निकोबार में चुनाव बनाम परंपरा: स्वशासन की आत्मा को बचाने की चुनौती!

  


​अंडमान और निकोबार प्रशासन द्वारा जनजातीय परिषदों  के लिए प्रस्तावित नए चुनावी नियम (२०२६) ने द्वीप समूह के मूल निवासी निकोबारी समुदाय के भीतर एक गंभीर वैचारिक बहस को जन्म दे दिया है। प्रशासन का तर्क है कि देश के बाकी हिस्सों की तरह यहां भी ५-वर्षीय औपचारिक चुनावी प्रक्रिया, निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन और महिलाओं के लिए आरक्षण लागू किया जाना चाहिए। पहली नजर में यह आधुनिक लोकतंत्र का एक स्वागत योग्य कदम लग सकता है, परंतु इसके पीछे छिपी जमीनी चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

​निकोबारी समुदाय सदियों से अपनी पारंपरिक सर्वसम्मति-आधारित स्वशासन प्रणाली के तहत संचालित होता आ रहा है, जहाँ गांवों के कप्तानों का चयन किसी जटिल नौकरशाही तंत्र के बजाय आपसी सहमति और सामुदायिक बैठकों से होता है। जनजातीय नेताओं का यह डर पूरी तरह स्वाभाविक है कि इस नई व्यवस्था से उनका पारंपरिक ताना-बाना और निर्णय लेने की स्वायत्तता छिन्न-भिन्न हो जाएगी। शासन का यह 'आधुनिकीकरण' वास्तविक सशक्तीकरण करने के बजाय व्यवस्था का 'नौकरशाहीकरण' अधिक कर सकता है।

​इसके अलावा, इस जल्दबाजी के पीछे एक बड़ा कारण ग्रेट निकोबार में जारी ₹७१,००० करोड़ की विशाल मेगा-प्रोजेक्ट (कंटेनर पोर्ट, हवाई अड्डा) भी माना जा रहा है, जिसका वर्तमान पारंपरिक नेतृत्व विरोध कर रहा है। ऐसे में समुदाय को अंदेशा है कि प्रशासन एक ऐसी आज्ञाकारी परिषद का गठन करना चाहता है जो इस परियोजना को बिना किसी बाधा के मंजूरी दे दे।

​लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ केवल मतपेटी या वोटिंग मशीन नहीं है, बल्कि स्थानीय संस्कृति और स्वदेशी शासन प्रणाली की संप्रभुता का सम्मान करना भी है। प्रशासन को चाहिए कि वह १५ जून की समयसीमा के भीतर केवल औपचारिक आपत्तियां न मांगे, बल्कि जनजातीय समाज के साथ एक गहरा और पारदर्शी संवाद स्थापित करे, ताकि आधुनिक समावेशिता और पारंपरिक मूल्यों के बीच एक संतुलित रास्ता निकाला जा सके।

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