सुशासन का मुखौटा और भ्रष्टाचार का तांडव: जब फुलवारी अंचल में ‘कलम की मार’ भी कम पड़ जाए!

   निगरानी के हत्थे चढा फुलवारी का राजस्व कर्मचारी.


​बिहार में 'सुशासन' शब्द अब केवल सरकारी विज्ञापनों और भाषणों की शोभा बढ़ाने तक सीमित रह गया है। जमीन पर हकीकत यह है कि जनता भ्रष्टाचारियों के मकड़जाल में कराह रही है और व्यवस्था अपनी आँखों पर पट्टी बांधे बैठी है। ताजा मामला फुलवारी शरीफ (पटना) के मैनपुर अंडा पंचायत का है, जहाँ निगरानी विभाग ने राजस्व कर्मचारी राणा रन विजय सिंह को डेढ़ लाख रुपये की रिश्वत लेते रंगे हाथों धर दबोचा। बसंत चक निवासी अजीत सिंह की शिकायत पर हुई इस कार्रवाई ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि अंचल कार्यालयों में बिना 'चढ़ावे' के पत्ता भी नहीं हिलता।

​धन की पिपासा और न्याय का कत्ल

​भ्रष्टाचारियों के भीतर धन कमाने की पिपासा इस कदर बढ़ चुकी है कि उन्हें न कानून का खौफ है और न ही जनता की हाय का डर। इनके लिए पैसे का वजन ही सही और गलत का पैमाना तय करता है। मोटी रकम मिलते ही ये चंद मिनटों में गलत काम को सही और सही काम को गलत साबित कर देते हैं। जमीन के कागजातों में हेराफेरी करना तो जैसे फुलवारी अंचल के रग-रग में बस चुका है। कैसे किसी की पुश्तैनी जमीन को उलट-फेर करके रतों-रात नई संपत्ति खड़ी कर ली जाती है, यह कला सीखनी हो तो कोई फुलवारी अंचल आकर देखे।

​विडंबना देखिए: यहाँ जालसाजी करने वाले, फर्जीवाड़ा करने वाले चैन की बंसी बजाते हैं और जो असली पीड़ित है, उसे ही खुद को बेगुनाह साबित करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ता है। साक्ष्य जुटाते-जुटाते पीड़ित की चप्पलें घिस जाती हैं, लेकिन न्याय की उम्मीद धूमिल ही रहती है।

​खाकी और खाऊ-कमाऊ नीति का गठजोड़

​यह बीमारी सिर्फ राजस्व विभाग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें पुलिस प्रशासन में भी उतनी ही गहरी हैं। मैं खुद इस पंचायत का निवासी हूँ और इस भ्रष्ट तंत्र का भुक्तभोगी रहा हूँ। जमीन के ही एक मामले में फुलवारी के तत्कालीन थाना प्रभारी ने पैसे के चक्कर में मेरे साथ घोर नाइंसाफी की थी। वर्दी का रसूख दिखाकर वे सच को दबाना चाहते थे।

​लेकिन वे भूल गए थे कि सच्चाई की आवाज को हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता। मेरी 'कलम की मार' ऐसी पड़ी कि जो साहब डीएसपी (DySP) बनने का ख्वाब देख रहे थे, वे प्रभारी रहते ही सस्पेंड कर दिए गए। यह इस बात का प्रमाण है कि भले ही सिस्टम सड़ चुका हो, लेकिन जब एक आम नागरिक अपनी आवाज बुलंद करता है, तो बड़े से बड़े भ्रष्टाचारी की कुर्सी हिल जाती है।

​सरकार का खत्म होता इकबाल

​सरकार चाहे जितने भी दावे कर ले कि सूबे में कानून का राज है, लेकिन जनता की कराह और हर मोड़ पर मांगी जाने वाली घूस कुछ और ही कहानी बयां करती है। जब सरेआम पंचायत भवनों में लाखों की डील हो रही हो, तो यह मानने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि सरकार का इकबाल अब खत्म हो चुका है। प्रशासनिक तंत्र पूरी तरह बेलगाम है।

​अंततः: ब्याज सहित चुकाना पड़ता है मूल्य

​निगरानी विभाग की इस कार्रवाई से भ्रष्टाचारियों को एक सबक जरूर मिलना चाहिए। हेराफेरी और घूसखोरी की बुनियाद पर महल खड़े करने वाले यह भूल जाते हैं कि कुदरत का न्याय देर से ही सही, लेकिन दुरुस्त आता है। आज जो डेढ़ लाख रुपये की गड्डियां गिन रहे थे, कल वे सलाखों के पीछे अपनी किस्मत को रोएंगे। पाप की कमाई का यह हिसाब प्रकृति हमेशा 'ब्याज सहित' वसूल करती है।

​अंडा पंचायत की यह घटना महज़ एक बानगी है। सवाल यह है कि आखिर कब तक जनता को अपने ही हक के लिए इन दीमकों के आगे गिड़गिड़ाना पड़ेगा? जब तक अंचल से लेकर थाने तक की इस पूरी 'खाऊ-कमाऊ' चेन को ध्वस्त नहीं किया जाता, तब तक सुशासन का हर दावा खोखला ही रहेगा।

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