संगीत और साहित्य का निचोड़: "अँखियों को रहने दे" !
गीत
टूट के दिल के टुकड़े-टुकड़े हो गए मेरे सीने में,
आ गले लग के मर जाएँ, क्या रखा है जीने में...
अँखियों को रहने दे अँखियों के आस-पास,
दूर से दिल की बुझती रहे प्यास।
दर्द ज़माने में कम नहीं मिलते,
सब को मोहब्बत के ग़म नहीं मिलते।
टूटने वाले दिल होते हैं कुछ ख़ास,
दूर से दिल की बुझती रहे प्यास...
रह गईं दुनिया में नाम की खुशियाँ,
तेरे मेरे किस काम की खुशियाँ?
सारी उम्र हमको रहना है यूँ उदास,
दूर से दिल की बुझती रहे प्यास...
अँखियों को रहने दे अँखियों के आस-पास,
दूर से दिल की बुझती रहे प्यास।
1. विप्रलम्भ श्रृंगार और आत्मसमर्पण
यह गीत मिलन की उम्मीद खो चुकी एक प्रेमिका की विवशता है। यहाँ शारीरिक निकटता की चाह ख़त्म हो चुकी है; अब केवल 'दृष्टि मिलन' (महबूब का आँखों के सामने रहना) ही जीने का एकमात्र सहारा है।
2. ग़म की रूहानी गरिमा
"सब को मोहब्बत के ग़म नहीं मिलते, टूटने वाले दिल होते हैं कुछ ख़ास..."
कवि ने यहाँ प्रेम के दर्द को सांसारिक दुखों से ऊपर रखा है। हर किसी को मोहब्बत का ग़म नसीब नहीं होता, इसलिए टूटे हुए दिलों को 'खास' कहकर उनके दर्द को एक गौरवमयी गरिमा दी गई है।
3. सांसारिकता से विरक्ति
"रह गईं दुनिया में नाम की खुशियाँ..."
प्रेम में असफल होने के बाद दुनिया की तमाम भौतिक खुशियाँ अर्थहीन और खोखली लगने लगती हैं। जीवन का अंतिम सत्य अब केवल 'उम्र भर की उदासी' बनकर रह गया है।
यह गीत सिखाता है कि प्रेम पा लेने का नाम नहीं, बल्कि सब कुछ खोकर भी महबूब को आँखों के सामने देखने की चाह रखना ही इश्क की पराकाष्ठा है।

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