अम्बेडकर रोते हुए पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर किए थे।प्रसिद्ध यादव

   

      




याद रहेगा। कैसे बहुजनों के खिलाफ नॉटंकी करते थे रंगे सियार लोग। आज भी नही समझ रहे हैं और उसे ही मेकर समझ बैठे हैं जो असम्भव है।
दलित अधिकारों के विरोधी क्यों बन गए बापू?

महात्मा गांधी दलितों को दिए इन अधिकारों के विरोध में थे. महात्मा गांधी का मानना था कि इससे हिंदू समाज बंट जाएगा. महात्मा गांधी दलितों के उत्थान के पक्षधर थे लेकिन वो दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र और उनके दो वोट के अधिकार के विरोधी थे. महात्मा गांधी को लगता था कि इससे अछूत (दलित) हिंदू धर्म से अलग हो जाएंगे. हिंदू समाज और हिंदू धर्म विघटित हो जाएगा.

इसके विरोध में पहले महात्मा गांधी ने अंग्रेज शासन को कई पत्र लिखे. लेकिन उससे भी बात नहीं बनी तो महात्मा गांधी ने पुणे की यरवदा जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया. उन्होंने कहा कि वो अछूतों के अलग निर्वाचन के विरोध में अपनी जान की बाजी लगा देंगे. महात्मा गांधी के इस कदम से बाबा साहब भीमराव अंबेडकर दुखी थे. वो इसे अछूतों के उत्थान में मजबूत कदम मान रहे थे. अंग्रेजों ने अछूत समाज को अलग धर्म अलग समुदाय की पहचान देने की कोशिश की थी. लेकिन पूना पैक्ट के बाद ये खत्म हो गया. हालांकि अछूतों के बड़े नेताओं ने पूना पैक्ट का विरोध किया था.

जब बाबा साहब को विरोध के आगे झुकना पड़ा

अनशन की वजह से महात्मा गांधी की तबीयत लगातार बिगड़ने लगे. अंबेडकर पर अछूतों के अधिकारों से समझौता कर लेने का दबाव बढ़ने लगा. देश के कई हिस्सों में भीमराव अंबेडकर के पुतले जलाए गए. उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुए. कई जगहों पर सामान्य वर्ग के लोगों ने दलितों की बस्तियां जला डालीं.


आखिर में बाबा साहब को झुकना पड़ा.

अंबेडकर ने बेमन से पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर किए थे

बाबा साहब भीमराव अंबेडकर 24 सितंबर 1932 को शाम 5 बजे पुणे की यरवदा जेल पहुंचे. यहां महात्मा गांधी और बाबा साहब अंबेडकर के बीच समझौता हुआ, जिसे पूना पैक्ट कहा गया. कहा जाता है कि बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने बेमन से रोते हुए पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर किए थे. इस समझौते में दलितों के लिए अलग निर्वाचन और दो वोट का अधिकार खत्म हो गया. इसके बदले में दलितों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या प्रांतीय विधानमंडलों में 71 से बढ़ाकर 147 और केंद्रीय विधायिका में कुल सीटों की 18 फीसदी कर दी गई.


पूना पैक्ट का अछूत समाज के बड़े नेताओं ने विरोध किया था. बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम ने पूना पैक्ट के बाद के युग को चमचा युग कहा था. उन्होंने पूना पैक्ट के 50 साल पूरे होने पर 23 सितंबर 1982 को अपनी एक किताब का विमोचन किया. किताब का नाम था- एन एरा ऑफ स्टूजेज यानी चमचा युग. कांशीराम ने लिखा था कि पूना पैक्ट की वजह से ही दलित अपने वास्तविक प्रतिनिधि चुनने से वंचित कर दिए गए. उन्हें हिंदुओं द्वारा नामित प्रतिनिधि को चुनने के लिए मजबूर कर दिया गया. ये थोपे गए प्रतिनिधि हिंदुओं के औजार या चमचे के रूप में कार्य करने के लिए मजबूर हैं. कांशीराम का मानना था कि 24 सितंबर 1932 को दलितों को चमचा युग में ढकेल दिया गया.


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