समय की पुकार ( कविता )-प्रो प्रसिद्ध कुमार । नववर्ष 2026 मंगलमय हो!💐💐
नववर्ष तो आता रहता है, पर उम्र घटती जाती है,
टिक-टिक करती घड़ी हमें, बस यही याद दिलाती है।
न काल रुकेगा, न आयु रुकेगी, यह वश में हमारे नहीं,
पर जो करना है आज हमें, वह याद हमें रहता ही नहीं।
हम 'कल' पर सब कुछ टाल रहे, जो आज हाथ में आया है,
न पल मिलना, न उम्र दोबारा, यह कैसी मोह-माया है?
हम प्रेम-भाव से रह सकते, सद्भाव की राह चुन सकते थे,
हम नेक राह पर चलकर भी, सुंदर सपने बुन सकते थे।
पर फितरत ऐसी बदल गई, हम भेदभाव में खो बैठे,
जाति-धर्म और रंग-रूप के, कड़वे बीज हम बो बैठे।
बनावटी चेहरा ओढ़ लिया, सादगी कहीं अब खो गई है,
औरों के पथ में जाल बिछाना, फितरत अपनी हो गई है।
ऐश्वर्य की अंधी चाहत में, हम मानवता को भूल गए,
कुकर्मों की बैसाखी थामी, मर्यादा से मुँह मोड़ लिए।
न कबीर पढ़े, न रहीम पढ़े, न तर्क-ज्ञान को माना है,
कुएँ के मेंढक बन बैठे, बस खुद को ही पहचाना है।
अभी वक्त है, जाग उठें हम, सत्कर्मों की राह चलें,
इतिहास-बोध और ज्ञान की ज्योति, अपने भीतर हम ढलें।
समय की रेत फिसलने से पहले, इंसान ज़रा तू जाग जा,
नफ़रत के इस अंधेरे से, उजाले की ओर तू भाग जा।

Very nice 👍
ReplyDelete