शब्द-सामर्थ्य: जहाँ रिक्तता दरिद्रता बन जाती है.

 


अल्प शब्द मति क्षीणता, बुद्धि का संताप।

शब्द-धनी जो हो नहीं, व्यर्थ ज्ञान का जाप॥ 

अक्सर कहा जाता है कि संसार में सबसे बड़ा अभाव धन का है, किंतु सत्य इसके विपरीत है। आर्थिक दरिद्रता व्यक्ति के जीवन को कठिन बना सकती है, लेकिन 'शब्दों की दरिद्रता' उसके व्यक्तित्व को ही बौना कर देती है। विशेषकर एक बुद्धिजीवी के लिए शब्दों का अभाव केवल मौन नहीं, बल्कि उसके वैचारिक दिवालिएपन का संकेत है।

शब्द ही सार हैं

बुद्धिजीवी वह है जो समाज को दिशा दे, जो जटिल भावनाओं को सरल अर्थ प्रदान करे। यदि उसके पास शब्दों का अभाव है, तो वह उस जौहरी की तरह है जिसके पास पारखी नजर तो है, पर दिखाने के लिए कोई रत्न नहीं। शब्द हमारे विचारों के वाहन हैं; यदि वाहन ही अक्षम हो, तो विचार कभी गंतव्य तक नहीं पहुँच सकते।

एक बुद्धिजीवी की गरिमा

एक प्रबुद्ध व्यक्ति का आभूषण उसकी भाषा होती है। जब हम शब्दों के चयन में कंजूसी करते हैं या सतही शब्दावली का प्रयोग करते हैं, तो हम अपनी बौद्धिक चेतना के साथ अन्याय करते हैं। ज्ञान का संचय तब तक अधूरा है, जब तक उसे व्यक्त करने के लिए एक समृद्ध शब्द-कोष न हो। 


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