वफादारी बनाम योग्यता: शासन व्यवस्था में विशेषज्ञों की भूमिका और भारतीय प्रधानमंत्रियों का इतिहास!
जवाहरलाल नेहरू और होमी भाभा, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी और एमएस स्वामीनाथन , इंदिरा-राजीव गांधी और सैम पित्रोदा, नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह ..
भारतीय लोकतंत्र और शासन व्यवस्था में हमेशा से एक बुनियादी यक्ष प्रश्न रहा है: वफादारी या योग्यता ? इतिहास गवाह है कि जब भी भारत के प्रधानमंत्रियों ने राजनीतिक वफादारी से ऊपर उठकर विषय-विशेषज्ञों और पेशेवरों (Professionals) पर भरोसा किया और उन्हें काम करने की खुली छूट दी, देश ने अभूतपूर्व और ऐतिहासिक उपलब्धियां हासिल की हैं।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: जब प्रधानमंत्रियों ने विशेषज्ञों को चुना
भारत के विकास की नींव रखने में कई प्रधानमंत्रियों ने राजनीतिक जोखिम उठाकर भी सही प्रतिभाओं को सही जगह दी:
जवाहरलाल नेहरू और होमी भाभा: साल 1948 में कैम्ब्रिज से प्रशिक्षित एक भौतिक विज्ञानी (होमी भाभा) ने नेहरू को आश्वस्त किया कि नए देश को एक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की आवश्यकता है। नेहरू ने बिना किसी राजनीतिक लाभ के परमाणु ऊर्जा आयोग को अपने कार्यालय के अधीन रखा और भाभा को पूरा राजनीतिक संरक्षण दिया। इसी तरह विक्रम साराभाई के प्रयासों से अंतरिक्ष अनुसंधान कार्यक्रम की शुरुआत हुई।
लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी और एमएस स्वामीनाथन: शास्त्री और इंदिरा गांधी ने सी. सुब्रमण्यम को खुली छूट दी, जिन्होंने आगे चलकर एम. एस. स्वामीनाथन के साथ मिलकर देश में 'हरित क्रांति' की शुरुआत की और भारत को खाद्य सुरक्षा के मामले में आत्मनिर्भर बनाया।
इंदिरा-राजीव गांधी और सैम पित्रोदा: दूरसंचार क्षेत्र में स्थापित पुरानी व्यवस्था के विरोध के बावजूद सैम पित्रोदा को लाया गया, जिससे देश में दूरसंचार क्रांति की शुरुआत हुई।
नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह: 1991 के ऐतिहासिक आर्थिक सुधारों का श्रेय नरसिम्हा राव को जाता है, जिन्होंने अल्पसंख्यक सरकार चलाने के बावजूद राजनीतिक जोखिम खुद लिया और मनमोहन सिंह व अर्थशास्त्रियों की एक छोटी टीम को नीतियां बनाने की पूरी स्वतंत्रता दी।
अटल बिहारी वाजपेयी, यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी: वाजपेयी सरकार ने भी इसी दृष्टिकोण को अपनाते हुए यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी और 'गोल्डन क्वाड्रिलेटरल' (स्वर्ण चतुर्भुज) के इंजीनियरों को आगे बढ़ाया।
मनमोहन सिंह और नंदन नीलेकणी: मनमोहन सिंह ने राजनीतिक और नौकरशाही के विरोध के बावजूद नंदन नीलेकणी को कैबिनेट रैंक देकर 'आधार' परियोजना को साकार किया।
वर्तमान परिदृश्य और चुनौतियाँ
नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भी 'इंडिया स्टैक' का विस्तार और बड़े पैमाने पर कल्याणकारी योजनाओं का वितरण इसी विशेषज्ञता-संचालित दृष्टिकोण का उदाहरण है। लेकिन वर्तमान में देश के सामने कई गंभीर आर्थिक और संस्थागत चुनौतियाँ हैं, जिन्हें केवल चुनावी जीत के समीकरणों से हल नहीं किया जा सकता:
आर्थिक चिंताएँ: रुपया ऐतिहासिक रूप से कमजोर हुआ है, विदेशी निवेशकों ने चालू वर्ष में 20 बिलियन डॉलर से अधिक की पूंजी निकाली है, विकास दर के अनुमानों में कटौती की गई है और अर्थव्यवस्था को लेकर सरकार का संवाद अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में नहीं है।
संस्थागत विफलताएँ: राष्ट्रीय स्तर की चिकित्सा प्रवेश परीक्षा (NEET) में हालिया विसंगतियाँ, CBSE की मार्किंग प्रणाली में खामियाँ और तकनीकी क्षेत्रों (जैसे 'इंडिया एआई मिशन' और सेमीकंडक्टर फाउंड्री में देरी) में प्रतिभाओं की कमी यह दर्शाती है कि स्केल और दांव के हिसाब से हमारी संस्थाओं का पुनर्गठन नहीं हुआ है।
वफादारी के दो रूप: 'सच्ची निष्ठा' बनाम 'दरबारी नियम'
लेखक के अनुसार, नीतिगत निर्णयों के बाद मंत्रियों और नौकरशाहों द्वारा कैबिनेट की बात मानना एक आवश्यक वफादारी है, जो शासन को सुचारू बनाती है। लेकिन वैचारिक रूप से स्वतंत्र 'निर्णय के कक्ष' में प्रवेश करने से पहले ही बिना सोचे-समझे हर बात पर सहमत हो जाने की शर्त रखना 'दरबारी नियम' है, जो शासन को भ्रष्ट और कमजोर बनाता है।
हमारा इतिहास और महाकाव्य भी यही सिखाते हैं। महाभारत में राजा धृतराष्ट्र ने बगल के कक्ष में बैठे बुद्धिमान विदुर और भीष्म की सही व कड़वी सलाह सुनने के बजाय शकुनि जैसे चाटुकारों (Flatterers) को प्राथमिकता दी। परिणाम स्वरूप, वह साम्राज्य नहीं बच सका।

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