26 करोड़ का पुल, 96 घंटे की 'उम्र': बिहार में विकास या भ्रष्टाचार का नया रिकॉर्ड?

    


​'इंजीनियरिंग का कमाल' कहिए या 'भ्रष्टाचार की मिसाल'—बक्सर के इटाढ़ी गुमटी का रोड ओवरब्रिज उद्घाटन के चौथे दिन ही हांफ गया. जनता के टैक्स के 26 करोड़ रुपये नदी में नहीं, सीधे गड्ढे में बह गए.

​उद्घाटन की चमक, चार दिन में धमक

​अभी पुल पर लगी उद्घाटन की पट्टी का पेंट भी ठीक से नहीं सूखा होगा कि पाया नंबर 5 के पास की जमीन धंस गई. जिस ओवरब्रिज को बक्सर की जनता के लिए 'लाइफलाइन' बनना था, वह 96 घंटे के भीतर ही 'डेडलाइन' के करीब पहुंच गया. प्रशासन ने आनन-फानन में ट्रैफिक रोक दिया है, ताकि कोई बड़ा हादसा न हो. लेकिन सवाल यह है कि इस प्रशासनिक मुस्तैदी की नौबत ही क्यों आई? क्या पुल का निर्माण सिर्फ फीता काटने और नेताओं की तस्वीरों के लिए किया गया था?

​प्राक्कलन (Estimate) मांगो तो 'रंगदारी', सच कहो तो 'बाधा'

​आज बिहार में लोकहित के कामों की एक कड़वी हकीकत बन चुकी है.

​अगर जागरूक जनता या स्थानीय लोग काम की गुणवत्ता पर सवाल उठाएं, तो उन्हें 'विकास विरोधी' ठहरा दिया जाता है.

​अगर कोई नागरिक योजना का प्राक्कलन (Estimate) मांग ले कि काम नियम और नक्शे के मुताबिक हो रहा है या नहीं, तो ठेकेदार और अफसरों का सबसे अचूक हथियार बाहर आता है—"सरकारी काम में बाधा डालना" या "रंगदारी मांगना" का मुकदमा.

​जनता के पैसों से बनने वाले पुल का ब्योरा मांगना अपराध कब से हो गया? जब पारदर्शी तरीके से काम करने की जिम्मेदारी व्यवस्था की है, तो सच छुपाने के लिए मुकदमों का खौफ क्यों दिखाया जाता है? साफ है, जब नीयत में खोट हो, तभी पारदर्शिता से डर लगता है.

​टेंडर का मतलब सिर्फ मुनाफा, लोकहित गया तेल लेने

​पुराने जमाने में सरकारी निर्माण कार्य लोकहित (Public Welfare) को ध्यान में रखकर किए जाते थे, ताकि आने वाली पीढ़ियां उसका लाभ ले सकें. लेकिन आज का कड़वा सच यह है कि टेंडर का मतलब सिर्फ और सिर्फ अंधा मुनाफा रह गया है.

​कमिशनखोरी का गणित: ऊपर से नीचे तक बंटने वाले पीसी (Percentage Commission) के चक्कर में निर्माण सामग्री से सीमेंट-बालू गायब हो जाता है और बचता है सिर्फ मिट्टी जैसा ढांचा. नतीजा? 26 करोड़ का प्रोजेक्ट चार दिन भी नहीं टिक पाता.

​ठेकेदारों और इंजीनियरों के इस गठजोड़ को न जनता की जान की परवाह है और न देश की संपत्ति की. उनके लिए यह पुल नहीं, बल्कि कमाई का एक जरिया था, जो अपना काम पूरा होते ही ढह गया.

​आखिर जिम्मेदारी किसकी?

​घटना के बाद हर बार की तरह एक जांच कमेटी बैठेगी, कुछ लीपापोती होगी, और मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा. लेकिन असल सवाल वहीं का वहीं खड़ा रहेगा:

​क्या उस ठेकेदार और ब्लैकलिस्टेड कंपनियों पर कार्रवाई होगी, जिन्होंने घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया?

​क्या उन सरकारी इंजीनियरों की संपत्ति की जांच होगी, जिन्होंने इस खोखले पुल को 'फिट' होने का सर्टिफिकेट दिया?

​क्या सरकार जनता को यह गारंटी देगी कि भविष्य में प्राक्कलन मांगने पर किसी नागरिक को प्रताड़ित नहीं किया जाएगा?

​यह सिर्फ एक ओवरब्रिज का धंसना नहीं है, यह हमारी व्यवस्था, ईमानदारी और लोकहित के दावों का धंसना है. बक्सर की जनता आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है, और उनका यह गुस्सा पूरी तरह जायज है. जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसे ही करोड़ों रुपये मलबे में तब्दील होते रहेंगे.

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