एटीएम में 'नो कैश' का संकट और जमीनी हकीकत !
यह समस्या नकदी की कमी की नहीं, बल्कि वितरण नेटवर्क के टूटने और यूपीआई (UPI) के तेजी से बढ़ते चलन के कारण पैदा हुई है। डिजिटल इंडिया और यूपीआई क्रांति निसंदेह सराहनीय है, लेकिन आज भी देश का एक बहुत बड़ा हिस्सा—विशेषकर ग्रामीण क्षेत्र, बुजुर्ग और छोटे व्यापारी—पूरी तरह नकद लेनदेन पर निर्भर हैं। जब स्वतंत्र एटीएम ऑपरेटरों को समय पर नकदी नहीं मिलती, तो इसका सीधा असर आम नागरिक के दैनिक जीवन पर पड़ता है।
पुराने नियमों और कम इंटरचेंज फीस के कारण एटीएम ऑपरेटरों के लिए मशीनें चलाना घाटे का सौदा बन गया है। ईंधन और सुरक्षा की बढ़ती लागत ने इस संकट को और गहरा कर दिया है।
रिज़र्व बैंक (RBI) और सरकार को तुरंत 'हाइब्रिड एटीएम' और छोटे नोट (जैसे ₹100, ₹200) देने वाली मशीनों की संख्या बढ़ानी चाहिए। साथ ही, एटीएम ऑपरेटरों के लिए मुआवजे के मॉडल में सुधार करना बेहद जरूरी है।
डिजिटल भुगतान और भौतिक नकद एक-दूसरे के दुश्मन नहीं, बल्कि पूरक होने चाहिए। यदि एटीएम नेटवर्क इसी तरह चरमराता रहा, तो वित्तीय समावेशन का हमारा लक्ष्य प्रभावित हो सकता है।

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