विकास का विरोधाभास और कुपोषण की जटिलता!
कुपोषण एक समान समस्या नहीं है। ग्रामीण-शहरी विभाजन, आय वर्ग की विषमता और सामाजिक श्रेणियों (अनुसूजित जाति/जनजाति) के बीच का अंतर यह स्पष्ट करता है कि पोषण तक पहुँच सीधे तौर पर सामाजिक न्याय और संसाधनों के वितरण से जुड़ी है।
यह 'राष्ट्रीय औसत' के प्रति एक महत्वपूर्ण चेतावनी है। अक्सर सरकारी आंकड़े औसत विकास दर दिखाकर स्थिति को बेहतर दिखाते हैं, लेकिन यह 'औसत' हाशिए पर मौजूद उन समुदायों की वास्तविक पीड़ा को छिपा देता है, जो अभी भी बुनियादी जरूरतों से वंचित हैं।
दुष्चक्र: 'गरीबी, पिछड़ापन और कुपोषण' को एक-दूसरे को गहरा करने वाला कारक बताना यह दर्शाता है कि यह समस्या एक दुष्चक्र (Vicious Cycle) है। यदि इसे केवल स्वास्थ्य विभाग का मुद्दा मानकर देखा जाएगा, तो यह कभी हल नहीं होगा; इसके लिए शिक्षा, रोजगार, स्वच्छता और खाद्य सुरक्षा जैसे व्यापक सुधार आवश्यक हैं।

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