आस्था की मंडी और आधुनिक 'चंदा-चोर'! -प्रो प्रसिद्ध कुमार।

   


​— धर्म के ठेकेदारों और आधुनिक परजीवियों पर एक तीखा प्रहार

​आज के दौर में यदि व्यंग्य के पुरोधा हरिशंकर परसाई जीवित होते, तो वे निश्चित रूप से 'लंका विजय' के बाद की अराजकता जैसी ही एक नई कालजयी कहानी लिखते—"राम मंदिर और आधुनिक कुबेरों की लीला"। वर्तमान परिदृश्य कुछ ऐसा ही है, जहाँ आस्था की पवित्र भूमि पर कुछ लोग अपनी तिजोरियाँ भरने के व्यापार में लीन हैं।

​पाहन पूजे हरि मिले... और बदलती नीतियां

​कबीरदास ने सदियों पहले जिस पाखंड पर चोट करते हुए कहा था, "पाहन पूजे हरि मिलैं, तो मैं पूजूँ पहार", आज के 'चंदा-चोरों' ने उस पंक्ति का बिल्कुल नया और व्यावहारिक अर्थ निकाल लिया है। उन्हें न तो पाप का भय है और न ही पुण्य की लालसा; उनका एकमात्र ध्येय श्रद्धालुओं की अटूट आस्था को अपनी व्यक्तिगत तिजोरी का रास्ता बनाना है।

​दानकर्ता का संशय: डरा हुआ आज वह निष्कपट भक्त (दानकर्ता) है, जो अपनी गाढ़ी कमाई का अंश भगवान के चरणों में सौंपता है।

​परजीवियों का वर्चस्व: दूसरी ओर, वे शातिर लोग हैं जो पाखंड के इस आधुनिक खेल में पूरी तरह निश्चिंत हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि आस्था के बाजार में सवाल पूछने की मनाही है।

​परजीवी, मठाधीश और बदला हुआ हुलिया

​आज समाज के वास्तविक ज्ञानी और सत्यवादी हाशिए पर धकेल दिए गए हैं, वे 'मारे-मारे' फिर रहे हैं। इसके विपरीत, समाज के चतुर परजीवी अपना हुलिया बदलकर रातों-रात साधु, महात्मा, मठाधीश और मर्मज्ञ प्रवचनकर्ता बन बैठे हैं।

​"यह एक ऐसा चक्रव्यूह है जहाँ गेरूए वस्त्र और ऊंचे मंचों के पीछे मलाई खाने का संगठित तंत्र चल रहा है। जनता तर्क को ताक पर रखकर इनके चरणों में लोट-पोट हो रही है और अपने खजानों का मुंह खोले बैठी है।"

​'अंधभक्ति' के दौर में मौन होता विवेक

​यदि आज कोई लेखक या विचारक इस ढोंग और हेराफेरी की पोल खोलने का दुस्साहस करे, तो आज का 'अंधभक्त' समाज उसे कहीं का नहीं छोड़ता। आलोचना को 'धर्म का विरोध' मान लिया जाता है, जिससे व्यवस्था में बैठे भ्रष्टाचारियों को एक अचूक सुरक्षा कवच मिल जाता है।  इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि जहाँ जितनी गहरी श्रद्धा होती है, छद्मवेषियों के लिए वहाँ लूट के उतने ही बड़े अवसर पैदा हो जाते हैं।

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