नया नेतृत्व, पुरानी उलझनें: क्या भारत और नेपाल बदल पाएंगे अपनी कड़वाहट का इतिहास?
पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते कांच के बर्तन जैसे होते हैं—ज़रा सी असावधानी और दरार तय है। हाल ही में नेपाल की सत्ता में आए नए और युवा नेतृत्व (RSP और प्रधानमंत्री बालेन शाह) के बाद दिल्ली और काठमांडू के बीच कूटनीतिक हलचलें तेज़ हो गई हैं। नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल और पार्टी अध्यक्ष रबी लामिछाने का दिल्ली दौरा इसी सिलसिले की एक कड़ी है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या यह 'नया और अनुभवहीन' नेतृत्व दशकों पुराने सीमा विवादों और कूटनीतिक संवेदनशीलता को संभालने के लिए तैयार है?
विवाद की ताज़ा वजह
नेपाल के नए प्रधानमंत्री बालेन शाह ने अपनी संसद में एक ऐसा बयान दिया जिसने दिल्ली के नीति-निर्माताओं को चौंका दिया। उन्होंने भारत पर नेपाल की ज़मीन कब्ज़ा करने का आरोप तो लगाया ही, साथ ही यह भी कह दिया कि नेपाल इस मुद्दे पर चीन और ब्रिटेन के संपर्क में है। रही-सही कसर तब पूरी हो गई जब उन्होंने भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री से मिलने से मना कर दिया।
कूटनीति में ऐसे कदम 'आग में घी' का काम करते हैं। हालांकि, बाद में आए नेपाली नेताओं ने "पुरानी कड़वाहट" को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने की बात कहकर माहौल को शांत करने की कोशिश की है।
मुख्य चुनौतियाँ: जहाँ संभलकर कदम रखने की ज़रूरत है
तीसरे पक्ष की एंट्री पर नो-एंट्री: भारत ने साफ कर दिया है कि द्विपक्षीय बातचीत में चीन जैसे किसी 'तीसरे पक्ष' की भूमिका उसे कतई मंज़ूर नहीं है, खासकर तब जब नेपाली विदेश मंत्री का अगला दौरा बीजिंग का हो।
गर्म होता सीमा विवाद: लिम्पियाधुरा और लिपुलेख का सीमा विवाद इस गर्मी में फिर सुलग सकता है, क्योंकि भारत इसी रास्ते से तिब्बत में कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए जत्थे भेजने की तैयारी में है।
एजेंडा बहुत बड़ा है: दोनों देशों के बीच सिर्फ सीमा विवाद नहीं है; जल-बंटवारे के समझौते, बुनियादी ढांचा, व्यापार और ऊर्जा साझेदारी जैसे बड़े मुद्दे दांव पर लगे हैं, जिन्हें बयानों की गर्मी में गंवाया नहीं जा सकता।
चुनौती में छिपा अवसर
दक्षिण एशिया की राजनीति बदल रही है। मालदीव, श्रीलंका और बांग्लादेश के बाद अब नेपाल में भी युवाओं के विरोध प्रदर्शनों ने पुरानी राजनीतिक व्यवस्था को उखाड़ फेंका है।
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