'ईवीएम' स्वाहा: न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी!

    


​लपटों में लोकतंत्र का 'सन्दूक'! यह आधुनिक युग का 'लाक्षागृह' था। 

​जिस चुनावी प्रक्रिया पर विपक्षी दल पहले से ही अपनी सुरीली तान में उंगलियां उठा रहे थे, वहां अचानक एक ऐसा 'क्लाइमेक्स' आया कि सुर और साज दोनों ही खाक हो गए। पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव बीते अभी जुम्मा-जुम्मा चार दिन भी नहीं हुए थे कि कोलकाता की एक सरकारी इमारत की ऊपरी मंजिलों पर रखी करीब चार हजार इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें (EVMs) जलकर खाक हो गईं। इसे कहते हैं मुकम्मल इलाज—"न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी।" जब मशीनें ही नहीं बचेंगी, तो जांच किस बात की होगी और उंगलियां किस पर उठेंगी?

​हाई-सिक्योरिटी वाली 'अग्निपरीक्षा'

​बड़ा ही दिलचस्प विरोधाभास है! ये मशीनें किसी मामूली कबाड़खाने में नहीं, बल्कि 'उच्च सुरक्षा क्षेत्र' (High-Security Zone) में रखी गई थीं। पर आग भी बड़ी समझदार निकली; तीसरी मंजिल से लगी और सीधे छलांग मारते हुए सातवीं-आठवीं मंजिल पर पहुंच गई—ठीक वहीं, जहां ईवीएम आराम फरमा रही थीं। विपक्षी दल अब इसमें 'साजिश की बू' सूंघ रहे हैं, पर असल में यह तो आधुनिक युग का 'लाक्षागृह' था, जिसमें सच्चाई को जिंदा जलाने का भव्य आयोजन किया गया।

​चुनाव आयोग का 'मौन व्रत' और ढुलमुल साख

​चुनाव से पहले और चुनाव के दौरान तृणमूल कांग्रेस मतदाता सूची से लेकर पूरी प्रक्रिया पर सवाल दागती रही। उम्मीद थी कि चुनाव आयोग इन उठते सवालों पर कोई ठोस 'अग्निशामक' जवाब देगा, लेकिन आयोग ने तो इस जलती हुई हकीकत से मुंह ही मोड़ लिया। जब अदालतों से वोटों की गिनती में गड़बड़ियों की जांच की गुहार लगाई जा रही हो, ऐसे नाजुक वक्त पर चार हजार ईवीएम का 'भस्म' हो जाना चुनाव आयोग की साख को पूरी तरह कटघरे में खड़ा करता है।

जनता सोच रही थी कि अदालत दूध का दूध और पानी का पानी करेगी, पर यहां तो दूध और पानी दोनों उबलकर भाप बन गए!

​लोकतंत्र की हिलती बुनियाद

​इस डिजिटल 'अग्निकांड' ने न सिर्फ राजनीतिक दलों का, बल्कि आम मतदाताओं का भी भरोसा धुएं में उड़ा दिया है। लोकतंत्र आदमियों से नहीं, उनके 'विश्वास' से चलता है। पर जब जनता के भरोसे की बुनियाद को ही इस तरह लापरवाही या साजिश के बारूद से उड़ा दिया जाए, तो लोकतंत्र का महल भरभराकर गिरना तय है। अब देखना यह है कि इस राख के ढेर से सच का फिनिक्स (नया पक्षी) पैदा होता है, या फिर हमेशा की तरह फाइलें भी इसी आग में 'स्वाहा' मान ली जाती हैं।

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