नए करों से पहले, हर रुपये का सही हिसाब आवश्यक। -प्रो प्रसिद्ध कुमार, अर्थशास्त्र विभाग।

 



 राज्य राजकोषीय नीति, बजटीय अनुशासन और राजस्व प्रबंधन। 

प्रत्येक बजट सत्र के दौरान राज्यों में प्रायः यही बहस होती है कि लोक कल्याणकारी योजनाओं और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए अधिक धन की आवश्यकता है, इसलिए करों में वृद्धि की जाए। हालांकि, नागरिकों पर नया कर लगाने से पहले यह मौलिक सवाल पूछा जाना आवश्यक है: क्या राज्य अपनी मौजूदा राजस्व वसूली को पूर्णतः कानूनी रूप से हासिल कर पा रहा है और स्वीकृत राशि का कुशल उपयोग कर रहा है?

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) के हालिया आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि वास्तविक समस्या नए कर लगाने की नहीं, बल्कि बजटीय अनुशासनहीनता, राजस्व संग्रह में कमियों को दूर करने और जीरो-बेस्ड बजटिंग एवं परफॉर्मेंस-बेस्ड बजटिंग को अपनाने की है।

राज्य की वित्तीय स्थिति चुनौतीपूर्ण है—ऋण का भार अधिक है, राजस्व खाता घाटे में है, और वेतन, पेंशन तथा ब्याज भुगतान के कारण बजटीय लचीलापन बहुत कम बचता है। लेकिन CAG की रिपोर्ट (2023-24) निम्नलिखित महत्वपूर्ण तथ्यों को रेखांकित करती है:

आवंटन बनाम वास्तविक खर्च: वर्ष 2023-24 में तमिलनाडु ने ₹4.47 लाख करोड़ का बजट रखा था, लेकिन वास्तविक खर्च ₹4.14 लाख करोड़ ही हुआ। यानी ₹33,302.53 करोड़ बिना खर्च हुए रह गए।

अनावश्यक पूरक आवंटन -26 अनुदानों के तहत 81 मामलों में ₹1,078 करोड़ का पूरक आवंटन किया गया, जबकि मूल बजटीय राशि ही समाप्त नहीं हुई थी।

लेखा मिलान की कमी: राजस्व व्यय का 2.89% और राजस्व प्राप्तियों का 6.14% महालेखाकार  के रिकॉर्ड के साथ मेल नहीं खाता।

GST संग्रह में लीकेज: GST के 337 मामलों में CAG ऑडिट ने ₹1,538.18 करोड़ की अनियमितताएं पाईं, जिनमें से ऑडिट के समय तक केवल ₹8.64 करोड़ ही बहाल किए जा सके थे। इसके अलावा 244 करदाता GST नेटवर्क से पूरी तरह बाहर संचालित पाए गए।

जीरो-बेस्ड बजटिंग का सिद्धांत यह है कि किसी भी योजना या बजटीय आवंटन को केवल इसलिए स्वचालित रूप से आगे नहीं बढ़ाया जाना चाहिए क्योंकि वह पिछले साल के बजट का हिस्सा था। प्रत्येक वर्ष हर विभाग को अपने खर्च का औचित्य शून्य से सिद्ध करना होता है।

अमेरिका में पूर्व राष्ट्रपति जिमी कार्टर द्वारा अपनाई गई यह व्यवस्था 1988 में तमिलनाडु में भी कागजों पर स्वीकार की गई थी, लेकिन यह कभी व्यावहारिक शासन का हिस्सा नहीं बन सकी। इसे प्रदर्शन-आधारित बजटिंग से जोड़ने की आवश्यकता है—जहाँ मूल्यांकन केवल इसमें न हो कि कितना पैसा जारी हुआ, बल्कि इसमें हो कि कितनी सड़कें बनीं, किस लागत पर बनीं और उनका मानक क्या था।

पारदर्शिता से किस प्रकार राजस्व और बजटीय बचत हो सकती है, इसका उदाहरण ग्रेटर चेन्नई कॉर्पोरेशन में देखा गया। जब छोटी सड़क मरम्मत परियोजनाओं की निविदाओं को व्यापक और पारदर्शी प्रतिस्पर्धा के लिए खोला गया, तो अंबात्तूर की ₹25 लाख की परियोजना में 9 ठेकेदारों ने भाग लिया और वह आधिकारिक अनुमान से 25.9% कम लागत पर पूरी हो गई।

यह उदाहरण सिद्ध करता है कि बिना कोई नया कर लगाए भी पारदर्शी व्यवस्था और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा से करोड़ों रुपये बचाए जा सकते हैं।

ईमानदार करदाताओं पर अतिरिक्त करों का बोझ डालने से पहले सरकार को निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए:

 अनुपालन अंतराल को समाप्त करें और GST व अन्य करों में छूटे हुए राजस्व की वसूली करें।

आवंटन केवल परंपरा या आदत के आधार पर न होकर वास्तविक परिणामों (जैसे—कितने घरों को नल से जल मिला, कितने छात्रों के शैक्षणिक स्तर में सुधार हुआ) पर आधारित होना चाहिए।

वित्तीय मानक: पहले लीकेज रोकें, पारदर्शी प्रतिस्पर्धा लागू करें, और जब सभी मौजूदा स्रोतों की दक्षता पूरी तरह से निचोड़ ली जाए, तब ही नागरिक से अतिरिक्त कर माँगने पर विचार किया जाना चाहिए।

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