विकास की चकाचौंध में बीमार पड़ता हमारा स्वास्थ्य तंत्र !
आर्थिक महाशक्ति बनने का दंभ भरते भारत के लिए यह एक कड़वी सच्चाई है कि हमारी विशाल जीडीपी का एक बेहद मामूली हिस्सा स्वास्थ्य सेवाओं के हिस्से आता है। हालिया आंकड़े और रिपोर्ट यह साफ बताते हैं कि भारत अपनी कुल जीडीपी का करीब दो फीसदी भी स्वास्थ्य पर खर्च नहीं करता। इतनी बड़ी आबादी वाले देश के लिए यह बजटीय प्रावधान "ऊंट के मुंह में जीरे" के समान है। जब तक बुनियादी ढांचा खोखला रहेगा, तब तक आर्थिक प्रगति की इमारत कितनी मजबूत रह पाएगी, यह एक बड़ा सवाल है।
1. योजनाएं बड़ी, पर जमीनी हकीकत अधूरी
इसमें कोई दो राय नहीं है कि 'आयुष्मान भारत' जैसी महत्वाकांक्षी सरकारी योजनाओं ने करोड़ों गरीब परिवारों को एक सुरक्षा कवच दिया है। लेकिन केवल बीमा कवर दे देने से स्वास्थ्य संकट का समाधान नहीं हो जाता।
अस्पतालों की कमी: ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में आज भी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) की हालत जर्जर है।
असंतुलन: आधुनिक चिकित्सा और उपकरण चुनिंदा बड़े शहरों और निजी कॉर्पोरेट अस्पतालों तक ही सीमित हैं।
अतिरिक्त बोझ: जेब से होने वाला खर्च (Out-of-Pocket Expenditure) आज भी आम आदमी को कर्ज के जाल में धकेल रहा है।
2. विकासशील देशों की दौड़ में हम कहां?
यदि हम अन्य विकासशील या ब्रिक्स (BRICS) देशों से तुलना करें, तो स्वास्थ्य पर सार्वजनिक खर्च के मामले में भारत काफी पीछे छूट जाता है। जब तक हम इस खर्च को बढ़ाकर वैश्विक मानकों के अनुरूप नहीं लाते, तब तक वैश्विक मंच पर खुद को एक स्वस्थ महाशक्ति के रूप में स्थापित करना महज एक कल्पना ही रहेगा।
3. अमर्त्य सेन का दृष्टिकोण: सामाजिक प्रगति के बिना आर्थिक विकास अधूरा
नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन लंबे समय से यह बात दोहराते रहे हैं कि आर्थिक प्रगति तब तक बेमानी है, जब तक कि वह सामाजिक प्रगति में न बदले। स्वास्थ्य और शिक्षा किसी भी देश के विकास के दो मुख्य स्तंभ होते हैं।
"एक बीमार और कुपोषित कार्यबल के दम पर कोई भी देश लंबी रेस का घोड़ा नहीं बन सकता।"
भारत को आज टुकड़ों में काम करने वाली योजनाओं के बजाय एक एकीकृत कार्ययोजना (Integrated Action Plan) की सख्त जरूरत है, जहां स्वास्थ्य को नागरिक का बुनियादी अधिकार माना जाए, न कि कोई उपकार।
आगे की राह
यदि भारत को वाकई एक विकसित राष्ट्र बनना है, तो स्वास्थ्य बजट को युद्ध स्तर पर बढ़ाना होगा। हमें केवल 'इलाज' (Curative Healthcare) पर नहीं, बल्कि 'बचाव और बुनियादी ढांचे' (Preventive & Primary Healthcare) पर ध्यान केंद्रित करना होगा। नीतियां कागजों पर आकर्षक हो सकती हैं, लेकिन उनकी सफलता इस बात से तय होगी कि देश के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति को समय पर और मुफ्त इलाज मिल पा रहा है या नहीं। अब समय आ गया है कि हम स्वास्थ्य को राजनीतिक और आर्थिक विमर्श के केंद्र में लाएं।

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