CBSE के सिस्टम को हिलाने वाले 3 'जीनियस' छात्र: ट्रोलिंग से सच्चाई की जीत तक!
यह कहानी है वेदांत श्रीवास्तव, निसर्ग अधिकारी और सार्थक सिद्धांत की.
अक्सर 'जेन जेड' (Gen Z) को सोशल मीडिया पर रील बनाने और ध्यान भटकाने वाली पीढ़ी माना जाता है। लेकिन भारत के तीन किशोरों ने यह साबित कर दिया कि जब सही दिशा मिले, तो यही पीढ़ी बड़े-बड़े सिस्टम की खामियों को उजागर कर सकती है।
यह कहानी है वेदांत श्रीवास्तव, निसर्ग अधिकारी और सार्थक सिद्धांत की, जिन्होंने अकेले अपने दम पर देश के सबसे बड़े परीक्षा बोर्ड, CBSE (केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड) के 'ऑन-स्क्रीन मार्किंग' (OSM) सिस्टम की गंभीर खामियों को दुनिया के सामने ला दिया।
जब सच बोलने पर मिला 'एंटी-नेशनल' का टैग
कहानी की शुरुआत हुई 12वीं के छात्र वेदांत श्रीवास्तव से। जब उन्होंने री-इवैल्यूएशन (पुनर्मूल्यांकन) के लिए अप्लाई किया, तो उनके पोर्टल पर उनके बजाय किसी अनजान छात्र की उत्तर-पुस्तिका दिखाई दे रही थी।
जब उन्होंने इस गड़बड़ी को सोशल मीडिया (X) पर उठाया, तो मदद मिलने के बजाय उन्हें भयानक ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा। लोगों ने उन्हें 'देशद्रोही', 'पाकिस्तानी' तक कह डाला और उनके बोलने के तरीके का मज़ाक उड़ाया। लेकिन वेदांत डिगे नहीं, और आखिरकार CBSE को अपनी गलती माननी पड़ी।
'एथिकल हैकर' जिसने उड़ाई सिस्टम की नींद
इस लड़ाई में पश्चिम बंगाल के 19 वर्षीय एथिकल हैकर निसर्ग अधिकारी ने तकनीकी मोर्चा संभाला। निसर्ग ने CBSE के ऑनलाइन पोर्टल में ऐसी "गंभीर सुरक्षा खामियां" (vulnerabilities) ढूंढ निकालीं, जिससे छात्रों का संवेदनशील डेटा लीक हो रहा था।
हैरानी की बात यह है कि कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम (CERT) और CBSE को इस गलती को मानने में तीन महीने लग गए। निसर्ग, जिन्हें पहले से ही सिलिकॉन वैली (अमेरिका) से नौकरियों के ऑफर हैं, का मानना है कि कंप्यूटर प्रोग्रामिंग का इस्तेमाल समाज की भलाई और डेटा प्राइवेसी की रक्षा के लिए होना चाहिए।
पार्लियामेंट्री पैनल के सामने गवाही और घर न लौट पाने का डर
झारखंड के रांची के रहने वाले सार्थक सिद्धांत ने सार्वजनिक दस्तावेजों की तुलना करके यह साबित कर दिया कि CBSE ने एक खास तकनीकी कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए नियमों में ढील दी थी। सार्थक संसदीय समिति (Parliamentary Panel) के सामने गवाही देने वाले संभवतः सबसे कम उम्र के व्यक्ति बने।
लेकिन सच की यह कीमत भारी थी; मीडिया के भारी दबाव और सुरक्षा कारणों से सार्थक अपने घर तक नहीं लौट पाए हैं और फिलहाल किसी अज्ञात जगह पर रहने को मजबूर हैं। साहिर लुधियानवी और रामधारी सिंह दिनकर की कविताओं से प्रेरणा लेने वाले सार्थक कहते हैं, "हमारा काम लगातार सवाल पूछना है।"

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