सहज, सरल और सत्यनिष्ठ होना कठिन है?
बिल्कुल नहीं! फिर भी आज का समाज एक अजीब अंतर्विरोध से जूझ रहा है। कोई लाख बेईमानी करे, भ्रष्टाचार के दलदल में उतरे, वादाखिलाफी करे या येन-केन-प्रकारेण धन अर्जित करे, लेकिन समाज में कदम रखने के लिए वह लिबास हमेशा 'ईमानदारी' का ही ओढ़ता है।
यह ढोंग इस बात का सबसे बड़ा अकाट्य प्रमाण है कि भौतिकता की इस अंधी दौड़ में भी अच्छे चरित्र और उच्च आदर्शों की महत्ता कम नहीं हुई है। भले ही लोग इसका सिर्फ स्वांग रचें, पर स्वीकार्यता आज भी सिर्फ और सिर्फ अच्छाई की ही है। इतिहास और वर्तमान साक्षी हैं कि आपके पास कितनी भी अकूत संपत्ति, बाहुबल या साधन क्यों न हों, कुमार्ग पर चलकर आप सत्ता तो पा सकते हैं, पर वह सच्ची 'प्रतिष्ठा' और आदर नहीं पा सकते जो एक निष्कलंक चरित्र को अनायास ही मिल जाता है।
"रहना नहीं देस बिराना है..."
इस शाश्वत सत्य को जानते हुए भी कि यह संसार नश्वर है और एक दिन सब यहीं छूट जाना है, लोग गलत काम करने से नहीं डरते। इसके पीछे का मूल कारण है—भीतर से नैतिकता का पूरी तरह लोप हो जाना, देशभक्ति की भावना का शून्य होना और सामाजिक उत्तरदायित्व व वास्तविक प्रतिष्ठा की परवाह न करना। आज इंसान तात्कालिक और क्षणिक लाभ के लिए अपनी आत्मा को गिरवी रख रहा है।
समय की मांग: कबीर के आदर्शों की प्रासंगिकता
आज के इस संक्रमण काल में हमें संत कबीर की उन पंक्तियों को सिर्फ पढ़ने की नहीं, बल्कि अपने भीतर आत्मसात करने की महती आवश्यकता है:
“दास कबीरा जतन से ओढ़े, ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया॥”
यह 'चदरिया' हमारा जीवन है, हमारी आत्मा है। सांसारिक लालचों और विकारों के बीच रहते हुए भी इसे बेदाग और निष्कलंक बनाए रखना ही मानव जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता है। यदि हम एक स्वस्थ, समृद्ध और आदरयुक्त समाज का निर्माण करना चाहते हैं, तो हमें दिखावे के इस मुखौटे को उतारकर सहजता, सरलता और सत्यनिष्ठा को अपने आचरण का मूल आधार बनाना ही होगा।
आइए, खोखली प्रतिष्ठा की दौड़ से बाहर निकलकर कबीर के इस जतन को अपने जीवन का ध्येय बनाएं।

Comments
Post a Comment