हीरामंडी: इतिहास का आईना और आज का सियासी तमाशा!
कला से कलंक तक!
नेटफ्लिक्स की वेब सीरीज़ "हीरामंडी: द डायमंड बाज़ार" ने जहाँ दर्शकों को भव्य सेटों और संगीत की दुनिया में सराबोर किया, वहीं इसने इतिहास के एक ऐसे पन्ने को भी खोला जो आज भी हमारी सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था को मुँह चिढ़ाता है। लाहौर का यह बदनाम और कभी बेहद आबाद इलाका केवल तवायफों और महफिलों की कहानी नहीं है, बल्कि यह इस बात का जीता-जागता सबूत है कि कैसे सत्ता, पितृसत्ता और राजनीति मिलकर कला और संस्कृति की परिभाषा को अपनी सहूलियत से बदल देते हैं।
आइए, सिनेमाई पर्दे के पीछे छिपे इस सच को आज की सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था से जोड़कर देखने की कोशिश करते हैं।
1. कला से कलंक तक: कैसे सत्ता बदलती है नज़रिया?
एक ज़माना था जब हीरामंडी तहज़ीब, संगीत, कत्थक और शायरी का गढ़ हुआ करती थी। राजा-महाराजा और रईस अपने बेटों को वहाँ 'तहज़ीब' सीखने भेजा करते थे। लेकिन जैसे ही ब्रिटिश हुकूमत आई, उन्होंने अपनी विक्टोरियन नैतिकता के चश्मे से इसे देखा और 'तवायफ संस्कृति' को सीधे 'देह व्यापार' या 'रेड-लाइट डिस्ट्रिक्ट' का ठप्पा लगा दिया।
आज का जुड़ाव: आज की राजनीतिक व्यवस्था भी कुछ ऐसी ही है। जब भी सत्ता बदलती है, इतिहास और संस्कृति को दोबारा लिखने की कोशिश की जाती है। जो कला या विचार वर्तमान सरकार या व्यवस्था के नैरेटिव में फिट नहीं बैठता, उसे रातों-रात 'देशद्रोही', 'अश्लील' या 'अवांछित' घोषित कर हाशिए पर धकेल दिया जाता है। हीरामंडी का पतन इस बात का उदाहरण है कि कैसे राजनीतिक ताकतें किसी भी जीवंत संस्कृति को कलंकित कर सकती हैं।
2. पितृसत्ता और राजनीति का गठजोड़: मोहरे बदल गए, चालें वही हैं
हीरामंडी की कोठेवालियाँ अपने समय में स्वतंत्र थीं। उनके पास संपत्ति थी, वे टैक्स देती थीं और पुरुषों के वर्चस्व वाले समाज में अपनी शर्तों पर जीती थीं। लेकिन इतिहास गवाह है कि नवाबों, राजाओं और बाद में अंग्रेज़ अफ़सरों ने अपनी राजनीतिक और शारीरिक महत्वाकांक्षाओं के लिए उनका इस्तेमाल किया। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इन महिलाओं ने गुप्त रूप से क्रांतिकारियों की मदद भी की, लेकिन इतिहास की किताबों ने उन्हें वह सम्मान कभी नहीं दिया।
वोट बैंक और दोहरी नैतिकता: आज की राजनीति में भी महिलाओं की स्थिति कुछ ऐसी ही है। हर राजनीतिक दल 'महिला सशक्तिकरण' का नारा बुलंद करता है, लेकिन जब बात उन्हें नीति-निर्माण में बराबर की हिस्सेदारी देने या उनके अधिकारों की रक्षा की आती है, तो पितृसत्तात्मक सोच हावी हो जाती है।
महिलाओं को आज भी संसद से लेकर सड़क तक एक स्वतंत्र इकाई के बजाय अक्सर एक 'कमज़ोर वर्ग' या महज़ एक 'वोट बैंक' की तरह देखा जाता है।
3. 'सेंसरशिप' और नैतिकता का ढोंग
हीरामंडी के कलाकारों को समाज के मुख्य हिस्से से अलग-थलग कर दिया गया क्योंकि वे समाज के तय 'पारंपरिक' ढाँचे में फिट नहीं बैठती थीं। समाज उनकी कला का लुत्फ़ भी उठाना चाहता था, लेकिन उन्हें सम्मान देने से कतराता था।
आज की सामाजिक व्यवस्था में भी यही दोहरी मानसिकता दिखाई देती है। डिजिटल युग में जहाँ एक तरफ अभिव्यक्ति की आज़ादी की बात होती है, वहीं दूसरी तरफ वैचारिक असहमति जताने वाले कलाकारों, बुद्धिजीवियों और पत्रकारों पर 'नैतिकता' और 'संस्कृति' के नाम पर सोशल मीडिया पर मॉब लिंचिंग और कानूनी कार्रवाई की तलवार लटका दी जाती है। समाज आज भी सच को स्वीकार करने के बजाय उसे 'सेंसर' करने में ज़्यादा यकीन रखता है।

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