​जनसांख्यिकीय बदलाव की आड़ में बहुसंख्यकवाद की राजनीति!

   ​एकतरफा उच्च-स्तरीय समिति का गठन ! 

​भारत इस समय एक महत्वपूर्ण जनसांख्यिकीय संक्रमण  के दौर से गुजर रहा है। देश के अधिकांश हिस्सों में प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर  या उससे भी नीचे आ चुकी है। ऐसे समय में जब देश को युवाओं के लिए रोजगार जुटाने और भविष्य में बूढ़ी होने वाली आबादी की देखभाल पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, तब सरकार का पूरा विमर्श 'अवैध घुसपैठ' और 'अप्राकृतिक जनसांख्यिकीय परिवर्तन' पर आकर टिक गया है।

​एकतरफा उच्च-स्तरीय समिति का गठन! 


​हाल ही में सरकार द्वारा 'जनसांख्यिकीय परिवर्तन पर उच्च-स्तरीय समिति' का गठन किया गया है। गौर करने वाली बात यह है कि इस समिति के कार्यक्षेत्र  में जनसांख्यिकीय चुनौतियों से निपटने के बजाय 'अवैध अप्रवासन' और 'सीमा प्रबंधन' को प्राथमिकता दी गई है। आश्चर्यजनक रूप से, इस पूरी समिति में एक भी पेशेवर जनसांख्यिकीविद् शामिल नहीं है; बल्कि इसके नीति-नियंताओं में सेवानिवृत्त न्यायाधीश, नौकरशाह और पुलिस अधिकारी शामिल हैं। यह ढांचा ही इसकी मंशा पर सवाल उठाता है।

​'घुसपैठ' के नैरेटिव का राजनीतिक उपयोग

​पिछले कुछ वर्षों में एक ऐसा राजनीतिक विमर्श खड़ा किया गया है कि बांग्लादेश से आने वाले मुस्लिम प्रवासी सीमावर्ती जिलों पर कब्जा कर रहे हैं और चुनावी नतीजों को प्रभावित कर रहे हैं। असम और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के चुनावों में इस नैरेटिव का भरपूर राजनीतिक लाभ उठाया गया। अब इस राज्य-स्तरीय रणनीति को समिति की सिफारिशों के माध्यम से एक राष्ट्रव्यापी अभियान का रूप देने की तैयारी चल रही है।

​आर्थिक वास्तविकता बनाम नैरेटिव

​तथ्य यह है कि बड़े पैमाने पर हो रहे अवैध अप्रवासन का कोई पुख्ता आधिकारिक डेटा उपलब्ध नहीं है। विश्व बैंक और यूएनडीपी के आंकड़े बताते हैं कि हाल के दशकों में बांग्लादेश ने उल्लेखनीय आर्थिक प्रगति की है। बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति आय की विकास दर भारत से भी तेज रही है, और दोनों देशों का मानव विकास सूचकांक  लगभग समान है। ऐसे में, बांग्लादेश से भारत में बड़े पैमाने पर आर्थिक तंगी के कारण पलायन होने का कोई आर्थिक तर्क या सबूत नहीं दिखाई देता।

​धार्मिक प्रजनन दर के भ्रामक प्रचार की हकीकत

​बहुसंख्यक समुदाय में यह डर बैठाया जा रहा है कि मुस्लिम आबादी हिंदुओं से आगे निकल जाएगी, जबकि जमीनी हकीकत इसके उलट है। हालांकि ऐतिहासिक रूप से मुस्लिम समुदाय में प्रजनन दर थोड़ी अधिक रही है (जिसके पीछे मुख्य कारण खराब आर्थिक स्थिति और शिक्षा की कमी है), लेकिन हाल के वर्षों में मुस्लिम महिलाओं में प्रजनन दर बहुत तेजी से गिरी है।

​आज दोनों समुदायों के बीच यह अंतर लगभग समाप्त होने की कगार पर है। उदाहरण के लिए, केरल और कश्मीर जैसे क्षेत्रों में मुस्लिम महिलाओं की प्रजनन दर बिहार या उत्तर प्रदेश की हिंदू महिलाओं की तुलना में काफी कम है। यह साबित करता है कि प्रजनन दर का संबंध धर्म से नहीं, बल्कि गरीबी, स्वास्थ्य सुविधाओं और शिक्षा के स्तर से है।

अदरिंग' और संस्थागत भेदभाव का खतरा

​इस समिति का वास्तविक उद्देश्य जनसांख्यिकीय संकट का समाधान ढूंढना नहीं, बल्कि 'अवैध अप्रवासियों की पहचान और निर्वासन' के नाम पर अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों को निशाना बनाना प्रतीत होता है। जब सरकारी तंत्र को "स्थायी परिचालन तंत्र" स्थापित करने का निर्देश दिया जाता है, तो यह इतिहास के काले पन्नों की याद दिलाता है। जनसांख्यिकी के नाम पर अल्पसंख्यकों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक बहिष्कार को संस्थागत रूप देना देश के सामाजिक ताने-बाने के लिए एक गंभीर चेतावनी है। 

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