​चुड़ैल का डर और एक महिला की जीत: अंजू की कहानी !

   17 पंचायतों की लगभग 400 महिलाएँ बोधगया के ब्लॉक ऑफिस के बाहर उठ खड़ी हुईं।



​हम अक्सर सुनते हैं कि शिक्षा ही सशक्तिकरण की पहली सीढ़ी है। लेकिन क्या होता है जब किसी को बचपन में यह कहकर स्कूल जाने से रोक दिया जाए कि "स्कूल जाओगी तो चुड़ैल खा जाएगी"?

​यह कहानी बिहार की अंजू की है, जिन्होंने अंधविश्वास, घरेलू हिंसा और घोर गरीबी की बेड़ियों को तोड़कर अपनी किस्मत खुद लिखी। यह कहानी हमें सिखाती है कि हक की लड़ाई लड़ने के लिए किसी डिग्री की नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और एकजुटता की जरूरत होती है।

​अंधविश्वास का साया और संघर्ष की शुरुआत

​अंजू का जन्म 1978 में ग्रामीण बिहार में हुआ था। स्कूल जाने की उम्र में उनके पिता ने इसी अजीबोगरीब अंधविश्वास के डर से उन्हें अनपढ़ रखा। महज 15 साल की उम्र में उनकी शादी कर दी गई। शादी के बाद का जीवन और भी दर्दनाक था—एक शराबी पति जो उनके साथ मारपीट करता था, और दिन भर (8 घंटे) खेतों में कड़ी मेहनत करने के बदले पैसे नहीं, बल्कि सिर्फ डेढ़ किलो चावल मिलते थे।

​अंजू यही सोचती थीं, "मैं पढ़ी-लिखी नहीं हूँ, इसके अलावा मैं और कर भी क्या सकती हूँ?"

​मुट्ठी भर चावल और 'जीविका' का सहारा

​साल 2006 अंजू के जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। उनके गाँव में 'जीविका' (स्वयं सहायता समूह) की शुरुआत हुई। समूह से जुड़ने के लिए हर हफ्ते 5 रुपये बचाने थे, लेकिन अंजू के पास 5 रुपये भी नहीं होते थे। तब एक अन्य महिला ने उन्हें एक व्यावहारिक सलाह दी: "रोज खाना बनाते समय चावल में से एक मुट्ठी चावल निकाल कर बचा लिया करो।"

​इस छोटे से कदम ने कमाल कर दिया। अंजू समूह की बैठकों में जाने लगीं। वह उनके लिए सिर्फ एक बचत समूह नहीं, बल्कि एक सुरक्षित ठिकाना बन गया। जब उनकी बेटी के स्कूल एडमिशन के लिए पैसों की जरूरत पड़ी, तो उन्होंने समूह से 4,000 रुपये का कर्ज लिया। जब वह पैसे लेकर घर लौटीं, तो उनके पति के होश उड़ गए। पति की पिटाई इसलिए नहीं रुकी कि वह सुधर गया था, बल्कि इसलिए रुकी क्योंकि अंजू को 'कमजोर और लाचार' समझने का उसका भ्रम टूट चुका था।

​जब सरकारी तंत्र को झुकना पड़ा (MGNREGA की ताकत)

​2015 में अंजू मनरेगा (MGNREGA) से जुड़ीं। यहाँ काम के बदले नकद पैसे मिलते थे और सबसे बड़ी बात—यह काम 40 महिलाओं के एक समूह के साथ होता था, जहाँ हँसते-खेलते काम का बोझ कम हो जाता था।

​अंजू को यहाँ सबसे बड़ी बात पता चली: उनके पास अधिकार हैं। उन्हें मालूम पड़ा कि अगर काम मांगने के 15 दिनों के भीतर काम न मिले, तो सरकार उन्हें बेरोजगारी भत्ता देने के लिए बाध्य है।

​"यह जानना कि सरकार पर भी उनका कोई हक बनता है, अंजू के लिए एक बिल्कुल नई और ताकतवर सीख थी।"

​साल 2018 में जब मनरेगा का काम अचानक रुक गया, तो अंजू शांत नहीं बैठीं। उन्होंने अपने इसी अधिकार का इस्तेमाल किया। 17 पंचायतों की लगभग 400 महिलाएँ बोधगया के ब्लॉक ऑफिस के बाहर उठ खड़ी हुईं। महिलाओं के इस हुजूम और उनके बुलंद हौसलों को देखकर ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर (BDO) पिछले दरवाजे से कमरा लॉक करके भाग खड़ा हुआ। दो दिन के भीतर ही महिलाओं को उनका काम वापस मिल गया।

​गर्व की असली परिभाषा

​आज अंजू एक हल्दीराम की फैक्ट्री में 12 घंटे काम करके ₹400 कमाती हैं। शायद वह देश के बड़े बजटों या सरकारी नीतियों के तकनीकी बदलावों को न समझती हों, लेकिन उन्होंने स्वाभिमान का असली मतलब सीख लिया है।

​यह कहानी उस गर्व की है जिसे अंजू ने खुद कमाया है। एक ऐसी महिला जिसे बचपन में डराया गया था, जिसने मुट्ठी भर चावल से अपनी बचत शुरू की, आज वह जब उस सरकारी दफ्तर के घेराव को याद करती हैं, तो मुस्कुरा कर कहती हैं—"मुझे गर्व महसूस हुआ।" अंजू की यह यात्रा साबित करती है कि जब महिलाएँ एकजुट होती हैं, तो बड़े से बड़ा तंत्र भी उनके सामने घुटने टेक देता है।

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