व्यवस्था की नाकामी से उपजा बाजार! -प्रो प्रसिद्ध कुमार।
अक्षमता की अर्थव्यवस्था !
भारत में बुनियादी सरकारी और सार्वजनिक सुविधाओं (बिजली, पानी, हवा, शिक्षा) की कमी ने एक नए प्रकार के बाजार को जन्म दिया है। इसे 'अक्षमता की अर्थव्यवस्था' (Inefficiency Economy) कहते हैं। यहाँ अवसर विकास से नहीं, बल्कि व्यवस्था की नाकामियों से पैदा होते हैं।
पूरक बनाम सुधारात्मक खपत: यहाँ दो तरह के खर्चों में अंतर हैं:
आकांक्षी (Aspirational): जो जीवन को बेहतर बनाते हैं (जैसे रेफ्रिजरेटर या स्मार्टफोन)।
क्षतिपूरक (Compensatory): जो किसी कमी को पूरा करने के लिए किए जाते हैं (जैसे इनवर्टर, वॉटर फिल्टर, एयर प्यूरिफायर)। ये उत्पाद असल में किसी बुनियादी विफलता (बिजली-पानी की कमी, प्रदूषण) को छिपाने का पैचवर्क (मरम्मत) मात्र हैं।
अक्षमता की स्वीकृति और भ्रम: समय के साथ लोग इन कमियों को सामान्य मान लेते हैं। एक नए घर में इनवर्टर या प्यूरिफायर होना अब विलासिता नहीं, बल्कि मजबूरी बन चुका है। विज्ञापन और बाजार इस 'मरम्मत' को एक 'अपग्रेड' या प्रगति के रूप में बेचते हैं, जिससे हमें अपनी जेब से अतिरिक्त टैक्स जैसा महसूस नहीं होता।
एक नई असमानता और राजनीतिक उदासीनता: सक्षम मध्यम वर्ग इन निजी विकल्पों (जैसे कोचिंग क्लासेस, निजी गाड़ियां) को खरीदकर चुपचाप व्यवस्था से बाहर निकल जाता है। चूंकि वे शिकायत करना बंद कर देते हैं, इसलिए राजनेताओं और मीडिया के लिए ये कभी बड़े मुद्दे नहीं बनते।
बड़ा प्रभाव: जो लोग इसे वहन नहीं कर सकते ,वे सीधे इस जमीनी और कड़वी हकीकत का सामना करने के लिए मजबूर हैं, जिससे समाज में एक नई गहरी असमानता पैदा हो रही है।

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