आर्थिक विकास में भौतिक सुख-सुविधाएं मिली, 'सुकून' खोया!

     


    मुद्रास्फीति और क्रय शक्ति का क्षरण ! 

 समय के साथ वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें बढ़ती हैं, जिससे मुद्रा की क्रय शक्ति कम हो जाती है। 1985 में जो 50 रुपये पूरे महीने का राशन या किराया दिला सकते थे, आज उसकी क्रय शक्ति बहुत कम हो गई है। यह रुपये के मूल्य में अवमूल्यन को दर्शाता है, जहाँ '50' का अंकित मूल्य तो वही है, लेकिन उसकी वास्तविक आर्थिक शक्ति लगभग समाप्त हो चुकी है।

जीवन स्तर में अंतर और विलासिता का प्रभाव

 1985 में बुनियादी जरूरतों (दूध, आटा, चावल) पर ध्यान केंद्रित था। आज की महंगाई में केवल मुद्रास्फीति जिम्मेदार नहीं है, बल्कि उपभोग के पैटर्न में बदलाव भी है। आज हम 1985 की तुलना में कहीं अधिक 'विलासिता' वाली चीजों का उपभोग कर रहे हैं, जो हमारी जीवन लागत  को बढ़ाती हैं।

​इस तुलना का सबसे बड़ा आर्थिक पहलू 'वास्तविक आय' है। 

यदि 1985 में ₹50 में घर चलता था, तो उस समय आय भी बहुत कम थी। आज यदि ₹50 की कीमत 2000 रुपये के बराबर है, तो औसत वेतन और आय में भी ऐतिहासिक वृद्धि हुई है।

यह तुलना 'आय असमानता' के मुद्दे को नजरअंदाज करती है। जबकि मध्यम और उच्च वर्ग की आय मुद्रास्फीति के साथ बढ़ी है, निम्न आय वर्ग के लिए वस्तुओं की बढ़ती कीमतों ने उनके लिए बुनियादी जरूरतों को पूरा करना कठिन बना दिया है।

"तब की जिंदगी सस्ती थी, मगर सुकून बहुत था"—आर्थिक आंकड़ों के परे 'जीवन की गुणवत्ता' की बात करता है। आधुनिक अर्थव्यवस्था में 'समय की कमी' और 'मानसिक तनाव' भी एक 'छिपी हुई लागत' है। आर्थिक विकास के दौड़ में हमने भौतिक सुख-सुविधाएं तो प्राप्त की हैं, लेकिन वह 'सुकून' या 'वर्क-लाइफ बैलेंस' खो दिया है जिसे मुद्रा में नहीं मापा जा सकता।

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