फुलवारी का लहूलुहान इतिहास: सामाजिक न्याय के उन पांच दीवानों को याद करते हुए...
प्रो. प्रसिद्ध कुमार की कलम से
फुलवारी की माटी आज भारी है। रामपुर फरीदपुर पंचायत की जिस ज़मीन ने दशकों तक सामाजिक न्याय का बिगुल फूंका, आज वह अपने पांच जांबाज़ सिपाहियों की कमी से कराह रही है। 1990 से लेकर आज तक, हमने इस पंचायत में जो लड़ाई लड़ी है, वह महज़ चुनावी राजनीति नहीं थी; वह व्यवस्था के विरुद्ध एक विद्रोह था।
आई.के. गुजराल , गणेश यादव,राम कृपाल यादव से लेकर डॉ. मीसा भारती तक, और श्याम रजक, उदय मांझी से लेकर गोपाल रविदास तक—जब भी हमारे प्रत्याशियों के सिर जीत का सेहरा बंधा, उस जीत की बुनियाद हमारे साथियों के पसीने और खून से रची गई थी। लेकिन इस जीत का हिसाब-किताब बहुत महँगा रहा।
कुर्बानी की लंबी फेहरिस्त
सामाजिक न्याय का झंडा बुलंद करना इस इलाके में सीधे मौत को आमंत्रण देने जैसा था। हमारे तीन साथी—भोला यादव, रंजीत यादव और नीरज महतो (मुखिया) ने अपनी जान की आहुति देकर यह साबित किया कि आदर्शों की कीमत क्या होती है। मुझे आज भी वह दिन याद है जब मैं और अरुण यादव मौत के मुहाने से लौटकर आए थे; वह भाग्य ही था जिसने हमें बचा लिया।
अब उस फेहरिस्त में दो और नाम जुड़ गए हैं—रविंद्र राय और आज के असमय निधन से स्तब्ध कर देने वाले संजू यादव। इन साथियों का जाना मेरे लिए व्यक्तिगत क्षति नहीं, बल्कि मेरे संघर्ष का एक हिस्सा टूट जाने जैसा है।
सत्ता के गलियारों में विस्मृत कार्यकर्ता
आज मैं बेहद मर्माहत हूँ। पीड़ा इस बात की है कि जिस पार्टी के लिए हमने अपनी जवानी, अपना सुख और अपने साथियों की जान दांव पर लगाई, आज वही शीर्ष नेतृत्व इस ज़मीनी संघर्ष को अनदेखा कर रहा है।
बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि दल बदलकर कुछ नेता तो अपना कद ऊँचा कर गए, लेकिन उस संघर्ष की आग में झुलसने वाले वे कार्यकर्ता थे, जिन्होंने अंत तक निष्ठा निभाई। क्या सामाजिक न्याय की लड़ाई में शहीद हुए साथियों की शहादत का मूल्यांकन केवल वोट बैंक तक सीमित रह गया है? क्या पार्टी की जड़ों को सींचने वाले उन कार्यकर्ताओं की कोई अहमियत नहीं बची?
आज जब मैं अपने पांचों साथियों को याद करता हूँ, तो मन में एक ही सवाल उठता है—क्या हमारी निष्ठा और कुर्बानी का यही सिला है?
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