भारत में शिक्षा की बदहाली: सिर्फ लीक होते पर्चे नहीं, जड़ें बहुत गहरी हैं !
U G C
जैसी संस्थाएं आज भी सरकारी दखलंदाजी का एक बड़ा जरिया बनी हुई हैं।
आजकल देश में शिक्षा पर खूब चर्चा हो रही है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि यह चर्चा शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारने के लिए नहीं, बल्कि NEET परीक्षा में धांधली, लीक होते पेपर्स और CBSE की बोर्ड परीक्षाओं में फैले भ्रष्टाचार के कारण हो रही है। इस बदहाली और भ्रष्टाचार ने हमारे देश के कई होनहार युवाओं को आत्महत्या जैसे आत्मघाती कदम उठाने पर मजबूर कर दिया है।
लेकिन क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था की समस्या सिर्फ पेपर लीक तक ही सीमित है? यह तो सिर्फ बीमारी के लक्षण हैं; असली बीमारी तो बहुत गहरी है।
1. केवल साक्षरता, वास्तविक शिक्षा नहीं
हमारे देश के नेताओं और उच्च अधिकारियों को भी अच्छी तरह मालूम है कि सरकारी स्कूलों की हालत क्या है। यही कारण है कि वे कभी अपने बच्चों को इन स्कूलों में नहीं भेजते। सरकार ने ऐसे स्कूल तैयार कर दिए हैं जो बच्चों को 'वास्तविक ज्ञान' (Real Learning) देने के बजाय केवल 'बारेस्ट लिटरेसी' (यानी सिर्फ अक्षर ज्ञान) दे रहे हैं।
एक कड़वी सच्चाई: साल 2009 में जब तमिलनाडु और हिमाचल प्रदेश के भारतीय बच्चों ने अंतरराष्ट्रीय छात्र मूल्यांकन कार्यक्रम (PISA) में हिस्सा लिया था, तो 15 वर्षीय बच्चों की रीडिंग, मैथ्स और साइंस की परीक्षा में भारत का स्थान नीचे से दूसरा था। लेकिन हमारे देश के नौकरशाहों (babus) ने इस कड़वे सच को सुधारने के बजाय इसे दबाने में महारत हासिल कर ली।
2. नेहरू से मोदी तक: शिक्षा की ऐतिहासिक अनदेखी
यदि भारत के प्रधानमंत्रियों के इतिहास को देखें, तो एक बात सामान्य रूप से उभरती है—शिक्षा के प्रति उदासीनता। * जवाहरलाल नेहरू ने IITs जैसे बड़े संस्थान तो बनाए, लेकिन उन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि वहां केवल उच्च वर्ग और मध्यम वर्ग के बच्चे ही पहुंच पा रहे थे। उनके कार्यकाल में उच्च शिक्षा पर सरकारी नियंत्रण इतना कड़ा कर दिया गया कि शोध और उत्कृष्टता (Excellence) की राह ही बंद हो गई। UGC (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) जैसी संस्थाएं आज भी सरकारी दखलंदाजी का एक बड़ा जरिया बनी हुई हैं।
वर्तमान सरकार से भी बड़ी उम्मीदें थीं। साल 2013-14 में जब नरेंद्र मोदी सत्ता में आ रहे थे, तब यह उम्मीद थी कि वे कांग्रेस सरकारों द्वारा शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में की गई ऐतिहासिक गलतियों को सुधारेंगे। लेकिन आज इतने वर्षों बाद भी, भाजपा और अन्य दलों द्वारा शासित राज्यों (जैसे हिंदी-बेल्ट, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल) के सरकारी स्कूलों में कोई क्रांतिकारी सुधार देखने को नहीं मिला है।
3. वो तीन बड़े सुधार, जिनकी देश को तुरंत जरूरत है
शिक्षाविद् मिशेल डैनिनो (Michel Danino) के अनुसार, यदि भारतीय शिक्षा व्यवस्था को वास्तव में बदलना है, तो तीन बुनियादी स्तरों पर काम करना होगा:
छात्रों को 'पैसिव स्पंज' बनाना बंद करें: हमारी शिक्षा व्यवस्था बच्चों को सिर्फ रटना सिखाती है, जहां वे क्लास में बैठकर बिना सोचे-समझे जानकारी सोखते हैं। इसकी जगह उन्हें सक्रिय रूप से चर्चाओं में भाग लेने और सवाल उठाने के लिए प्रेरित करना होगा। यानी, 'रट्टा मार' (Rote Learning) संस्कृति का अंत।
शिक्षकों के उचित प्रशिक्षण संस्थान: आज सरकारी शिक्षकों को वेतन तो भारी-भरकम (निजी स्कूलों के मुकाबले कई गुना ज्यादा) मिल रहा है, लेकिन उनके प्रशिक्षण की गुणवत्ता बेहद खराब है। बेहतरीन टीचर ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट्स की सख्त जरूरत है।
बुनियादी ढांचे (Infrastructure) में निवेश: आज भी देश के कई हिस्सों में सरकारी स्कूल सिर्फ 'खाली शेड' बनकर रह गए हैं। स्कूलों में पुस्तकालय (Libraries), खेल के मैदान, साफ पानी और शौचालयों जैसी बुनियादी सुविधाओं का भारी अभाव है।
क्या हम 'AI के युग' के लिए तैयार हैं?
आज हमारे पास ऐसे 'ग्रेजुएट्स' की फौज खड़ी हो रही है जो कॉलेज की डिग्री तो ले लेते हैं, लेकिन वे न तो अपनी बात को ठीक से व्यक्त कर पाते हैं और न ही गणित का एक साधारण समीकरण हल कर सकते हैं। यही कारण है कि भारत में समस्या केवल 'बेरोजगारी' (Unemployment) की नहीं, बल्कि 'रोजगार के अयोग्य होने' (Unemployability) की है।
सोचिए, आने वाले समय में जब हमारे बच्चों का मुकाबला कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI Children/AI Tools) से होगा, तब वे इस वैश्विक प्रतिस्पर्धा में कहाँ टिकेंगे? राजनीतिक दलों के आपसी विरोध और हंगामे अपनी जगह हैं, लेकिन असली जवाबदेही शिक्षा मंत्री और सरकार की है। जब तक शिक्षा की इस बुनियादी सड़न को दूर नहीं किया जाता, तब तक भारत के भविष्य को संवारना नामुमकिन है।

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