सच्चा कौन, मुखौटा कौन? योग्यता की कीमत कौड़ियों में है और चाटुकारिता का मूल्य आसमान छू रहा है।
अंधेर नगरी से लंका विजय तक: आज की राजसत्ता का एक रिपोर्ताज!
1. भूमिका: समय बदला, पर रंगमंच वही है
साहित्य सिर्फ अतीत का आईना नहीं होता, वह भविष्य की बही-खाता भी होता है। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने जब 19वीं सदी में 'अंधेर नगरी चौपट राजा' लिखा, तो उनका निशाना तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत और विवेकहीन सत्ता थी। वहीं, हरिशंकर परसाई ने जब 'लंका विजय के बाद' जैसी रचनाओं के माध्यम से रामकथा के उत्तर-प्रसंगों पर व्यंग्यबाण चलाए, तो उनका टार्गेट आज़ाद भारत की वह सत्ता थी जो मर्यादा के नाम पर अपनी कमियों को छुपाती है।
आज साल 2026 में जब हम देश-दुनिया की राजसत्ता को देखते हैं, तो ऐसा लगता है कि भारतेंदु का 'टक्के सेर भाजी, टके सेर खाजा' और परसाई की 'मर्यादावादी राजनीति' का कॉकटेल हमारे सामने परोस दिया गया है। यह रिपोर्ताज आज की सत्ता, उसके चाल-चरित्र और साहित्यिक प्रसंगों के बीच के अंतर्संबंधों की एक पड़ताल है।
2. 'टका सेर' का नया दौर: आज की 'अंधेर नगरी'
भारतेंदु के नाटक में एक ऐसी व्यवस्था थी जहाँ न्याय और अन्याय, योग्यता और अयोग्यता का मूल्य एक बराबर था—सब कुछ 'टके सेर'।
आर्थिक मोर्चे पर विवेकहीनता: आज की राजसत्ता में भी कई बार ऐसे ही 'चौपट' फैसले दिखते हैं। जब नीतियां आम जनता की जेब खाली करने के लिए बनती हैं और कॉर्पोरेट मित्रों के कर्ज 'टके सेर' माफ़ कर दिए जाते हैं, तो भारतेंदु का वह राजा याद आता है जिसे दीवार गिरने के असली गुनहगार का पता नहीं था और उसने बिना सोचे-समझे एक सीधे-साधे गोवर्धन दास को फांसी पर चढ़ाने का हुक्म दे दिया था।
संस्थानों का अवमूल्यन: आज जब संवैधानिक संस्थाएं सत्ता के इशारे पर काम करती दिखती हैं, तो न्याय की तराजू वैसी ही डगमगाती है जैसी अंधेर नगरी के दरबार में डगमगा रही थी। आज की सत्ता को 'तर्क' से चिढ़ है, उसे बस 'हुक्म की तामील' पसंद है।
"अंधेर नगरी अनबूझ राजा, टका सेर भाजी टका सेर खाजा।" यह आज की उस व्यवस्था पर सटीक बैठता है जहाँ योग्यता की कीमत कौड़ियों में है और चाटुकारिता का मूल्य आसमान छू रहा है।
3. 'लंका विजय' का जश्न और बुनियादी सवाल: परसाई की दृष्टि
हरिशंकर परसाई ने रामकथा के प्रसंगों, विशेषकर लंका विजय के बाद के घटनाक्रमों को लेकर सत्ता के चरित्र पर गहरा प्रहार किया था। विजय के बाद जब उत्सव मनाया जाता है, तो असली सवाल नेपथ्य (पीछे) में धकेल दिए जाते हैं।
विजय का राष्ट्रवाद बनाम जनता की बदहाली: आज की सत्ता हर छोटी-बड़ी उपलब्धि को 'लंका विजय' की तरह भुनाती है। एक भव्य नैरेटिव (विमर्श) तैयार किया जाता है कि हमने 'शत्रु' को परास्त कर दिया है। परसाई जी अक्सर लिखते थे कि सत्ता जब अपनी नाकामियां नहीं छुपा पाती, तो वह एक काल्पनिक शत्रु खड़ा कर देती है और जनता को युद्ध के उन्माद में झोंक देती है।
मर्यादा का मुखौटा: लंका विजय के बाद मर्यादा के नाम पर जो अग्निपरीक्षाएं और त्याग हुए, वे प्रतीकात्मक थे। आज की राजसत्ता भी खुद को 'मर्यादा पुरुषोत्तम' और 'त्यागी' सिद्ध करने के लिए करोड़ों रुपये विज्ञापनों पर खर्च कर देती है, लेकिन जब जनता महंगाई, बेरोजगारी और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में तड़पती है, तो सत्ताधारी दल 'रामराज' की बात करके पल्ला झाड़ लेते हैं।

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