआ था। रानी का रूप ऐसा था, मानो शरद पूर्णिमा का चंद्रमा धरती पर उतर आया हो। राजा के लिए पिंगला केवल पत्नी नहीं, बल्कि उनके काव्य की प्रेरणा और जीवन का एकमात्र केंद्र थीं। उन्होंने अपनी रानी की सुंदरता और उनके प्रति अपनी आसक्ति को 'श्रृंगार शतक' के रूप में पिरोया, जहाँ प्रेम की पराकाष्ठा थी। ​द्वितीय दृश्य: दैवीय उपहार और त्याग की भावना ​उसी राज्य के एक तपस्वी ब्राह्मण को उसकी निष्काम भक्ति से प्रसन्न होकर देवताओं ने एक दिव्य 'अमर फल' प्रदान किया। वह फल जिसे खा ले, वह कालजयी और सदैव युवा बना रहे। ब्राह्मण ने विचार किया, "मेरे जैसा भिक्षुक दीर्घजीवी होकर क्या करेगा? यदि हमारा राजा चिरयुवा रहे, तो प्रजा का कल्याण युगों-युगों तक होगा।" परोपकार की इसी भावना से ओतप्रोत होकर उन्होंने वह फल राजा भर्तृहरि को समर्पित कर दिया। ​तृतीय दृश्य: मोह का अंतहीन कुचक्र ​राजा ने फल हाथ में लिया, पर उनका मन पिंगला के वियोग की कल्पना...