'अशुद्ध' सम्राट और उनकी 'अद्भुत' शिक्षा नीति: एक विश्लेषण !
लोकतंत्र में शब्दों का अपना वजन होता है। खासकर जब कोई व्यक्ति सत्ता के गलियारों में ऊंचे पद पर बैठा हो, तो उसके मुख से निकले शब्द केवल ध्वनि तरंगें नहीं होते, बल्कि वे एक जिम्मेदारी भी होते हैं। लेकिन जब उसी जिम्मेदारी के पद पर बैठा व्यक्ति खुद शब्दों के उच्चारण के साथ 'कुश्ती' लड़ता दिखे, तो आम जनता का चिंतित होना स्वाभाविक है।
हाल ही में बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का कैमूर दौरा सुर्खियों में रहा। भाषण देना एक कला है, और लिखित भाषण पढ़ना तो और भी आसान माना जाता है—बशर्ते आप साक्षर हों! पर सम्राट जी ने इस धारणा को भी चुनौती दी है।
लिखित सामने, फिर भी उच्चारण 'बदनाम'
सम्राट जी के भाषण में शब्दों का जो हाल हुआ, उसे सुनकर व्याकरण के देवता भी अपना सिर पीट रहे होंगे। 'मुंडेश्वरी' को ' मुंडेश्री' (Mundeshri) कहना, 'जीर्णोद्धार' को 'जिरनेधर्' (Jirnedhar) में तब्दील कर देना और 'आश्वस्त' को ' अस्वस्थ ' (Asvsthy) जैसा कुछ बना देना—यह तो केवल उच्चारण की गलती नहीं, बल्कि भाषा के साथ 'सर्जिकल स्ट्राइक' है।
जब शब्द सामने लिखे हों और उन्हें पढ़ने के लिए चश्मे की नहीं, बल्कि थोड़ी सी एकाग्रता की जरूरत हो, तब भी ऐसी गलतियां यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि हम किन हाथों में अपनी बागडोर सौंप रहे हैं। एक साधारण पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी कम से कम शब्दों का सही स्वरूप तो पहचान ही लेता है, लेकिन यहाँ तो मामला 'उच्चारण-विहीन' प्रतीत होता है।
शिक्षा नीति या हास्य-कथा?
उच्चारण की इस 'विद्वता' के बाद, सम्राट जी की शैक्षिक दूरदर्शिता पर आते हैं। कुछ समय पहले उनका वह बयान याद है, जिसमें वे बिहार में 'मैथ यूनिवर्सिटी', 'केमिस्ट्री यूनिवर्सिटी' और 'फिजिक्स यूनिवर्सिटी' खोलने की वकालत कर रहे थे?
यह सुनकर लगा कि शायद हम किसी कॉमेडी फिल्म का स्क्रिप्ट पढ़ रहे हैं। विषयों के आधार पर यूनिवर्सिटी खोलना! क्यों न 'पाई' (π) के लिए एक अलग यूनिवर्सिटी और 'समीकरण' के लिए एक अलग विश्वविद्यालय खोल दिया जाए? ऐसे सुझाव केवल 'हास्यास्पद' ही नहीं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि राज्य के भविष्य के लिए नीतियां बनाने वालों का होमवर्क कितना कच्चा है।
आत्मसात करने की जरूरत
जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों के ज्ञान और आचरण को समाज 'आत्मसात' (absorb) करता है। बच्चे उन्हें देखते हैं, युवा उन्हें फॉलो करते हैं। जब एक नेता सार्वजनिक मंच पर भाषा और ज्ञान का अपमान करता है, तो वह अनजाने में आने वाली पीढ़ी को यह संदेश देता है कि "पढ़े-लिखे होने से ज्यादा जरूरी 'दबंग' होना है"।
बिहार की पावन धरती, जहाँ नालंदा और विक्रमशिला जैसी ज्ञान की परंपरा रही हो, वहाँ आज के कर्णधारों से कम से कम 'शुद्ध उच्चारण' और 'तर्कसंगत शिक्षा नीति' की उम्मीद करना क्या बहुत ज्यादा है?
खैर, सम्राट जी से बस इतना ही कहना है—भाषण पढ़ने के लिए कागज पर अक्षरों को छाप लेना ही काफी नहीं होता, उन्हें पढ़ने के लिए थोड़ी साक्षरता और समझदारी की भी आवश्यकता होती है। अगली बार, भाषण पढ़ने से पहले किसी शिक्षक से थोड़ा अभ्यास जरूर कर लीजिएगा!

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